गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

वनमाली की नयी कथा परम्परा (श्रृंखला )

 



धीरेंद्र अस्थाना-

धीरे-धीरे इस पत्रिका ने,जैसी कि उम्मीद भी थी,वह मुकाम छू लिया कि यहां कोई भी छपना चाहे। यह मुकाम पहले सिर्फ राजेंद्र यादव के समय वाले हंस को हासिल था।या फिर बाद में रवींद्र कालिया वाले नया ज्ञानोदय को।

वनमाली कथा के इस नवलेखन विशेषांक ने सिद्ध कर दिया है कि युवा लेखक कुणाल सिंह अपने अग्रज संपादकों की संपादन कला में परकाया प्रवेश करने में कामयाब हो चुके हैं।

जाहिर है यह प्रक्रिया तभी संभव हो पाती है जब संपादक को निर्णय लेने की संपूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो। वरिष्ठ लेखकों- संपादकों संतोष चौबे और मुकेश वर्मा ने यह स्वाधीनता उपलब्ध करवाई है इसीलिए कुणाल सिंह संपादन में अपना श्रेष्ठ दे पा रहे हैं।

मैंने इस विशेषांक में सबसे पहले पहली कहानी वाले सभी ग्यारह लेखकों को पढ़ डाला और जिनकी कहानी बहुत ज्यादा पसंद आयी उनको फोन भी किया। यह मेरी सहज आदत है। कहानी अच्छी है तो नये पुराने का भेद किए बिना मैं बधाई दे देता हूं।

मुंहफट हूं इसलिए बता देता हूं कि कुछ नये लेखकों ने नाम बताते ही मुझे पहचान लिया लेकिन कुछ भले लेखक ऐसे भी निकले जिन्होंने मुझे नहीं पढ़ा था और जो मेरे नाम से भी परिचित नहीं थे। लेकिन फोन पाकर खुश वो भी हुए। पहली कहानी पर तारीफ का फोन सुन कर कौन लेखक खुश नहीं होगा!

बहरहाल, बता दूं कि ग्यारह कहानियों में से नौ कहानियां आला दर्जे की हैं।दो कहानियां साधारण हैं। उनकी जगह किन्हीं दो अन्य नये लेखकों को लेना चाहिए था।एक अत्यंत छोटी होने और मामूली कथ्य के चलते प्रभाव पैदा नहीं कर पाती और दूसरी अनावश्यक रूप से लंबी होने तथा कथ्य के नाटकीय रूप ले लेने की वजह से अपना प्रभाव खो देती है।

जिस अद्भुत कथा लेखक ने अपनी कहानी में जादुई यथार्थवाद पैदा किया वह मेरी प्रशंसा से इस कारण चूक गया कि पत्रिका की एक अन्य लेखिका का फोन नंबर भी उसी का बता कर छप गया है।वह लेखक है मुदित श्रीवास्तव।इसी टक्कर की कहानियां शिल्पी झा,सौरभ सिंह, वियोगिनी ठाकुर,विकास वशिष्ठ, वैशाली थापा,मौलश्री सक्सेना, प्रिया वर्मा और आशीष शुक्ला की रहीं।शिल्प,कथ्य,कहन कहीं कोई असावधानी नहीं। पहली कहानी का टैग हटा दें तो कोई नहीं कहेगा कि यह पहली कहानी होगी।

इसका मतलब यह हुआ कि अच्छा लिखने वाले आ रहे हैं, आते जा रहे हैं। पुराने लेखकों को निराश होने की जरूरत नहीं है कि उनके बाद कथा साहित्य विपन्न हो जाएगा।

पहली कहानी वाले ज्यादातर लेखक थर्टी माइनस या थर्टी प्लस के हैं इसका मतलब इन्होंने कहानीकार के रूप में छपने को लेकर धैर्य बरता और जब संतुष्ट हो गये तो कहानी छपने भेजी।यह बड़ा बनने वाले लेखक का लक्षण है।

नोट कीजिए, इनमें से अधिकतर कथा साहित्य का झंडा बुलंद करने वाले हैं। पहली कहानी के टैग से मुक्त एक ही युवा लेखिका को अभी पढ़ा है– सबाहत आफरीन। और यकीन मानिए, हिंदी की गर्व करने वाली लेखिकाओं की कतार में अपना स्थान उन्होंने सुनिश्चित कर लिया है। सुना है कि उनके पहले कहानी संग्रह का विमोचन समारोह लखनऊ में दिग्गजों के बीच हुआ है।

अगली कड़ी में वे तेरह लेखक जो युवा कहानीकार हैं लेकिन पहली कहानी का तमगा पीछे छोड़ आए हैं।


बुधवार, 7 दिसंबर 2022

दिनेश श्रीवास्तव के गीत-

 गीतिका/सजल


                  *रोक दो!*


संस्कृतियों का क्षरण रोक दो!

अंधकार आवरण रोक दो!!


बिन विवाह सहवास के लिए,

किसी पुरुष का वरण रोक दो!


पश्चिम की सभ्यता विषैली,

संबंधों का मरण रोक दो!


'श्रद्धा-आफताब' से सीखो,

ऐसा हर आचरण रोक दो!


वृत्ति-आसुरी और राक्षसी,

करना सीता-हरण रोक दो!


हरी-भरी हो धरती सारी,

दूषित पर्यावरण रोक दो!


कवियों! ऐसी कलम चलाओ,

मानवता पर ग्रहण रोक दो!


              

               

: 


 *लिव-इन को है मिली मान्यता,फिर क्यों रोना-धोना*


साथ-साथ रहना खाना है, पाणिग्रहण बिन सोना।

संस्कृतियों का क्षरण यही है, संस्कार का खोना।

संबंधों के पैंतिस टुकड़े, कर जंगल में बोना।

लिव-इन को है मिली मान्यता, फिर क्यों रोना-धोना।।


छोड़ दिए तुम मात-पिता को, कथित प्रेम में पड़कर।

अनजानी राहों के राही,बने हुए हो भगकर।

कैसे भूल गए घर सुंदर, अपना सुखद सलोना।

लिव-इन को है मिली मान्यता, फिर क्यों रोना-धोना।।


माना प्रेम सरस होता है, पर जब पावन होता।

गंगा जल- सा प्रेमी जन का, तन-मन सदा भिंगोता।

देह-यष्टि का आकर्षण तो,मात्र मोह का होना।

लिव-इन  को है मिली मान्यता, फिर क्यों रोना-धोना।।


प्रेमपाश में अगर फँसाने, लव-जेहादी आएँ।

सावधान तुम रहो बेटियों!, तुमको लुभा न पाएँ

भौतिकता की आँधी में मत, अपना आपा खोना।

लिव-इन को है मिली मान्यता, फिर क्यों रोना-धोना।।


      *दिनेश श्रीवास्तव*

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

 


मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अकेले,बाइस साल की उम्र में। मुझे उसी दिन हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशन संस्थान राजकमल में नौकरी ज्वाइन करनी थी। साढ़े आठ बजे तक का समय इधर उधर भटक कर मैं अपने भारी बैग के साथ पौने नौ बजे राजकमल पहुंच गया। लंबी प्रक्रिया में नहीं जाते हैं।उसी दिन से मेरी नौकरी शुरू हो गई और रहने के लिए राजकमल का गेस्ट हाउस मिल गया, जहां आज राजकमल का दफ्तर है। दोपहर के समय बीच बीच में मैं दस, दरियागंज जाया करता था, अपने इकलौते परिचित, सुरेश उनियाल से मिलने के लिए,जो सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम करते थे। एक दिन मुझे सुरेश ने चित्रकार कवि हरिप्रकाश त्यागी से मिलवाया, मुझे त्यागी का साथ इतना भाया कि हम बार बार मिलने लगे। एक दिन त्यागी राजकमल आया तो उसके हाथ में एक किताब झूल रही थी-- शीर्षक पढ़ते ही मेरी हंसी छूट गई। क्या हुआ,त्यागी ने पूछा। मैंने कहा,जिस दिन मैं दिल्ली आया, मेरी हालत इस किताब के शीर्षक जैसी थी। त्यागी भी हंसने लगा। फिर त्यागी वह किताब मेरी मेज पर यह कहते छोड़ गया- रख ले।यह दिल्ली में मेरे अपनी मिल्कियत वाली पहली किताब थी।

  दोस्तों, इतनी लंबी भूमिका इसलिए कि उस किताब का नाम था- राजधानी में गंवार।लेखक थे प्रेम जनमेजय।यह जानकारी यकीनन प्रेम जनमेजय को भी नहीं होगी।बाद में त्यागी ने या शायद सुरेश ने ही मुझे प्रेम जनमेजय से मिलवाया और हम दोस्त बन गए।तब तक साहित्य में व्यंग्य का महत्व मैं समझ चुका था। राजकमल में रहते हुए हरिशंकर परसाई,शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल को न सिर्फ पढ़ चुका था बल्कि बेच भी रहा था। उसके बाद 1982 में बेशर्म मेव जयते और 1986 में पुलिस पुलिस नामक किताबें मैंने पढ़ीं।1990 में मैंने दिल्ली छोड़ दिया और मुंबई आ गया। लेकिन दिल्ली छोड़ने से पहले मैं यह धारणा बना चुका था की परसाई जी और शरद जी के बाद व्यंग्य की दुनिया में प्रेम जनमेजय का सिक्का चलने वाला है। और कालांतर में यह धारणा पुष्ट भी हुई।आज अपने उन आरंभिक दिनों के दोस्त की शिनाख्त जैसी भारी भरकम किताब मेरी गवाही में खड़ी है और मैं गर्व से हंस रहा हूं और भावुकता में बह कर रो भी रहा हूं। बहुत खुश हूं मैं।प्रकाशकीय सीमा है वरना तो इस दोस्त की शख्सियत के आकलन के लिए ऐसे चार खंड भी कम हैं।अब आते हैं इस महत्वपूर्ण किताब पर जो शोधकर्ताओं के लिए किसी लाटरी लगने से कम नहीं है।किस किस दिग्गज ने नहीं लिखा है इसमें?

यह किताब खुलती है वरिष्ठ आलोचक और लेखक तरसेम गुजराल के संपादकीय से- प्रेम जनमेजय को क्यों पढ़ा जाए।इस महत्वपूर्ण और विचारवान संपादकीय में तरसेम जी ने प्रेम के विविधरंगी रचना संसार की विस्तृत जानकारी देने के साथ ही यह भी सिद्ध किया है कि प्रेम जनमेजय होने का क्या मतलब है? इसके बाद करीब 75 वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन लेखकों ने प्रेम जनमेजय की रचनात्मक यात्रा और योगदान का विश्लेषण किया है। कुछ खास लेखकों में शामिल हैं-- नरेंद्र कोहली,रामदरश मिश्र, निर्मला जैन, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल,सूर्यबाला,कमल किशोर गोयनका,शंकर पुणतांबेकर, कन्हैयालाल नंदन,नासिरा शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, जगदीश चतुर्वेदी,हरीश नवल,सुधीश पचौरी,रमेश उपाध्याय,अजय नावरिया,अशोक चक्रधर,दिविक रमेश,सूरज प्रकाश,महेश दर्पण और अनंत विजय।सब लेखकों का नाम लेना संभव नहीं लेकिन जो भी हैं महत्वपूर्ण हैं। प्रेम के बारह बहुचर्चित व्यंग्य किताब को रचनात्मक चेहरा भी प्रदान करते हैं।प्रेम द्वारा संपादित पत्रिका व्यंग्य यात्रा पर कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल, डाक्टर कमला प्रसाद, डाक्टर विजय बहादुर सिंह जैसे दिग्गजों की टिप्पणी किताब को नये मायने देती हैं।

  दोस्तों,यह समीक्षा नहीं है।यह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ का परिचय भर है। फेसबुक पर परिचय ही देना ठीक है।अब किताब मंगाना पढ़ना शुरू होता है आपके पाले में।





मधुबाला

 कवि और जनता का संबंध स्वस्थ काव्य के सृजन के लिए अत्यंत आवश्यक है।यह संबंध तभी बना रह सकता है जब कवि आत्मविश्वासी हो और उसे जनता की सुरुचि में आस्था हो।जहाँ इसका अभाव है वहाँ तरह-तरह के विकार उत्पन्न हो जाते हैं- आप मेरी भूमिका लिख दीजिए, आप मेरी रचना पर सम्मति दे दीजिए, आप मेरी समालोचना कर दीजिए;कविताएँ तो मैंने उच्च कोटि की लिखीं पर जनता में उसे समझने की बुद्धि ही नहीं है, मुझे समझनेवाली जनता का अभी जन्म ही नहीं हुआ है, मुझे तो लोग दो सौ बरस बाद समझेंगे, मेरी कविता इतनी मौलिक है कि उसे परखने के लिए एक विशेष वर्ग का पाठक चाहिए आदि, आदि।इसका सबसे विकृत रूप आज ऐसे अनेक कवियों में देखा जाता है जिनके पाठक तो हैं तीन पर समालोचक तेरह।उनकी कविताओं की चर्चा निर्जीव स्याही से मुर्दा काग़ज़ों पर तो बहुत होती है पर सजीव धड़कते हुए हृदय से उनकी प्रतिध्वनियाँ नहीं आतीं।.....प्रजातंत्र की स्वतंत्रता साहित्य के राज्य का अपेल सिद्धांत है।वहाँ न तानाशाही चलती है और न गुरुडम चलता है।

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 डॉ. हरिवंशराय बच्चन

('मधुबाला' के आठवें संस्करण की भूमिका से)

शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द.......।

 (ज़िन्दगी में साथ चलते लोग जब अचानक अलविदा कहते हैं तो वह जगह हमेशा के लिए खाली हो जाती है। 28 साल पहले​ वह हादसा हुआ था जब सिर्फ 48 साल की उम्र में वे हमसब से बहुत दूर चली गयीं।  इसी सन्नाटे के बीच रहते हुए शैलप्रिया जी के लिए संबोधन के कुछ शब्द।) 


ओ मेरी तुम!

नींद और अवसाद में बीते हैं ये अकेले दिन।

ये दिन 

जिनके उजाले प्रतिपल मद्धिम हुए हैं।

उस रात अस्फुट अलविदा में

कांपे थे जो होंठ और हाथ, 

वे अब पिघलती पुतलियों के हमराज हैं।


एक दिन चावल के नियति-पिंड  पर

काले तिलों से लिखा था

आधी कविता का अधूरा पत्र। 

क्या सहज है पुरखों की कतार में

दिवंगत प्रिया की प्रतिष्ठा ?

और उसके लिए भरे-मरे मन से

अन्तिम बिदाई में

कर्मकांड की सनातनी क्रिया ?


आज यादों की वेदी पर

आंसुओं के फूल मुरझा चुके हैं,

मजार पर जलती मोमबत्तियां

धुएं में घुट रही हैं,

ऐसे में सिर्फ नीम बेहोशी की चाह

सुकून देती है।

ओ मेरी तुम!

मनोमंथन की यात्राएं

अजनबी पड़ावों से लौट कर

देह-घाटी में थम जाती हैं।

हरकत का इकतारा बजता है

जब यह भीतर का सन्नाटा

बाहरी कोलाहल से टकराता है।

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 Vidya bhushn  



अनूठा है ‘साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर’


जब भी असम जाती हूं तो कोशिश होती है कि एक बार डा. इंदिरा गोस्वामी जी के घर जरूर जाऊं और साउथ-ईस्ट एशिया रामायण रिसर्च सेंटर में अध्ययनरत शोध छात्रों और उनके परिजनों से उनकी अन्य किताबों के बारे में और अधिक जान सकूं। पिछले वर्ष आज के ही दिन में वहां गई थी। गुवाहाटी जाती हूं तो मां कामाख्या, जाने-माने समाजसेवी हेमभाई जी के आश्रम, वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि और मामोनी बाइदौ के अलावा मेरे कुछ अनन्य मित्रों से जरूर मिलती हूं। इस बार काफी कष्ट में थी क्योंकि 3-4 दिन पहले नगांव, असम में मेरा एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया था। ‘बड़ा’ इसलिए कहा कि उसके पहले याद नहीं पड़ता, कभी चक्कर आया हो या इतनी अधिक चोटें एक साथ आईं हो और रोकर किसी अपने को बताऊं, ऐसा कोई नहीं था वहां। क्योंकि मैं तो सोलो ट्रैवलर की तरह नागालैंड और असम की यात्रा पर निकली थी। खैर, न्यूज-18 में कार्यरत मेरे बंधु नीलोत्पल बोरा के घर रुकी| उन्होंने, उनकी पत्नी और मेरी मित्र सुजाता, उनकी माता जी आदि ने मेरा बहुत बहुत ख्याल रखा। इसके लिए मैं उनकी ताउम्र आभारी रहूंगी।  🙏🙏

#mamtasinghmedia  Nilutpal Z Borah Ravishankar Ravi Sujata Pujari Borah Minu Borah

आ: धरती कितना देती है' ....???/ ममता सिंह



सुमित्रानंदन पंत की गिनती ऐसे लेखकों में की जाती है, जिनका प्रकृति का चित्रण समकालीन कवियों में सर्वश्रेष्ठ था। आधुनिक काव्य की भूमिका में सुमित्रानंदन पंत जी लिखते हैं कि ’’कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि प्रदेश को है। मैं घण्टों एकांत में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षक मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।’’

पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ जैसे अनगिनत पुरस्कार प्राप्त महान कवि सुमित्रानंदन पंत को हिंदी में ‘वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता है। उनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। साथ ही, हिमालय की ओट में छिपे कौसानी जैसे छोटे से गांव को अपनी रचनाओं के माध्यम से विश्व मानचित्र पर जगह दिलाने का काम यदि किसी ने किया है तो वो पंत जी ही थे। आज उनकी एक कविता की ये पंक्ति 

'आ : धरती कितना देती है'... अनायास ही मानस पटल को झकझोर कर रख देती है कि वो अपनी लेखनी के माध्यम से इतना कुछ गढ़ गए हैं जो देश के लिए अमूल्य धरोहर हैं लेकिन हमने उन्हें क्या दिया? उनके एक कमरे के मकान जिसे ठीक से सरकार संग्रहालय तक की शक्ल भी नहीं दे पाई। कहने को पहाड़ी शैली में एक स्ट्रक्चर जरूर खड़ा किया गया है लेकिन वह भी महज खानापूर्ति ही है। यानी संग्रहालय के नाम पर सरकार ने उनकी कुछेक चीजों को इकट्ठा करके एक मिनी म्यूजियम तो बना दिया लेकिन उसे संग्रहालय भी नहीं कहा जा सकता। वहां न कोई तख्ती लगी मिली, न कोई जानकार व्यक्ति, जिससे पंत जी के बारे में पर्यटकों को कुछ ठोस जानकारी मिल सके। यानी  जिसने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रौशन किया हो, उनकी ऐसी बेकद्री देखकर मन बहुत व्यथित हुआ।

कल सुमित्रानंदन पंत जी की पोस्ट डाली, यह अनायास ही नहीं डाली। लिखना कुछ और था जो वहां देखकर समझा, लेकिन सोचा कि क्या लिखूं उस राज्य के बारे में जिसने देश को कई जाने माने कवि और साहित्यकार दिए। जब वहां की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने अपने प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों की सुध नहीं ली तो हम कौन...हां, इतना जरूर है कि पर्यटकों की के लिए आगामी 19 और 20 नवम्बर को ‘कौसानी महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों में सुमित्रानंदन पंत जी को कितना स्थान मिलेगा, यह देखने वाली बात होगी।  

#mamtasinghmedia @pmoindia @narendramodi #AmritMahotsav @MinOfCultureGoI @pushkardhami @cmo_uttarakhand

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...