शनिवार, 8 मई 2021

कोरोना : पांच ग़ज़ले / डॉ. वेद मित्र शुक्ल

 कोरोना: पाँच ग़ज़लें / डॉ. वेद मित्र शुक्ल  

 

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1.

माना मुश्किल घड़ी आज,

फिर भी हिम्मत बड़ी आज।

 

घर में रहकर भजन करें,

छोड़ें हम हेकड़ी आज।

 

लक्ष्मणरेखा खिंची हुई,

करना मत गड़बड़ी आज।

 

खतरे की जंजीर अगर,

तोड़ें इक-इक कड़ी आज।

 

कट जायेगा कठिन समय,

काहे की हड़बड़ी आज।

 

“खट्टे हैं अंगूर” कहे-

कोरोना लोमड़ी आज।

 

2.

समय बख्शा है कुदरत ने आओ घर को बनाएं घर

अगर मुश्किल तो भी ठानें चाहे हो जो बनाएं घर।

 

सुनामी हो या कोरोना ये आखिर बीत जाते हैं,

बिगाड़े मत धीरज खोकर, आओ, आओ बनाएं घर।

 

महामारी या कोई जंग मनुष्य जीता, जीतेगा,

जहाँ भी हैं, चाहे बंकर या झोपड़ हो बनाएं घर।

 

प्यार, जज़्बातीपन, सपने औ एकजुटता इनसे हम-

चलो भीतर अंतर्मन में आओ यारो! बनाएं घर।

 

खिंची है लक्ष्मण रेखा आज फिर से, गलती मत करना,

शेष जो भी है अब चिंता छोड़ो हम तो बनाएं घर।

 

3.

कौन पढ़े अखबार आज जग झूठा लागे,

बेमतलब के राज-काज जग झूठा लागे।

 

इनकी-उनकी इधर-उधर की कौन सुने अब,

भीटर यों है बजा साज जग झूठा लागे।

 

देह दे रही धोखा, बेबस साँसें उखड़ी, 

किस पर यारा! करें नाज जग झूठा लागे। 

 

इतना भी क्यों दुनियादारी में खोए हम,

कोरोना बन गिरी गाज जग झूठा लागे।

 

मानुष भूला अपनी मिट्टी की खुशबू यों

लुटने को है आज लाज जग झूठा लागे।

 

4.

हक साँसों का नहीं छोड़ना जीतेंगे,

कोरोना से युद्ध है ठना जीतेंगे।

 

है दूरी, पर मन से मन तो मिले हुए,

यारा! हिम्मत नहीं हारना जीतेंगे।

 

खबरें अच्छी नहीं अभी, पर होने को,

भीतर यों विश्वास पालना जीतेंगे।

 

अंधेरा आँखों के आगे छाये जब,

आशाओं के दिये बालना जीतेंगे।

 

‘दो गज दूरी–मॉक्स् जरूरी’ जीने को,

देखो, भइया! नहीं भूलना जीतेंगे।

 

5.

कोरोना पर देखो भारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज,

हारेगी अब यह बीमारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज।

 

अपना भारत, प्यारा भारत, इसकी रक्षा हमको करनी,

कर रख्खी पूरी तैयारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज।

 

गाँव-नगर या महानगर हो, सबने ठाना टक्कर देंगे,

पछताएगी अब बेचारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज।

 

सारे जग में कहर ढा रही, जन-जन ने इसको पहचाना,

सच पूछो असली हुशियारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज।

 

पुलिस, चिकित्सक, पत्रकार सम कोरोनावीरों को आओ,

मिलजुलके हम हों आभारी है सोशल डिस्टेंसिंग आज।


डॉ. वेद मित्र शुक्ल

 राजधानी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

राजा गार्डन, नई दिल्ली-110015

मोबा: 9953458727, 9599798727

 

शुक्रवार, 7 मई 2021

माँ की यादें / मिथिलेश्वर

लेखन की प्रेरणा और किस्सागोई की जमीन / मिथिलेश्वर


मां की पुण्य तिथि 8 मई पर विशेष।

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मेरे साहित्य पर शोध करनेवाले छात्र तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए मेरा साक्षात्कार लेने वाले रचनाकार-पत्रकार मित्र अक्सर यह प्रश्न अवश्य पूछते हैं कि लेखन की प्रेरणा मुझे कैसे और कहां से प्राप्त हुई तथा किन स्थितियों में मैंने  किस्सागोई ग्रहण की? ऐसे सवालों का जवाब देते हुए अपनी मां कमलावती देवी की याद मुझे बरबस आ जाती है।

            वह साठ का दशक था।तब अपनी मां के साथ हम छोटे भाई-बहन अपने गाँव बैसाडीह में रहते थे।उस समय हम भाई बहन एकदम छोटे थे।हममे कोई सयाना नहीं था।पिताजी आरा में प्रोफेसर थे।वह रविवार या अवकाश के दिनों में ही गाँव आते थे।उस समय कालेज शिक्षकों की आय एकदम सीमित थी,इस स्थिति में जीविका के लिए अपनी पुश्तैनी खेती पर ही हम निर्भर थे।चूंकि पिताजी अकेले थे, ऐसे में गांव पर हम छोटे भाई बहनों की परवरिश के साथ मां  खेती की देखभाल भी करती थी।

           उस समय मां मेरे गांव की पहली पढी-लिखी महिला थीं।रामचरितमानस तो वे इतनी बार पढ़ चुकी थीं कि अधिकांश चौपाईयां उन्हें कंठस्थ थीं।उन दिनों हम मां के साथ  अपने घर के प्रवेशद्वार वाले कमरे में ही अधिक रहते थे।उस कमरे से गांव की गली में आने-जाने वालों कीआहट हमें मिलती रहती थी तथा अपने घर के आंगन को भी हम देखते रहते थे।मां मेरे गांव की बहू थीं, इसलिए गांव के बड़े-बुजुर्गों के समक्ष उन्हें परदे में रहना होता था।प्रवेशद्वार के उस कमरे में पल्ले की ओट में बैठी मां जब रामचरितमानस का सस्वर पाठ करती थीं, तब मेरे पड़ोस के अनेक बड़े-बुजुर्ग मेरे दरवाज़े पर बनी सीमेंटेड कुर्सियों पर बैठ कर उसे सुनते थे।ऐसे में मेरी माँ की तारीफ करते वे नहीं थकते - "बहू हो त़ो ऐसी।"

        उस समय बचपन में अपनी मां की सबसे बड़ी विशेषता मुझे लोककथाओं की उनकी जानकारी को लेकर जान पड़ती।इस बात से मैं अपार खुशी का अनुभव करता कि मेरी माँ लोककथाओं की भंडार हैं।लोककथाओं का अकूत खजाना उनके पास है।ऐसी-ऐसी हैरतअंगेज, मर्मस्पर्शी और रोचक लोककथाएं कि उस दुनिया में हम डूब-डूब जाते ।जब वे सुनाने लगतीं तो अपना सुधबुध खो तन्मय हो हम उसमें लीन हो जाते थे।संभवतः मां अपने मायके से ही लोककथाओं की वह दुनिया लेकर आई थीं।

        उस बचपन में हम सभी भाई-बहन मां के साथ एक ही कमरे में सोते थे।फिर विस्तरे पर गिरते ही मां से लोककथाओं की हमारी फरमाइश शुरू हो जाती।बस,मां अपनी सरस और रोचक शैली में सुनाना शुरू कर देतीं।उनके सुनाने का लहजा ऐसा होता कि हमारी आंखों के समझ उन कथाओं के दृश्य, घटनाएं और पात्र एकदम सजीव नजर आते रहते।फिर उन कथाओं की दुनिया में रमते-विचरते हुए हमारी आंख कब लग जाती, हमें पता तक नहीं चलता।शायद पिताजी की अनुपस्थिति में गांव पर असुरक्षा और अकेलेपन का एहसास हमारे बाल मन पर न पड़े, इस उद्देश्य से भी अपनी लोककथाओं में मां हमें बांधे रहतीं।उस समय मेरे ऊपर तो मां की लोककथाओं का ऐसा आकर्षण कायम रहता कि दिन में भी वे जैसे ही मुझे फुर्सत में जान पड़तीं,मैं उनके पास जा बैठता और लोककथाएं सुनने लगता।

         स्कूल में पढ़ते हुए जब मैं बड़ा होने लगा और अपने ग्रामीण जीवन की ज्यादतियों,विसंगतियों और अजीबोगरीब स्थितियों पर अभिव्यक्ति का दबाव महसूस करने लगा तब सहसा मेरे अन्दर से कहानियां फूटने लगीं।कहने की आवश्यकता नहीं कि मां की लोककथाओं ने ही मेरे अन्दर कथाकार के बीज बो दिए थे तथा मेरे संवेदनशील मन में किस्सागोई की जमीन कायम कर दी थी।भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित अपनी आत्मकथा "पानी बीच मीन पियासी" में इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ।यहाँ प्रसंगवश मां का उल्लेख करना पड़ा।इस दौरान मां की स्मृतियाँ मेरे मन में ताजा हो उठी हैं।उनकी स्मृतियों को सादर नमन।

बुधवार, 5 मई 2021

आज का पंचतंत्र

 आज का पंचतंत्र


1.


आप ने जोग पहले सीखा या भाषण करना?

भाषण ही मेरा जोग है।

इस कला में इतने पारंगत कैसे हुए?

राजनीति में आने के बाद।

भाषण ही करते हैं या कुछ काम भी? 

मैं करने वाला कौन होता हूँ। कर्ता कोई और है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। वह जो चाहता है, मैं वही करने लगता हूं।

इससे पहले क्या करते थे?

मंदिर में घंटा बजाता था।

अगर जनता ने फिर मौका न दिया तो?

तो फिर घंटा बजाऊंगा।


2.


आप तो जोगी हैं। त्रिकालदर्शी। कुछ बताइये न। आगे क्या होने वाला है?

अरे, तुम्हारी समझ में अभी भी नहीं आया?

क्या बाबा?

हम सब त्रेता की ओर जा रहे हैं। 

वहां पहुँचकर क्या करेंगे?

देखा जायेगा। वैसे वहां से पाषाणयुग ज्यादा दूर नहीं।


3.


बाबा! संन्यास क्या है?

जिंदगी का वह मोड़, जहां से किसी भी दिशा में चल पड़ना आसान हो जाता है।

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?

देखो मैं कहां से कहां आ पहुँचा हूँ। 

कहां पहुँचे?

कल तक जो मेरे पुरखों की चरण धूलि लेते नहीं अघाते थे, आज मुझे उनके आगे सिर नवाना पड़ रहा है।

यह कोई मजबूरी तो है नहीं। आप चाहें तो इनकार कर दें।

नहीं बच्चा! एक संन्यासी ही समझ सकता है कि जितना उठना चाहते हो, उससे ज्यादा गिरने को तैयार रहो।


4.


बाबा! लोग मर रहे हैं। सरकार क्या कर रही? 

अब जिनको मरना है, वे तो मरेंगे ही। इसमें सरकार क्या कर सकती है?

बेड, दवाएं और सिलिंडर तो दे सकती है?

वह काम हमारे स्वयंसेवकों ने अपने हाथ में ले रखा है। मुझे खुशी है कि उन्हें बहती गंगा में हाथ धोना बखूबी आता है।  


5.


आप की दाढ़ी कमाल की है!

हां, बहुत समय दिया है इस पर।

यह आइडिया कैसे आया कि दाढ़ी बढ़ायी जाये?

कोई खास बात नहीं। सोचा प्रवचन के साथ दाढ़ी का अच्छा कम्बिनेशन बनता है।

तो इससे बात बनी?

अभी तो सर मुड़ाया है। देखते हैं आगे कितने ओले पड़ते हैं।


सुभाष राय


5/5/2021

मंगलवार, 4 मई 2021

प्रभु के प्यारे हो गये प्रभु जोशी

 इंदौर से बेहद दुःखद खबर आ रही है कि चित्रकार, कहानीकार, पत्रकार … प्रभु जोशी जी नहीं रहे. इंदौर में प्रभु दा का अपार स्नेह मुझे मिलता रहा. वो अक्सर कहते थे. जब रंग खरीद कर लाओ तो उसमें से सफेद और काला रंग निकालकर खिड़की से बाहर फेंक दो …

जयदीप कार्णिक-

कोरोना जैसे बस चुन-चुन कर हमले कर रहा है। एक खबर का सदमा पूरा तो क्या शुरु भी नहीं हो पाता और दूसरी ख़बर आ जाती है। गोया मन को दुखाने की होड़ सी लगी हो। आँखों पर मानो पत्थर बरस रहे हों। आँख खोल कर देखने का मौका भी नहीं है कि ये हो क्या रहा है। अब तो केवल आंसू ही नहीं, श्रद्धांजलि के लिए शब्द भी सूख गए हैं…

अब ये कोरोना प्रभु दा को भी ले गया। शब्दों और रंगों का ऐसा चितेरा जिसने खुद को इंदौर के कैनवास तक ना समेटा होता तो उनका आसमान कहीं बड़ा होता, इसके बाद भी उन्होंने अपनी कला का इंद्रधनुष पूरी दुनिया तक पहुँचाया, देश दुनिया में अपनी प्रतिभा के रंग बिखेरे। उस इंद्रधनुष का एक सिरा हमेशा इंदौर की धरती पर ही टिका रहा।
अभी और शब्द नहीं हैं प्रभु दा, आपके साथ सुनहरी यादों के बायस्कोप से चुनने और बताने के लिए। आप ही ने सबसे पहले आकाशवाणी पर बोलने का मौका दिया। बहुत लंबी है यादों की फेहरिस्त। अभी संभव नहीं। पर ये भरोसा जरूर है कि आप जहां भी रहेंगे शब्द और रंग का मेला लगता रहेगा। और हां, मुझ पर विशेष स्नेह और आशीर्वाद भी जहां हैं वहीं से बनाए रखेंगे।

आपको शत शत नमन, विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति।

कृष्ण कल्पित-

अद्भुत कथाकार/गद्यकार
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जलरंग चित्रकार
बड़े ब्रॉडकास्टर
हिन्दी भाषा के सच्चे हितैषी
आकाशवाणी में मेरे सहकर्मी और बड़े भाई Prabhu Joshi आज सुबह नहीं रहे । ओह । हृदयविदारक ।

‘न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई !’

अजय तिवारी-

प्रभु जोशी भी…. अब सहनशक्ति जवाब दे रही है। शानदार मनुष्य, ज़िंदादिल दोस्त, श्रेष्ठ कथाकार, विवेकवान विचारक और साहसी चित्रकार प्रभु जोशी अभी दोपहर को चले गये। सुबह उन्होंने दोस्तों से कहा कि लगता है, अस्पताल से लौटूँगा नहीं…

इंदौर के अख़बार ‘नई दुनिया’ ने तत्काल उनपर लिखा है:
“इंदौर, Prabhu Joshi। इंदौर के प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार और पत्रकार प्रभु जोशी का मंगलवार दोपहर निधन हो गया। उनका पाजिटिव होने के बाद उनका इलाज चल रहा था। वे करीब तीन दशक तक नईदुनिया से भी जुड़े रहे। उनके निधन की खबर सुन साहित्य जगत में शोक की लहर छा गई है। प्रभु जोशी के व्यक्तित्व में एक चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता समाहित था। इनके चित्र लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में आस्ट्रेलिया के त्रिनाले में प्रदर्शित हुए थे। प्रभु जोशी को गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यूएसए) का जलरंग हेतु थामस मोरान अवार्ड मिला। ट्वेंटी फर्स्ट सैचुरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में वे शामिल रहे। भारत भवन का चित्रकला तथा मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुआ। साहित्य के लिए मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप दिया गया था।”

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

अब केवल यादों में डॉक्टर गिरिधारी जी

 स्मृति शेष /

डॉ० गिरिधारी जी की रचनाएं नई पीढ़ी को जागरूक करती रहेगी /

 विजय केसरी 


डॉ० गिरिधारी राम गौंझू का जाना एक अपूरणीय क्षति है।  झारखंड की लोक कला, संस्कृति, रीति - रिवाज, रहन-सहन, भाषा आदि पर उनकी गहरी पकड़ थी। झारखंड की  लोक भाषा , कला - संस्कृति , नृत्य - संगीत विकास आदि के प्रति उनकी निष्ठा देखते बनती थी । उन्होंने  बाल काल से ही हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था । उनका हिंदी से यह नाता  आजीवन बना रहा था।

  वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड से संबंधित लेख लिखा करते थे ।  उनकी सामग्रियां  रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान  प्रकाशित होती रही थी । रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'रांची एक्सप्रेस' में उनके लेखन के प्रारंभिक दिनों में कई लेख प्रकाशित हुए ।  सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं । उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी । जहां तक मेरी स्मृति में है कि गिरिधारी राम गौंझू का पहला लेख 'रांची एक्सप्रेस' में प्रकाशित हुआ  था । 

जब मैं 'कब बदलेगी झारखंड की तस्वीर ?' सिरीज़ लिख रहा था , इस श्री निमित्त मैंने उनसे कुछ लिखने के लिए आग्रह किया था । सबसे पहले उन्होंने मुझे इस सीरीज के लिए बधाई दिया था । साथ ही  सुझाव भी दिया था कि आप झारखंड के बी.पी .केसरी, विद्याभूषण, डॉ० अशोक प्रियदर्शी, महुआ मांझी, प्रोफेसर शिव कुमार मिश्रा, आदि से मिलकर उनकी बातें भी प्रकाशित करें । इसके साथ ही उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि झारखंड अलग प्रांत का निर्माण जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था, सत्ता की दिशा उस ओर नहीं जा रही है। फलस्वरुप यहां की भाषा , संस्कृति  पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है । इस दिशा में भी झारखंड के लेखकों को अपनी कलम चलानी चाहिए । गिरिधारी राम गौंझू जी अपनी उक्त टिप्पणी को आधार सूत्र मानकर लिखते रहे थे। 

उन्होंने समय पर मुझे लेख भेज दिया था  मैंने उनके लेख को सचित्र प्रकाशित किया था । लेख प्रकाशन के बाद उन्होंने मुझे बधाई दी थी । उनसे मेरी जब भी बातचीत हुई , उन्हें झारखंड की नहीं बेहद चिंता थी । झारखंड अलग प्रांत के संघर्ष में उन्होंने सौ से अधिक लेख इस आंदोलन को समर्पित किया था । यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण जी ने गिरिधारी राम गोंझू के संबंध में ठीक ही लिखा है कि 'वे एक सहज सरल, मृदुभाषी व्यक्ति थे । उनका अंदर और बाहर एक समान था । वे जब भी किसी से मिलते थे, उनके चेहरे की खुशी देखते बनती थी'।

 मेरी कई रचनाएं उनकी रचनाओं के साथ  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक साथ छपी थी । मिलने पर वे रचनाओं के मुत्तलिक  जरूर कुछ कहते थे । उनके सुझाव बहुत ही बहुमूल्य हुआ करते थे । वे रामदयाल मुंडा, बी .पी. केसरी ,अशोक प्रियदर्शी , बलबीर दत्त, हरिवंश जैसे शिक्षाविदों के एक प्रिय लेखक रहे । झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री बलवीर दत्त उनकी बड़ी तारीफ करते हैं । 

 गिरिधारी जी एक मिलनसार व्यक्ति थे । हमेशा दूसरों के सुख - दुख में मदद किया करते थे।  उनका यह मिलनसार व्यवहार आजीवन बना रहा । हिंदी साहित्य और नागपुरी भाषण पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी ।  वे जितना लिखते थे । उससे कहीं ज्यादा पढ़ते थे । उनकी रचनाओं में गहराई होती है । उनकी रचनाएं लोगों में आशा की किरण पैदा करती हैं । जब वे मंच से अपनी बातों को रखते थे । उनकी बातें भी गहरी होती थी।  वे जिस विषय पर अपनी बातों को रखते थे । बहुत ही तन्मयता के साथ रखते थे । बिल्कुल विषयातर नहीं जाते थे । वे गहराई के साथ अपनी बातों को रखते थे । लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते थे ।

झारखंड की लोक कला विकास, भाषा विकास और नृत्य विकास के प्रति उनकी रचनाएं निरंतर समय से संवाद करती रहेगी । उन्हें गर्व था कि उनका जन्म एक झारखंडी परिवार में हुआ । वे  झारखंड की रीति रिवाज को सहेजना चाहते थे । इसे आगे बढ़ाना चाहते थे। इस निमित्त उन्होंने असंख्य लेख लिखा जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है । अब वे  उम्र के जिस पड़ाव पर  पहुंच चुके थे ।  उन्होंने  लेखों का संकलन और संपादन प्रारंभ कर दिया था । लेकिन उनका यह कार्य  अधूरा रह गया । उनकी छोटी - बड़ी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । उन्होंने जितना लिखा है ,मेरी दृष्टि में पच्चास से अधिक पुस्तकें तैयार हो सकती हैं । लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह  गया । 

 मैं झारखंड के मुख्यमंत्री से आग्रह करना चाहता हूं कि सरकारी स्तर पर  गिरिधारी राम गौंझू जी के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे पड़े लेखों को संग्रहित कर पुस्तक का रूप  प्रदान किया जाए । यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 झारखंड अलग प्रांत की लड़ाई में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गिरिधारी राम गौंझू झारखंड के जाने-माने चिर परिचित लेखक थे । उनकी रचनाएं हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, खबर मंत्र, देशप्राण सहित देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती थी। झारखंड के  पर्व - त्योहारों पर उनकी रचनाएं काफी जानकारियों से युक्त होती थी । अब वे हमारे बीच नहीं है। उनकी रचनाएं नई पीढ़ी को सदा  जागरूक करती रहेगी। उनका इस धरा पर जाना अपूरणीय क्षति है ।


विजय केसरी,

 (कथाकार स्तंभकार) ,

पंच मंदिर चौक , हजारीबाग - 825 301,

 मोबाइल नंबर  92347 99550.

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

सुनील सक्सेना की तीन रचनाएँ

कहानी / रंग दी कोरी चुनरिया / सुनील सक्‍सेना


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“मां मैंने आपको फोन पर पहले ही कह दिया था कि इस बार होली पर अनरसे आप मेरे आने के बाद ही बनाना । मुझे सीखना है, आप कैसे बनाती हैं ? मैंने एकाध बार कोशिश भी की पर हमेशा बिगड़ जाते हैं ।  कोई स्‍वाद ही नहीं आता… क्‍या भाभी आपने भी मां को नहीं रोका… ।” शादी के बाद सुमन की मायके में पहली होली है । पतिदेव को अनरसे बेहद पसंद हैं । सुमन ने वादा किया था कि इस बार होली पर मां से लज्‍जतदार अनरसे का सीक्रेट पता करके ही आएगी । अब गई बात अगली होली तक ।

सुमन जानती है कि मां सिर्फ होली पर ही अनरसे बनाती हैं । विक्रम भैया तो अनरसे के दीवाने थे । फौज में थे । अक्‍सर छुट्टियों की प्‍लानिंग वो ऐसी करते थे कि होली का त्‍योहार  घर पर सबके साथ मिलकर सेलीब्रेट करें । वो होली का ही दिन था, जब हेडक्‍वार्टर से विक्रम भैया की शहादत की खबर आई थी । घाटी में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे । किसी तेज भूकंप की तरह बुरी तरह से तहस-नहस हो गया था हमारा परिवार । भाभी प्रेगनेंट थीं । पापा को दिल का दौरा पड़ा । इस सदमें से मां आज तक उबर नहीं सकी हैं ।


बीते चार साल से मां हर होली पर अनरसे बनाती है । डिब्‍बे में अनरसे पेक कर के भाभी को इस हिदायत के साथ सुपुर्द करती हैं कि डिब्‍बा तभी खोलें जब विक्रम आएगा । मां किसी को डिब्‍बा छूने तक नहीं देती । अनरसों पर फफूड़ी जम जाती है । पापा कुछ दिनों बाद चुपचाप डिब्‍बे से अनरसे निकालकर बगीचे में फेंककर उस पर मिट्टी डाल देते हैं, ताकि मां की नजर न पड़े ।


“किसके लिए बनाती हो तुम ये सब…? विक्रम को मरे हुए चार साल हो गये हैं । वो अब कभी नहीं आयेगा तुम्‍हारे अनरसे खाने के लिए ।” पापा मां को समझाते हैं,  लेकिन मां इस सच को स्‍वीकार ने के लिए तैयार नहीं है कि विक्रम भैया अब इस दुनिया में नहीं हैं । मां को आज भी लगता है विक्रम भैया वर्दी पहने घर आयेंगे और सीधे किचन में अनरसे के डिब्‍बे पर टूट पड़ेंगे बिल्‍कुल वैसे ही जैसे वे दुश्‍मन पर टूट पड़ते थे ।


“मां आपने भाभी के बारे में कुछ सोचा ? आखिर कब तक आप उन्‍हें इस तरह घर में रखेंगी ? अभी तो आप और पापा जिंदा है । आप दोनों के जाने के बाद भाभी का क्‍या होगा, कभी सोचा है आपने  ? भाभी की उम्र ही क्‍या है । कल को आशु बड़ा होगा । उसकी पढ़ाई लिखाई,  उसका भविष्‍य कौन देखेगा ये सब ? लंबी जिंदगी पड़ी है भाभी के सामने । अकेले जीवन बिताया तो जा सकता है जीवन जिया नहीं जा सकता मां ।”  सुमन भाभी की दूसरी शादी की बात न जाने कितनी बार दोहरा चुकी है, पर मां को विक्रम भैया का प्रतिरूप आशु में  दिखता है  । प्राण बसते हैं मां के आशु में । आंख की पुतली है आशु मां के लिए ।  भाभी और आशु को वो किसी भी कीमत पर अपने से जुदा नहीं करेंगी ।  


“किससे करवा दें शादी ? शादी के दिन से ही बिरादरी में बेचारी अभागिन होने का कलंक ढो रही है । क्‍या राह चलते किसी भी लड़के से बांध दूं अपनी बहू को ? कौन करेगा शादी ? तुम ही बताओ ?” मां ने पहली बार भाभी के पुर्नविवाह को लेकर मन में बंधी गिरह को खोला । 


                 “राहुल …”  सुमन ने तपाक से कहा ।


राहुल और विक्रम बचपन के  जिगरी दोस्‍त थे । विक्रम और राहुल के घरों की दीवारें एक दूसरे से लगी हुई थीं । दोनों की खूब छनती थी । बरसों लंगोटी में फाग खेली थी दोनों ने ।  विक्रम का राहुल के साथ उठना बैठना मां को पसंद नहीं था । विक्रम मेधावी था । राहुल पढ़ने-लिखने में कमजोर,  लेकिन मेहनती था । राहुल के पिता की किराने की छोटी सी दुकान है । घर किराने की आमदानी से चलता है ।


“राहुल…!  होश में तो हो तुम सुमन ? क्‍या कह रही हो ? वो हमारी जाति का नहीं है तुम अच्‍छी तरह से जानती हो । भला उससे हमारे  खानदान का क्‍या मेल ?” राहुल का प्रस्‍ताव मां की कल्‍पना से परे था ।


“किसकी जाति की बात कर रही हैं मां ?  आप वो दिन भूल गई जब विक्रम भैया की ऐन  शादी वाले दिन अचानक तबियत खराब हो गई थी । सारे शरीर पर दाने हो गए । स्‍मॉल पॉक्‍स । तेज बुखार  । विक्रम भैया दो कदम चलने की हालत में नहीं थे । बारात निकलने की तैयारी हो गई थी ।  क्‍या होगा ?  घर मेहमानों से भरा था । शादी टाली नहीं जा सकती थी । हमारे रिश्‍तेदारों में से कोई भी अपने लड़कों  को भैया कि पगड़ी-सेहरा लेकर भाभी के घर तक बरात लेकर जाने को तैयार नहीं था । सब भाभी के ग्रहों को दोष दे रहे थे । अपशकुनी, अभागिन और न जाने क्‍या-क्‍या कहा लोगों ने भाभी को । तब ये राहुल का परिवार ही था मां जिसने हमारी संकट की घड़ी में मदद की । राहुल ही था जो विक्रम भैया की पगड़ी-सेहरे को थाल में रखकर दूल्‍हे के सांकेतिक रूप में,  भाभी के घर गया था । उस ही की वजह से हमारे घर में भैया की शादी की रस्‍में पूरी हों सकीं । क्‍या बुराई है राहुल में ? विक्रम भैया के जाने के बाद आप लोगों की हर परेशानी में राहुल एक पैर पर खड़ा रहता है । सज्‍जन है । ईमानदारी से गुजारे लायक कमा ही लेता है । भाभी और आशु को खुश रखेगा मां ।” सुमन के मन की बात का बांध टूट गया ।


“सुमन ठीक कह रही है… राहुल और उसके घरवालों को हम बरसों से अच्‍छी तरह जानते पहचानते हैं । अच्‍छे पड़ोसी हैं हमारे । हर सुख-दुख में राहुल का परिवार हमारे साथ रहा है ।” पापा ने सुमन की बात को संबल देते हुए कहा ।


मां खामोश थीं । उनकी खामोशी में अहम निर्णय  की गूंज सुनाई दे रही थी ।  घर के बाहर होली का हुड़दंग शुरू हो गया था । आशु को  पिचकारी का इंतजार था । राहुल  कल ही आशु के लिए पिचकारी लाने का वादा करके गया था । राहुल को दरवाजे पर देखते ही आशु दौड़कर उसके पास गया और उसके हाथों से पिचकारी छीन ली । सुमन अंदर अबीर की थाली लेने के लिए भागी । राहुल ने मां के पैर छुए, माथे पर गुलाल लगाया । भाभी दरवाजे पर रखी बाल्‍टी में आशु के लिए रंग घोल रही थीं । 


“राहुल बेटा हर बार तुम होली पर हम सबको तुम रंगते थे,  हमारी बहू पूजा कोरी रह जाती थी । क्‍या  तुम मेरा बेटा विक्रम बन मेरी बहू  के संग होली खेलोगे ?”  राहुल ने पास में खड़ी सुमन के हाथ से रंगबिरंगे गुलाल की थाली ली और पूजा के चहरे पर अबीर मल दिया ।


“बहू बस यूं ही खड़ी रहोगी । जाओ अंदर से अनरसे ले आओ । और हां सुनो पूरा डिब्‍बा लाना मेरे बेटे राहुल के लिए …”


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होली का चंदा:/  सुनील सक्‍सेना


                अपना तो पूरा साल किसी न किसी मौके पर चंदा देते हुए ही निकल जाता है ।  होली का चंदा, गणेश जी का चंदा, नवरात्रि का चंदा । यानी जैसे ही त्योहारों का मौसम आता है, इन चंदा मांगनेवालों का धंधा जोरों  पर चलने लगता है और अपनी जेब ढीली होने लगती है  । गली-मोहल्‍ले के शोहदे चंदे के रसीद कट्टे बगल में दबाये झुंड के साथ चंदा मांगने निकल पड़ते हैं । बात जब होली के चंदे की हो तो अपनी लानत-मलामत के डर से अच्‍छे-अच्‍छे सूरमा अपनी अंटी ढीली कर देते हैं ।


               चंदा वसूली का ये धंधा त्‍यौहारों तक ही सीमित होता तो भी गनीमत थी । हालात ये हैं कि चंदा मांगनेवाले कोई भी अवसर नहीं चूकते । चुनावों में चंदा मांगना तो चंदों की सूची में अव्‍वल पायदान पर है । वार्ड के चुनाव हों तो पानवाले-गुमटीवालों से चंदा,  विधान सभा के चुनाव हों तो नगर सेठ से चंदा,  लोकसभा चुनाव हो तो बिरला- टाटा- अंबानी अडानी से चंदा । और जब देश कंगाली की कगार पर पहुंच जाये तो आइ.एम.एफ. तक से चंदा मांगने में ये कोई गुरेज नहीं करते ।


               चंदा मांगनेवाली इस प्रजाति का दुष्‍प्रभाव मुझ पर कुछ इस कदर हुआ कि अब आलम ये है कि ‘चंदा’ शब्‍द मेरी ‘चिढ़ान’  हो गई है । इन  नामुराद चंदेवालों की चंदा उगाही से नफरत के चक्‍कर में कम्‍बखत मेरी चंदा ने भी अब ख्‍वाबों में आना छोड़ दिया है । आपको भले ही चंदामामा में सूत कातती चरखे वाली बुढ़िया नजर आती हो मुझे तो हर पूरनमासी को चांद एक कटोरा लगता है जो तारों के शहर में कटोरा लिये चंदा मांगने निकल पड़ा हो ।


                वैसे इस बार मैंने ठान लिया था कि होली पर चंदा नहीं दूंगा । अब भला ये भी कोई बात हुर्ई कि आप हमारे गाढ़े खून-पसीने की कमाई से चंदा ले जायें और हमारे ही सामने उसी पैसे से गुलछर्रे उडायें । लेकिन साहब जवाब नहीं हमारे मोहल्‍ले के छोकरों की ‘कनविंसिंग पॉवर’ का । ऐसा लगता है जैसे किसी “नेशनल इंस्‍टीटूयट ऑफ चंदा उगाही”  से विधिवत प्रशिक्षित हों ।  दो मिनिट में ही मुझे चंदा देने के लिए मजबूर दिया । ग्‍यारह,  इक्‍कीस नहीं पूरे एक सौ एक रूपये झटक लिए ।


              वही हुआ जैसा सोचा था ।  रात को नुक्‍कड़ पर बाइक पर सवार बियर की बोतलें लिये  ‘चंदा कलेक्‍टर्स’  होलीका दहन का लुत्‍फ ले रहे थे । मैंने एक बार फिर चंदा न देने की कसम खाई । तभी पीछे से आवाज आई ।    क्‍या सोच रहे हैं अंकल ...? किस बात का मलाल कर रहे हैं ...? चंदे का धंधा सर्वव्‍यापी है.. दुनिया चंदे पर चल रही है । आप नाहक परेशान हो रहे हैं ।  होली  है.. मौका भी है.. दस्‍तूर भी है… बियर भी चिल्‍ड है.. एक घूटंमार लें अंकल । कलेजे को ठंडक मिल जायेगी । वैसे बुरा लगा हो तो माफ करना अंकल । होली है .. बुरा न मानो होली है ।


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व्‍यंग्‍य / सत्‍य पराजित नहीं होता /   सुनील सक्‍सेना


                               मार्निंग वॉक पर कुछ दूर तक खामोश चलने के बाद उन्‍होंने मुझसे पूछा “क्‍या सत्‍य बोलना बुरा होता है ?”  मैं सुबह-सुबह कृष्‍ण-अर्जुन के  महाभारत टाइप वाले सवाल के लिए कतई तैयार नहीं था ।    मुझे इस तरह के दार्शनिक सवालों  के उत्‍तर देने का न कोई तजुर्बा है, न ही ज्ञान  । वे मेरे हमजोली हैं । अपने मन की बात मुझसे ही करते हैं  ।  


मैंने कहा – “ये इस बात पर डिपेंड करता है कि बोले गए “सत्‍य” का स्‍वरूप कैसा है ?”  


वे बोले – “मतलब ?”


मैंने कहा- “सत्‍य दो प्रकार के होते हैं । एक सत्‍य तो “कड़वा” होता है । सब जानते हैं ।  दूसरा सत्‍य “चिरपिरा” होता है ।  ऐसे सत्‍य को बोलने से सामने वाले को मिर्ची लगती है । गुजिश्‍ता दौर में जब इंसानी फितरत में मिठास होती थी, तो कोई किसी के मुंह पर सच बोल दे तो,  सत्‍य बस थोड़ा कड़वा लगता था । बंदे में सच सुनने का माद्दा था । आलोचना सह लेता था । आज के दौर में आप सत्‍य बोलो तो आदमी बिलबिला जाता है, । सुलग उठता है  । तुरंत प्रतिशोध लेने पर उतर आता है ।”


मेरे उत्‍तर से वे संतुष्‍ट नहीं हुए । कहने लगे – “थोड़ा तफसील से समझाइये । और हां एक पूरक प्रश्न का उत्‍तर भी दीजिए,  सत्‍य बोलने वाला कभी पुरस्‍कृत होता है और कभी दंडित । ऐसा क्‍यों ?”


उदाहरणों से बात जल्‍दी समझ आती है । मैंने स्‍वंय के साथ घटित घटना सुनाई । बचपन में मेरा पड़ोस के शर्माजी के लड़के से झगड़ा हो गया । शर्माइन शिकायत लेकर हमारे घर आईं बोलीं – “आपके लड़के ने हमारे बेटे बल्‍लू  को मारा ।” पिताजी ने पूछा – “चाची जो कह रही  हैं सच है ? मैंने  निर्भीकता    से कहा-  “सत्‍य है । बल्‍लू ने मुझे गाली दी । वो भी ऐसी वैसी नहीं बहुत गंदी ।” पिताजी ने मेरी पीठ ठोकी । बोले – “ठीक किया । गलत बात का हमेशा विरोध करो ।” उन्‍होंने  एक रूपए का सिक्‍का मेरी बहादुरी और सच्‍चाई के लिए इनाम में दिया ।


दूसरा  वाकया मेरी किशोर अवस्‍था का है । मैं कमरे में पढ़ रहा था । अचानक पिताजी आगए । कमरे में कुछ देर रूकने के बाद बोले – “तुमने सिगरेट पी ?” मैं सत्‍यवादी बनने के पथ पर अग्रसर था । मैंने कहा – “जी हां… वो भी आपके ही पैकेट से निकालकर ।” बस फिर क्‍या था । कुटाई, पिटाई, ठुकाई कुछ भी कहलो उस दिन  सच बोलने का जो दंड मिला आज भी याद है ।”


 मैं सोच रहा था, मेरे सखा तो रोज पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, किसान आंदेलन, कोविड वेक्‍सीन,  बंगाल के चुनाव, करीना की होनेवाली डिलेवरी, जैसे मुद्दों पर बात करते हैं,  आज ये सत्‍य की चर्चा कैसे ? मैंने पूछा – “क्‍या बात है मित्र ये अचानक सत्‍य की खोज कैसे  ?”


वे बोले – “कल रात मैंने एक भयानक सपना देखा । “सत्‍य” को गिरफ्तार कर लिया है । सत्‍य के हाथ में हथकडि़या हैं । पैरों में बेडि़या डली हुई हैं । सत्‍य चीख रहा है । बेबस है । छटपटा रहा है । मदद की गुहार कर रहा है । लोग मौन खड़े हैं । आंखें बंद । कान बंद । लाचार । तमाशबीन । निर्जीव पाषाण मूर्तियों की तरह । सत्‍य के पक्ष में बोलने से डर रहे हैं लोग । मैं आवाज उठाने की कोशिश कर रहा हूं 1 मेरा गला किसी ने दबा दिया है । मैं घबराकर उठ जाता हूं ।”


            वे भावुक हो गए । मैंने अपना हाथ उनकी ओर बढ़ाया । बस इतना ही कह सका- “सत्‍य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं ।”


 


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शनिवार, 10 अप्रैल 2021

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के संग कुछ प्रसंग / मुकेश pश प्रत्यूष praytush

 काश! मेरा कहा सच हो जाता : जानकी वल्लभ शास्त्री /  शास्त्री जी के संग मुकेश  प्रत्यूष की कुछ आत्मीय भेंट मुलाक़ातों की दास्तान 


आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री से मेरी पहprtली म गया जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन में हुईyush थी। अधिवेशन के बाद कवि-सम्मेलन का कार्यक्रम था। राज्य-भर के प्रतिष्ठित कवि आमंत्रित किये गये थे।  शास्त्रीजी उनमें सबसे अलग दिखते थे। उन्होंने अपनी उसी कविता का पाठ किया जो हमें पढ़ाई जाती थी और हमें प्रिय भी थी। उनके स्वरों की अनुगूंज अबतक जेहन में होती रहती है - कुपथ-कुपथ रथ दौड़ाता जो पथ निर्देशक वह है। चुनौति देता हुआ लहजा - उतर रेत में। कवि-सम्‍मेलन की अध्‍यक्षता और संचालन वही कर रहे थे मेरी कविता पर कुछ औपचारिक प्रतिक्रियाएं दी। अलग से कुछ कहा नहीं, मैंने भी पूछना उचित  नहीं समझा।  मंच पर कोई किसी को क्‍या कह सकता है।  कवि सम्मेलन के बाद मैं उनके कमरे तक साथ-साथ गया उन्हें तत्काल मुजफ्फरपुर के लिये निकलना था। आयोजकों ने अन्य चीजों के साथ-साथ उन्हें ले जाने के लिये तिलकुट भी दिचा जिसे देखते ही उन्होंने कहा यहां कि लाई भी अच्छी होती है वह मंगवा दे सकते हैं क्या ? किसे इंकार होता आनन-फानन में रमना (गया का एक मुहल्ला जहां अच्छी लाई - तिलकुट  आदि बनते-बिकते हैं) से लाई मंगवा कर उनकी गाड़ी में रखवा दी गई। बस यहीं तक थी हमारी पहली मुलाकात।


इस घटना के लगभग दस  वर्षों के बाद अपनी  छोटी बहन की शादी के सिलसिले में गोपेश्वर सिंह (आलोचक और दिल्ली  विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर),  जो तब पटना विश्वविद्यालय  में अध्यपान करते थे और गोपेश परीक्षित के नाम से लिखते थे,  के साथ मैं मुजफ्फरपुर गया। लड़के वाले गोपेश्वरजी के  परिचित थे लेकिन किन्हीं कारणों से वहां रिश्ता संभव होता नहीं दिखा।  हम चुपचाप स्टेशन चले आये। वहीं भागीरथ होटल में खाना खाया। गोपेश्वरजी अपने विद्यार्थी जीवन में वहां वर्षों खा चुके थे और उसके प्रशंसक भी थे। तय था कि खाना खाकर हम शास्त्रीजी से मिलने जायेंगे। भर रास्ते रिक्शे पर वे मुझे शास्त्री की पसंद और नापसंद बताते रहे। वे उनके यहां अपने विद्यार्थी जीवन में वर्षों रह चुके थे। उसी क्रम में कहा कि बाहर से आये किसी रचनाकार के यह कहने पर कि खाना खाकर आया हूं उन्हें दुख होता है। उन्हें लगता है कि उनके अतिथि-सत्कार में कोई कमी है। इसलिये आप यह मत कहियेगा कि हम अभी-अभी खाकर आये हैं। कोई और बात कह दी जायेगी। यह भी कि वे आपको तो अपने सामने बिठाकर खिलायेंगे लेकिन  खुद किसी के सामने कुछ नहीं खाते उन्हें डर रहता है कि उन्हें किसी की नजर लग जायेगी। 

 

शास्त्रीजी के घर पहुंचा तो लगा जैसे शहर के बीचा-बीच बसे किसी गांव में आ गया हूं। पेड़-पौधों से आच्छादित परिसर, इधर-उधर दौड़ते कुत्ते-बिल्लियां, रंभाती कई-कई गायें, बछड़े। बरामदे में चौकी पर गोद में बिल्लियों के बच्चों को लेकर बैठे शास्त्रीजी। 


प्रणामपाती के बाद मैंने गया की मुलाकात की चर्चा की। उन्हें याद थी।  श्यामा अभी-अभी छप कर आई थी। उन्होंने उसकी कुछ  कवितायें सुनाई। काफी समय बिताकर जब हम लौटने लगे तो उन्होंने श्यामा की प्रतियां हमें दीं।  


फिर एक अंतराल। 


लगभग पन्द्रह वर्षों  के बाद मैं एक बार फिर मुजफ्फरपुर गया लेकिन इस बार उसी दिन आने के लिये। कुछ वर्षों के लिये। मेरी पदस्थापना उसी शहर में हो गई थी। कार्यालय से थोड़ी दूरी पर ही शास्‍त्रीजी का घर था।   पहुंचा। वे बरामदे में चौकी पर सिर झुकाये बैठे हुये थे। नितांत अकेले। दिन-दुनिया से बेखबर। चलने-फिरने से लाचार। मांजी रसोई में थीं। देखते ही पूछा  कहिये कैसे आना हुआ।  मेरे बताने पर कहा अच्‍छा हुआ। और पूछा - 

कुछ खाया-पिया है या नहीं फिर मांजी को आवाज लगाई - बहूजी, कहां है ? मुकेशजी आये हैं कुछ खाना-वाना खिलाइयेगा?


गोपेश्वरजी की सीख मैं भूल गया,  इंकार करते हुये कहा - अभी-अभी खाकर आया हूं आज छोड़ दें अब तो अक्‍सर आना-जाना होगा। किसी और दिन खा लूंगा। वह भी कुछ बदल गये थे। नाराज नहीं हुये कहा कुछ तो लेना ही पड़ेगा। स्टील तथा प्लास्टिक के कई डिब्बे उनके आस-पास रखे हुये थे। उसी में से एक को खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया, उसमें मावे के बर्फी थे।  डब्बा खुलते ही उसकी ओर शास्‍त्रीजी के आस-पास खेल रहे कुत्ते उसकी ओर लपके, शास्त्रीजी ने डिब्‍बे में से  कुछ टुकड़े निकाले और धमाचौकड़ी मचा रहे उन नन्‍हें पिल्‍लों को खिलाने लगे ठीक वैसे ही जैसे कोई पिता अपने छोटे प्यारे बच्चों के मुंह में मिठाई का टुकड़ा डालता है।  लेकिन इस दृश्य को देखने के बाद  उस बर्फी को खाना मेरे लिए  किसी भी स्थिति में संभव नहीं रह गया था। कुछ औपचारिक शब्‍द कह कर हाथ जोड़ता इससे पहले ही कवयित्री रश्मिरेखा आ गईं। मेरा संकोच समझते हुए कहा अभी मीठा रहने दीजिए मैं इन्‍हें  अपने यहां चाय पिलाने ले जा रही हूं। घर ले जाकर ऐसी घटनाएं रोज ही होती हैं। मुझे रोज ही कुछ लोगों को इस संकट से निकालना होता है। कुत्‍ते-बिल्लियों को अपनी ही थाली में खिलाते हैं और सबको अपनी ही तरह समझते हैं।  


बाद के दिनों में शास्‍त्रीजी पर उम्र का प्रभाव काफी हद तक  पड़ गया था। बातों का क्रम प्राय: टूट जाता था। एक ही बात को हर थोड़ी देर के बाद कहते थे। बचपन की स्मृतियां, माता-पिता  की यादें प्राय: आती रहती थीं। शहर के लोगों से, खासकर रचनाकारों से शिकायतें रहती थी। अक्सर कहते कोई देखने नहीं आता।। कोई मिलने नहीं आता।। अब किसी को मुझसे क्या फायदा हो सकता है कि कोई आये।। प्राणपण से शास्‍त्रीजी की सेवा करने वाली मांजी से भी कई-कई शिकायते थीं।  उनका ध्यान नहीं रखती,  उनके भाई जब भी आता है – मेरे बारे में अपनी बहन से पूछता है अब तक जिन्दा हैं ही। और, यह सुनकर भी उसका तिरस्कार करने की बजाय ख्याल रखती हैं,  उसकी मदद करती हैं। मेरा हमेशा एक ही उत्‍तर होता  यह आपका वहम है। सब आपको  बहुत प्यार करते हैं। मांजी तो जान से ज्यादा मानती हैं। तब वे बालसुलभ ढंग से कहते हां ऐसा है। लेकिन मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है। इन बच्चों (पालित कुत्ते-बिल्लियां) ने भी कुछ नहीं खाया है। मांजी कहतीं नाश्ता कर चुके हैं। कहतीं अभी तो आपने खाया है। तब कहते हां-हां खाया तो है। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद वही बातें। प्राय: गुस्से में खाना छोड़ देते। दो-दो दिनों तक खाना नहीं खाते कमजोरी बेतहाशा हो जाती। उनके उपवास के कारण मांजी भी उपवास करतीं उनकी तबियत भी बिगड़ जाती। ऐसे में  रश्मिरेखा को आगे आना पड़ता। अपना सब काम-धाम छोड़कर आतीं मान-मनौव्वल करतीं। कहतीं अच्छा मैं अपने घर से कुछ बनाकर लाऊं तो खायेंगे न वे हामी भरते तो दौड़कर जातीं रोटी-सब्जी, ब्रेड पकौड़ा या और कोई चीज बनाकर लातीं फिर मनाकर, बहलाकर खिलातीं, उनके खाने के बाद मांजी को खिलातीं। मैं मेूक गवाह बना रहता।  


शास्‍त्रीजी अक्सर अपनी   बीमारी की चर्चा करते। बातचीत के क्रम में कई बार पूछते मैं आपको ठीक दिख रहा हूं। सिर गर्म है। एक दिन मैंने देखा पलंग पर बैठे हैं और मग में पानी ले-लेकर सिर पर थोप रहे हैं। मैंने पूछा यह क्या कर रहे हैं तो कहा गर्मी से सिर फटा जा रहा है। जाड़े में कमरे में ही ढेर सारी लकड़ियां जलवा लेते। पूरे कमरे में धूल और धुंआ भर जाता। कई बार तो किसी और के  लिये बैठना मुश्किल हो जाता। 


निधन से सप्ताह भर पहले उनसे हुई मुलाकात मेरी अंतिम थी। मांजी की तबियत खराब थी और खुद से ज्यादा उनकी चिन्ता कर रहे थे। मांजी के प्रति उनका ममत्व देखकर मन भर आया था।


कुत्ते-बिल्लियों की ओर देखते हुये कहा पता नहीं मेरे बाद इनका क्या होगा। मैंने कहा अभी आपको कुछ नहीं होगा। शतायु होंगे आप। 


लेकिन अगली मुलाकात हो इससे पहले ही रश्मिरेखा का फोन आ जाता है शास्त्रीजी नहीं रहे।  


काश! मेरा कहा सच हो पाता ।

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...