गुरुवार, 26 अगस्त 2021

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ (Indian

 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ (Indian Independence Act 1947) युनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट द्वारा पारित वह विधान है जिसके अनुसार ब्रिटेन शासित भारत का दो भागों (भारत तथा पाकिस्तान) में विभाजन किया गया। यह अधिनियम 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में पेश हुआ और 18 जुलाई 1947 को स्वीकृत हुआ और १५ अगस्त १९४७ को भारत बंट गया। भारतीय संवैधानिक विकास के क्रम में अनेक विधेयक ब्रिटिश संसद ने पारित किए लेकिन सन् 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के लिए अंतिम किन्तु सबसे अत्यधिक महत्वपूर्ण अधिनियम था। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम द्वारा भारत ने 200 वर्ष से चल रहा ब्रिटिश शासन से मुक्ति प्राप्त की।माउंटबेटन योजना के अंतरगत

रक्षाबंधन पर दिनेश श्रीवास्तव की कुण्डलिया-

 



                         ( १)



राजा बलि के पास से,मुक्त हुए भगवान।

दानवीर ने वचन का,किया सदा सम्मान।।

किया सदा सम्मान,सूत्र रक्षा कहलाया।

लक्ष्मी हुईं अधीर,पुनः प्रभु को लौटाया।।

वचनबद्ध हो वीर, लोक पाताल विराजा।

दानवेन्द्र था धीर,प्रतापी अद्भुत राजा।।


                        (२)


रक्षाबंधन में बँधे, छोड़ भगे सब काज।

जहाँ पुकारीं द्रौपदी,वहीं बचाने लाज।

वहीं बचाने लाज,भागकर प्रभुवर आए।

वचनबद्धता धर्म,कृष्ण को अतिप्रिय भाए।

देव-दनुज-गंधर्व, इंद्र,मानव, यदुनंदन।

सबका है प्रिय पर्व,आज का रक्षाबंधन।।


                     (३)


रक्षाबन्धन के लिए,बहना है तैयार।

लिए आरती थाल को,और लुटाने प्यार।।

और लुटाने प्यार,आज त्यौहार मनाने।

भाई भी तैयार,खड़ा है फर्ज निभाने।।

करता 'चन्द्र दिनेश' सभी का है अभिनंदन।

आओ मिलकर आज,मनाएँ रक्षाबन्धन।।


                       (४)


रक्षा- सूत्र बँधाइये,पर हो इतना ध्यान।

महिलाएँ अबला नहीं,हो इसका संज्ञान।।

हो इसका संज्ञान,आज सक्षम है नारी।

दुर्गा काली रूप,नहीं है वह बेचारी।।

नारी आज 'दिनेश',सभी क्षेत्रों में दक्षा।

खुद सक्षम हैं आज,नहीं आवश्यक रक्षा।।


                   दिनेश श्रीवास्तव

                    ग़ाज़ियाबाद

बुधवार, 25 अगस्त 2021

गोस्वामी तुलसीदास जी के कुछ विख्यात दोहे*

. तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग।

सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, इस संसार में तरह-तरह के लोग रहते हैं. आप सबसे हँस कर मिलो और बोलो जैसे नाव नदी से संयोग कर के पार लगती है वैसे आप भी इस भव सागर को पार कर लो.


२. आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न ही स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो.


३. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य और राम ( भगवान ) का नाम.


४. काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।

तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं. तब तक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक ही जैसे होते हैं.


 ५. दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, धर्म का मूल भाव ही दया हैं और अहम का भाव ही पाप का मूल (जड़) होता है. इसलिए जब तक शरीर में प्राण है कभी दया को नहीं त्यागना चाहिए.


६. तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।

बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर॥


अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं, मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं. किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र है इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करे.


७. तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।

अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, भगवान् राम पर विशवास करके चैन की बांसुरी बजाओ. इस संसार में कुछ भी अनहोनी नहीं होगी और जो होना उसे कोई रोक नहीं सकता. इसलिये आप सभी आशंकाओं के तनाव से मुक्त होकर अपना काम करते रहो.


८. तुलसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन।

अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिहै कौन॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, वर्षा ऋतु में मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी ज्यादा हो जाती है कि, कोयल की मीठी वाणी उनके शोर में दब जाती है. इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है. अर्थात जब धूर्त और मूर्खों का बोलबाला हो जाए तब समझदार व्यक्ति की बात पर कोई ध्यान नहीं देता है, ऐसे समय में उसके चुप रहने में ही भलाई है.


९. सहज सुहृद गुरस्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥


अर्थ : स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह दिल से बहुत पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है.


१०. मुखिया मुखु सो चाहिऐ, खान पान कहुँ एक।

पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है.


११. तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।

भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण॥


अर्थ : तुलसीदास जी कहते हैं, समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. अर्जुन का वक्त बदला तो उसी के सामने भीलों ने गोपियों को लूट लिया जिसके गांडीव की टंकार से बड़े बड़े योद्धा घबरा जाते थे.


*🙏🏻🙏🏻जय श्री राम🚩🚩*

रविवार, 22 अगस्त 2021

सिर्फ बिहार में बिहारी शब्द

 पेश हैं कुछ ऐसे शब्द और बातें जो सिर्फ बिहार के लोग सही से बोल पायेंगे:-


1.बलवा काहे नहीं कटवाते हो जी


2.मिज़ाज लहरा दिया


3.तनी-मनी तरकारी दे दो


4.अभरी गेंद ऐने आया तो ओने बीग देंगे


5.बिस्कुटिया चाय में बोर-बोर के

खाओ जी


6.छुच्छे काहे खाना खा रहे हो


7.काम लटपटा गया है


8.बड़ी भारी है-दिमाग में

कुछो नहीं ढ़ूक रहा है


9.बदमाशी करबे त नाली में गोत देबौ


10.सत्तू घोर के पी लो


11.तखनिए से ई माथा खराब कैले है. :


अऊर सुनिये...

१२.बरसतवा में छतवा चुवे लगता है मरदे!


१३.नरभसाइये मत


१४. मार मार के भुरकुस छोड़ा देंगें


१५.कपड़वा पसार दो


१६.ए मरदे, ई का कह रहे हैं?


१७.जादे बोलियेगा तो मुंहवे नोच लेंगें

 Proud to be Bihari 

.काहे की-

हमलोग के यहाँ idiot नहीं "बकलोल"होता है।।

हमलोग कटने पे बोरोलीन लगाते हैं, क्यूंकि

      dettol से "परपराने" लगता है।।

हमलोग जान से नहीं ना मारते हैं

     "मार के मुआ देते हैं"।।

हमलोग गला दबाते नहीं

     "नट्टी टीप देते हैं"।।

हमलोग awsome काम नहीं करते 

      "गर्दा उड़ा देते हैं"।।

हमलोग tension में नहीं आते बस

      "हदस" जाते हैं।।।

हमलोग का bad day नहीं होता बस 

      "जतरा खराब होता है"।।

हमलोग का कपड़ा धोया नहीं

      "फिंचा" जाता है।।

हमलोग ताकत नहीं

      "बरियारी" दिखाते हैं।।

हमारे लिए train चलती नहीं

      "खुल" जाती है।।

हमारे यहाँ बच्चा नहीं

      "बाल-बुतरू" होता है।।

हमलोग show off नहीं

      "सुखल फुटानी" करते हैं।।

हमारे यहाँ कोई uncivilized नहीं होता

      बस "चुहाड़" कहलाता है।।

finally we dont believe in          competition काहे की "हमसे कोई सकेगा"

      

      "जय बिहार"

बिहार के कुतवा काटता नहीं, हबक लेता है

बिहार के मच्छर काटता नहीं , भम्भोर लेता है


कैसा लगा बताइएगा😊

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

प्रवीण परिमल की कुछ मगही कविताएं

 प्रवीण परिमल: मगही प्रेम- गीत :


                      #चितचोर

                              


मन-अँगना कुदलक हे चोर,मोर सखिया!

मन-अँगना कुदलक हे चोर!!


ओही से धक्-धक् करेजवा करित हे...

ओही से अँखिया में लोर,मोर सखिया!

मन-अँगना कुदलक हे चोर!! 


पोरसा से उँच्चा छड़प के देवलिया 

अँखिया के कोलकी लुकाएल बवलिया 

हिरदा के डहुँगी पे बइठल कोइलिया...

कैले हे केतना अनोर,मोर सखिया!

मन-अँगना कुदलक हे चोर!!


अइसन बेयार जाने कन्ने से आएल 

तनिके में होसवा के ढिबरी मिंझाएल

निंदियो न बैरिन तखनिंये से आएल...

कँपसित हे अँखिया के कोर,मोर सखिया!

मन- अँगना कुदलक हे चोर!!


खोइँछा के सब्भे सबुरवा लुटाएल 

जब से मुदइया नजरिया में आएल

अइसन उमिरिया ई लिलकी, धधाएल...

रहलइ न मनवाँ पे जोर,मोर सखिया! 

मन-अँगना कुदलक हे चोर!!

 

ओही से धक्-धक् करेजवा करित हे...

ओही से अँखिया में लोर,मोर सखिया! 

मन-अँगना कुदलक हे चोर!!

■■

* मगही श्रमिक गीत ***


तूँही ह पुनियाँ के चान ,  हमर सजनी....

तूँही ह पुनियाँ के चान !


तोरे से बगबग हे मन के अँगनवाँ

तोरे से झकझक परान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


तोरा बतावित ही सच्चे , संघतिया

पहिले त दिनवों अमावस के रतिया

लेकिन गोरइया से तोरे , अन्हरिया --

भागल हे टिकियाउड़ान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


खुब्बे झोलंगा हल झुलझुल उमिरिया

ठोंकलs तू पउअन में प्रीत के पचरिया

नेहिया के डोरिया से फिन तू ओरचलs

जिनगी के खटिया उतान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


हेंगा में हरदम ही रहली नधाएल

तइयो दरदिया न देहिया में आएल

ठेहुँनाभर कादो - बिपतिया में , कहिनों

गिरली न औंधे - चितान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


रोपल असरवा के हरिअर बनैलs

मन के कियारी तू मन से पटैलs

खुसिया के हुलसित जजतिया अगोरलs

बइठल तू मँडुकी - मचान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


मन के ओसरवा के घुन्नल बँड़ेरी

ठेघनी लगावे में कैलs न देरी

अप्पन पसेनवाँ से घर लेवकरलs

कहिनों न होलs हरान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !


तोरे से बगबग हे मन के अँगनवाँ

तोरे से झकझक परान , हमर सजनी

तूँही ह पुनियाँ के चान !

तूँही ह पुनियाँ के चान !!

तूँही ह पुनियाँ के चान !!!



.... प्रवीण परिमल....

:

 परदेस बसल अपन पिया से , एगो बिरहिन के निहोरा .........


मगही गीत

               अब चलि आ...


अब चलि आ रे पियवा ...

अब चलि आ रे पियवा .......

अब चलि आ ;

कि दिनवां बीतल जा हई सवनवां के ...

अब चलि आ !!


छितिजा के छोरवा ले , मन के सबुरवा

पहुँचल ढाहे लागी , हिरदा के कोरवा

सोतिया सुखलs जा हे...

सोतिया सुखलs जा हे , नदिया - नयनवां के ;

अब चलि आ !

कि दिनवां बीतल जा हई सवनवां के ...

अब चलि आ !!


आँख पियरा गेल , ओठ पपड़ा गेल

देहिया के कोंपला भी , सभ्भे मुरझा गेल

हई अब उड़हीं पs...

हई अब उड़हीं पs , सुगवा परनवां के ;

अब चलि आ !

कि दिनवां बीतल जा हई सवनवां के ...

अब चलि आ !!


अँखिया पियासल , तोर दरसनियां के

कनवों पियासल , तोर तनी बनियां के

धुरिया ला ककुला हई ...

धुरिया ला ककुला हई .. मंगिया , चरनवां के ;

अब चलि आ !

कि दिनवां बीतल जा हई सवनवां के ...

अब चलि आ !!


छतिया पs तिरिया , चलावे अब गितिया

देहिया पs बिर्हनी - सन , सखियन के बतिया

अरिया करेजवा पs ...

अरिया करेजवा पs , रतिया गवनवां के ;

अब चलि आ !

कि दिनवां बीतल जा हई सवनवां के ...

अब चलि आ !!


© 


 प्रवीण परिमल: मगही गीत --


दुधवा-नेहाएल चनरमा हो

बगुला नींयन गोर !

देलकइ इँजोरिया के झरना हो

अँगना के पँडोर !!


उमगल पिरितिया के अजगुत कोइलिया 

बजवित हे मनवाँ ई नेह के बँसुलिया 

चन्नन- लपेसल चननियाँ हो 

नाचइ मन के मोर !


आन्हर कोठरिया लुकाएल तरेगन 

जइसे डेरा के छेकुनियाँ से रेंगन 

चंदा - सन अइना अन्हरिया के 

देलकइ झकझोर !


पुरलइ ई बच्छर के मानल मनउती 

लबलब हे मनवाँ के झाँपी अउ पउती 

अमरित के होइत हे बरखा हो

भिंजलइ पोरे -पोर !


पसरल परकिरती के मनहर बिछउना 

लम्हर से लम्हर दुख आज लगे बउना 

मदमातल पुनियाँ के रतिया हो

धमकउआ हे भोर !




#आझ_नैं_बरस

                 ▪प्रवीण परिमल 


आझ नैं बरस रे बदरा ...

आझ नैं बरस रे बदरा .......

आझ नैं बरस !

तनी आवे दे सजन के परदेसवा से ;

आझ नैं बरस !!


जाग - जाग कटऽली रे , असढ़ा के रतिया

तब कहीं आएल एगो पियवा के पतिया

लिखऽ हई अजुए तऽ , आवे ला सनेसवा से ;

आझ नैं बरस !


काम - काज सभ्भे आझ , छोड़ - छाड़ घर के

असरा में भोरहीं से , सजऽ के सँवर के

बइठल ही दुअरे पर , घिर अनदेसवा से ;

आझ नैं बरस !


साज - सिंगार मोरा , कर गुरमाटी नैं रे

रह जाए अखरे ई , बिछवल खाटी नैं रे

धोखा ऐन मोकवा पर , देले हरमेसवा से ;

आझ नैं बरस !


आझ जे बरसबे तू , नटखट बदरा रे

किचकिल गली - कूची , होय जैतई सगरा रे

पिया मोर अयतन फिन , कउन निरदेसवा से ;

आझ नैं बरस !


साफा तनी होय देहीं , करिया अकास रे

पुन बड़ी होतऊ तोरा , रोक लेहीं साँस रे

फिन तू बरस लीहें , चाहे जउन भेसवा से ;

आझ नैं बरस !


                     **********

मगही गीत


                 ▪प्रवीण परिमल 


ई पुनिया के रात हे निरमल, 

बँसुरी तनिक बजावऽ न ! 

हम्मर अँगना में पिरीत के, 

अमरित तू बरसावऽ न !!


फिन तऽ ओही दुपहरिया हे,

ओही घाम कँटैला हे 

फँसरी पर लटकल जिनगी के 

छुँच्छे स्वाद कँसैला है 


मिठका तू पनियाँ चिरुआ भर,

फिन से तनिक पिआवऽ न !


संख नियन गोरकी माटी के, 

देख लगल हे कठमुरकी

मुस्काइत हे हरियर मन, 

नदिया में मारे ला डुबकी


ढेंढी गदराएल केराव के,

फिन नेवान करवावऽ न !


अइपन,अक्षत,फूल,धूप, 

नैवेद चढ़ा के, टउआएल

अनगुतिये से मनवाँ हे ई, 

हवन- कुंड में ढेमनाएल


चन्नन से कोहबर लिपले ही, 

आके अलख जगावऽ न ! 

हम्मर अँगना में पिरीत के, 

अमरित तू बरसावऽ न !!


              *****

मंगलवार, 17 अगस्त 2021

मोबाइल होता

 वह प्राइमरी स्कूल की टीचर थी |  


सुबह उसने बच्चों का टेस्ट लिया था और उनकी कॉपिया जांचने के लिए घर ले आई थी | 


बच्चों की कॉपियां देखते-देखते उसके आंसू बहने लगे | उसका पति वहीं लेटे-लेटे मोबाइल देख रहा था |  


उसने रोने का कारण पूछा । 


टीचर बोली , “सुबह मैंने बच्चों को  

‘मेरी सबसे बड़ी ख्वाईश ’ विषय पर कुछ  पंक्तियाँ लिखने को कहा था ; 


एक बच्चे ने इच्छा जाहिर की है कि- भगवन उसे  "मोबाइल" बना दे | 


यह सुनकर पतिदेव हंसने लगे | 

टीचर बोली , “आगे तो सुनो बच्चे ने लिखा है-


यदि मैं mobile बन जाऊंगा, तो घर में मेरी एक खास जगह होगी और  

सारा परिवार मेरे इर्द-गिर्द रहेगा |  

जब मैं बोलूँगा, तो सारे लोग मुझे ध्यान से सुनेंगे | 

मुझे रोका टोका नहीं जायेगा 

और नहीं उल्टे सवाल होंगे |  


जब मैं mobile बनूंगा, तो पापा ऑफिस से आने के बाद थके होने के बावजूद मेरे साथ बैठेंगे | 


मम्मी को जब तनाव होगा, 

तो वे मुझे डाटेंगी नहीं, बल्कि मेरे साथ रहना चाहेंगी | 


मेरे बड़े भाई-बहनों के बीच मेरे पास रहने के लिए झगड़ा होगा |  


यहाँ तक की जब mobile बंद रहेंगा, तब भी उसकी अच्छी तरह देखभाल होगी |  


और हाँ, mobile के रूप में मैं सबको ख़ुशी भी दे सकूँगा | “ 


यह सब सुनने के बाद पति भी थोड़ा गंभीर होते हुए बोला -


 ‘हे भगवान ! बेचारा बच्चा …. उसके माँ-बाप तो उस पर जरा भी ध्यान नहीं  देते !’ 


टीचर पत्नी ने आंसू भरी आँखों से  

पति की तरफ देखा और बोली-


“जानते हो, यह बच्चा कौन है? …हमारा अपना बच्चा…… 


.. हमारा छोटू |” 


सोचिये, यह छोटू कहीं आपका बच्चा .... 

तो नहीं । 


आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में हमें वैसे ही एक दूसरे के लिए कम वक़्त मिलता है , और अगर हम वो भी सिर्फ टीवी देखने , मोबाइल पर खेलने और फेसबुक से चिपके रहने में गँवा देंगे तो हम कभी अपने रिश्तों की अहमियत और उससे मिलने वाले प्यार को नहीं समझ पायेंगे। 


शिक्षा  : कृपया अपने कीमती समय से कुछ समय परिवार के साथ भी बितायें।


🙏

सोमवार, 16 अगस्त 2021

हिंदी का चमत्कार

 *ऐसा चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है …*


चार मिले चौंसठ खिले, 

बीस रहे कर जोड़!

प्रेमी सज्जन दो मिले, 

खिल गए सात करोड़!!


मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा.... 

काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया, 

तो मैंने कहा – 

"बाबा आप ही बताइए, 

मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा !"


तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – 

"देखो बेटे, यह बड़े रहस्य की बात है... 

चार मिले – मतलब जब भी कोई मिलता है, 

तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं, 

इसलिए कहा, चार मिले.. 

फिर कहा, चौसठ खिले – यानि दोनों के बत्तीस-बत्तीस दांत – कुल मिलाकर चौंसठ हो गए, 

इस तरह “चार मिले, चौंसठ खिले” 

हुआ!"


“बीस रहे कर जोड़” – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!"


“प्रेमी सज्जन दो मिले” – जब दो आत्मीय जन मिलें – यह बड़े रहस्य की बात है – क्योंकि मिलने वालों में आत्मीयता नहीं हुई तो 

“न बीस रहे कर जोड़” होगा और न "चौंसठ खिलेंगे”


उन्होंने आगे कहा, 

"वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है, 

लेकिन मोटा-मोटा साढ़े तीन करोड़ बताते हैं, बताने वाले ! 

तो कवि के अंतिम रहस्य – “प्रेमी सज्जन दो मिले – खिल गए सात करोड़!” 

का अर्थ हुआ कि जब कोई आत्मीय हमसे मिलता है, 

तो रोम-रोम खिलना स्वाभाविक ही है भाई – जैसे ही कोई ऐसा मिलता है, 

तो कवि ने अंतिम पंक्ति में पूरा रस निचोड़ दिया – “खिल गए सात करोड़” यानि हमारा रोम-रोम खिल जाता है!"


भई वाह, आनंद आ गया। 

हमारी कहावतों में कितना सार छुपा है। 

एक-एक शब्द चासनी में डूबा हुआ, 

हृदय को भावविभोर करता हुआ! 

*इन्हीं कहावतों के जरिए हमारे बुजुर्ग, जिनको हम कम पढ़ा-लिखा समझते थे, हमारे अंदर गाहे-बगाहे संस्कार का बीज बोते रहते थे।*


🙏🌹🙏🌹🙏

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...