बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

जीवन का मोल*

 *प्रेरक कहानी* 


*प्रस्तुति - वीरेंद्र कुमार सिंह 



एक धन सम्पन्न व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था। पर कालचक्र के प्रभाव से धीरे धीरे वह कंगाल हो गया। उस की पत्नी ने कहा कि सम्पन्नता के दिनों में तो राजा के यहाँ आपका अच्छा आना जाना था। क्या विपन्नता में वे हमारी मदद नहीं करेंगे जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा की की थी?"


पत्नी के कहने से वह भी सुदामा की तरह राजा के पास गया। 


द्वारपाल ने राजा को संदेश दिया कि एक निर्धन व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है और स्वयं को आपका मित्र बताता है। 


राजा भी श्रीकृष्ण की तरह मित्र का नाम सुनते ही दौड़े चले आए और मित्र को इस हाल में देखकर द्रवित होकर बोले कि मित्र बताओ, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?"


मित्र ने सकुचाते हुए अपना हाल कह सुनाया।


चलो, मै तुम्हें अपने रत्नों के खजाने में ले चलता हूँ। वहां से जी भरकर अपनी जेब में रत्न भर कर ले जाना। पर तुम्हें केवल 3 घंटे का समय ही मिलेगा। यदि उससे अधिक समय लोगे तो तुम्हें खाली हाथ बाहर आना पड़ेगा।"

 

ठीक है, चलो।


वह व्यक्ति रत्नों का भंडार और उनसे निकलने वाले प्रकाश की चकाचौंध देखकर हैरान हो गया। पर समय सीमा को देखते हुए उसने भरपूर रत्न अपनी जेब में भर लिए। वह बाहर आने लगा तो उसने देखा कि दरवाजे के पास रत्नों से बने छोटे छोटे खिलौने रखे थे जो बटन दबाने पर तरह तरह के खेल दिखाते थे। उसने सोचा कि अभी तो समय बाकी है, क्यों न थोड़ी देर इनसे खेल लिया जाए?

 

पर यह क्या? 


वह तो खिलौनों के साथ खेलने में इतना मग्न हो गया कि समय का भान ही नहीं रहा।

 

उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर *खाली हाथ* ही बाहर आ गया।


राजा ने कहा- "मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है। चलो, मैं तुम्हें अपने स्वर्ण के खजाने में ले चलता हूँ। वहां से जी भरकर सोना अपने थैले में भर कर ले जाना। पर समय सीमा का ध्यान रखना।ठीक है।"


उसने देखा कि वह कक्ष भी सुनहरे प्रकाश से जगमगा रहा था। उसने शीघ्रता से अपने थैले में सोना भरना प्रारम्भ कर दिया। तभी उसकी नजर एक घोड़े पर पड़ी जिसे सोने की काठी से सजाया गया था। 


अरे! यह तो वही घोड़ा है जिस पर बैठ कर मैं राजा साहब के साथ घूमने जाया करता था। वह उस घोड़े के निकट गया, उस पर हाथ फिराया और कुछ समय के लिए उस पर सवारी करने की इच्छा से उस पर बैठ गया।"


पर यह क्या? 


समय सीमा समाप्त हो गई और वह अभी तक सवारी का आनन्द ही ले रहा था। उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह घोर निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया। 


राजा ने कहा- "मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है। चलो, मैं तुम्हें अपने रजत के खजाने में ले चलता हूँ। वहां से जी भरकर चाँदी अपने ढोल में भर कर ले जाना। पर समय सीमा का ध्यान अवश्य रखना।"


ठीक है।


उसने देखा कि वह कक्ष भी चाँदी की धवल आभा से शोभायमान था। उसने अपने ढोल में चाँदी भरनी आरम्भ कर दी। इस बार उसने तय किया कि वह समय सीमा से पहले कक्ष से बाहर आ जाएगा। पर समय तो अभी बहुत बाकी था।


दरवाजे के पास चाँदी से बना एक छल्ला टंगा हुआ था। साथ ही एक नोटिस लिखा हुआ था कि इसे छूने पर उलझने का डर है। यदि उलझ भी जाओ तो दोनों हाथों से सुलझाने की चेष्टा बिल्कुल न करना।


उसने सोचा कि ऐसी उलझने वाली बात तो कोई दिखाई नहीं देती। बहुत कीमती होगा तभी बचाव के लिए लिख दिया होगा। देखते हैं कि क्या माजरा है?

 

बस! फिर क्या था। हाथ लगाते ही वह तो ऐसा उलझा कि पहले तो एक हाथ से सुलझाने की कोशिश करता रहा। जब सफलता न मिली तो दोनों हाथों से सुलझाने लगा। पर सुलझा न सका और उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया। 


राजा ने कहा- मित्र, कोई बात नहीं।निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अभी तांबे का खजाना बाकी है। चलो, मैं तुम्हें अपने तांबे के खजाने में ले चलता हूँ। वहां से जी भरकर तांबा अपने बोरे में भर कर ले जाना। पर समय सीमा का ध्यान रखना।

 

ठीक है।


मैं तो जेब में रत्न भरने आया था और बोरे में तांबा भरने की नौबत आ गई। थोड़े तांबे से तो काम नहीं चलेगा। उसने कई बोरे तांबे के भर लिए। भरते भरते उसकी कमर दुखने लगी लेकिन फिर भी वह काम में लगा रहा। विवश होकर उसने आसपास सहायता के लिए देखा। एक पलंग बिछा हुआ दिखाई दिया। उस पर सुस्ताने के लिए थोड़ी देर लेटा तो नींद आ गई और अंत में वहाँ से भी खाली हाथ बाहर निकाल दिया गया।


क्या इसी प्रकार हम भी अपने जीवन में अपने साथ कुछ नहीं ले जा पाएंगे?

बचपन खिलौनों के साथ खेलने में,जवानी विवाह के आकर्षण में और गृहस्थी की उलझन में बिता दी।

 

बुढ़ापे में जब कमर दुखने लगी तो पलंग के सिवा कुछ दिखा नहीं। समय सीमा समाप्त होने की घंटी बजने वाली है।


संत कहते हैं- "सावधान! सावधान!! यूँ ही आता रहा, यूँ ही जाता रहा, लख चौरासी के चक्कर लगाता रहा। क्यों न पहचान पाया तू श्वासों का मोल...जीवन का मोल अपना हीरा जन्म यूँ गँवाता रहा। बन्दे अब तो जाग।

🙏

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

डॉ. सुशील कुमार पांडेय /


 पद्म श्री सोहनलाल द्विवेदी के द्वारा "साहित्येन्दु"की खिताब से नवाजे गए हिंदी और संस्कृत अदब के एक खूबसूरत कलमकार महामहोपाध्याय डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येन्दु जी (पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर/अध्यक्ष संस्कृत विभाग संत तुलसीदास पीजी कॉलेज कादीपुर सुलतानपुर) एक ऐसी अदब‌ शनास शख्शियत हैं जो यकीनन अदब की त्रिवेणी हैं, जिनमें गंगा ,जमुना ,सरस्वती सरीखे हिंदी संस्कृत उर्दू पालि,प्राकृत जैसी तमाम जुबान और इल्मो अदब का तालमेल व संगम साफ-साफ दिखाई देता है। 

उनके तालीम व तर्बियत की खुशनुमाई उनके नज़्म (पद्य) नस्र (गद्य) महाकाव्य, खंडकाव्य, आलोचना, वेद - वेदांग, फलसफा वगैरह में साफ-साफ नजर आती है। यह हमारी खुशकिस्मत है कि उनकी रूहानी और पाकीजा मोहब्बत मुसलसल हमें नसीब है। आपकी जेहनत और खुश रंग खयालात् आज भी (72 साल की उम्र में भी) महफिले चमन में खुशबू घोलती है-


गजब की फिजा में खुशबू घोलते हैं।

सलीके से जनाब संस्कृत बोलते हैं।।


एक- एक लफ्ज़, एक- एक जुमले से रस बरस पड़ता है जो मुकम्मल काव्य के मानिंद होता है-"वाक्यं रसात्मकं काव्यम् "। जी, हां! आपकी तबीयतदारी और चैनदारी आज भी महफूज है शायद ठीक ही कहा गया है-


तन तो ढल जाए किंतु मन कवि का,

जिंदगी भर जवान रहता है।


आपकी अदबीखिदमात और पूरा अदब वाकई में जाति मजहब एवं सांप्रदायिक फासलों से अलग सद्भाव,सामंजस्य और समन्वय की बुनियाद पर कायम रहकर  सार्वभौम, सार्वकालिक, सार्वजनिक‌‌ तय होती हुई अदब की इस सच्चाई को उजागर करती है-


कीरति भनित भूति भल सोई।

सुरिसरि सम सब कर शुभ होई।।


साहित्याकाश के इन्दु आपके विचारों की निर्मलता, समन्वय की चेष्टा, समाजवादी विचारधारा और समासिकी संस्कृति की पक्ष धरता ही आपके सुंदर,सुखद औरआकर्षक साहित्य की ऐसी आधारशिला है जो उसे कालजई कायम करती है, जिसकी वजह से सदियों तक आप पढ़े जाएंगे। 


आपकी प्रकाशित कृतियां "प्रतीक्षा"खंडकाव्य (1983), कौंडिन्य महाकाव्य (2012), अगस्त महाकाव्य (2013), शब्द कहे आकाश दोहासंग्रह (2014), तुलसी तत्व चिंतन निबंध संग्रह, (2016, )योग तत्व चिंतन (2017), मनीषियों की दृष्टि मे संस्कृत(2017), अभिज्ञान शाकुन्तलम् एवं कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ( 2019), भक्ति कालीन तुलसी की सार्वकालीन प्रासंगिकता (2020), ऐसी तमाम रचनाएं इस बात का एक मजबूत सबूत हैं। महाकाव्य का एक एक सोपान आगे आने वाली नई पीढ़ियो के लिए इखलाक की सीढ़ियां कायम होंगी।


आपको मिले तमाम सम्मान जैसे -साहित्येन्दु सम्मान 1986, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा साहित्य भूषण सम्मान उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ का विशिष्ट पुरस्कार 2009, तथा 2020 का विविध (साहित्य) पुरस्कार के अतिरिक्त 185 अन्य पुरस्कारों के साथ 14 सितंबर 2024 का मानद उपाधि महामहोपाध्याय से पूरा जनपद गौरवान्वित है।


मैं इल्म व तालीम में बरक्तत देने वाली मां सरस्वती से इल्तिज़ा करता हूं कि आपकी ज़ोरेकलम और जेहानत की सलामती की नवाजिश बनाए रखें। महोदय! आपकी उम्रदराजी और बेहतर सेहत के वास्ते मेरी ख्वाहिश यही है -

तमाम उम्र तुम्हें जिंदगी का प्यार मिले, 

खुदा करे ये खुशी बार-बार मिले। 


मेरी दुआ है कि बिछे फूल तेरी राहों में,

कटे हयात तेरी रहमतों की छांवों में।


किसी को जो न मिला वो तुझे करार मिले।

मिली हो तेरी तमन्ना किसी कमल की तरह,

 

सजाएं तुझको लबों पर सभी गजल की तरह।

खुदा करे तुम्हें मौसमे -बाहर मिले।

..................


पी.एन.सिंह "चंदेल"

(संगीत शिक्षक) 

श्री गांधी स्मारक इंटर कॉलेज समोधपुर जौनपुर।



रविवार, 29 सितंबर 2024

कान खड़े है / धनंजय सिंह

 सबके चौकस कान खड़े हैं

चारों ओर फुसफुसाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


चारों ओर मच रहा दंगा

परजा कहती राजा नंगा

कैसी अजब खलबलाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


खुशहाली है अखबारों में

बदहाली है बाजारों में

बस हर ओर बलबलाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


जुआ खेलते धर्मराज हैं

सबके उलटे कामकाज हैं

फैली अजब सनसनाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


पार्थ-भीम के होंठ सिले हैं

भीष्म-द्रोण भी हिले-हिले हैं

बस सब ओर सनसनाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


द्रौपदियों का चीरहरण है

राजा कहता पुरश्चरण है

मन में बहुत दलदलाहट है

यह तुम मुझे कहाँ ले आये!


---धनञ्जय सिंह.

शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

माँ दो नव वरदान./ धनंजय सिंह sjngh


 नित नवीन उद्भावना, नये-नये उपमान

नवल व्यंजना का मुझे, माँ दो नव वरदान !


नित नवीन शुभ कल्पना, नित-नित नये प्रतीक

सहज लक्षणा-व्यंजना, माँ दो मुझे सटीक!


नये बिंब,नव कल्पना, नवल भाव-संज्ञान

नवल भंगिमा का रहे,प्रतिपल अनुसंधान!


नवल छंद, गति-लय नयी, नूतन मधुमय भाव

अलंकार-रस पूर्ण हों, हे माँ सब अनुभाव!


संध्या-वंदन-प्रार्थना, कर लो माँ स्वीकार 

रिक्त हृदय में काव्य का, दो नूतन अवतार!


वाणी रस-परिपूर्ण हो, शब्द-शब्द संगीत 

माँ ऐसा वरदान दो, पूर्ण रहे हर रीत!


नये गीत में भाव का, हो नूतन शृंगार 

नव गति, नव लय, स्वर नये, दे दो माँ उपहार!


---धनञ्जय सिंह.

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

कथाकार इस तरह बने कहानीकार

 चलो बने “ कथाकार “

कथा “ कहे और लिखे ✍️


अपने प्यारे बच्चों के लिए आपकी अपनी “ बबिता “ लेकर आ रही है - 

एक अनूठी और अनोखी पहल ।

जहाँ बच्चे अच्छा सोचना , लिखना , पढ़ना और कहना सीखेंगे - ख़ुद से ख़ुद की सच्ची कहानियाँ ( बाते ) 

लघु कथा ( कहानी ) 

उम्र( Age )  - 7 तो 14 

वर्कशॉप का अभिप्राय !! 

1-बच्चों का स्वस्थ मानसिक विकास 

2-लेखन क्षमता में सुधार 

3-विचारों का आदान- प्रदान 

4-अच्छी और सकारात्मक भाषा शैली की समझ को बढ़ावा देना । 

5- बच्चों कि Creativity को उभारना । 

6-बच्चों के मन के विचारों को शब्दों में पिरोना और उन शब्दों के माध्यम से उनके दिल की बातों को समझना । 

7- बच्चों के मानसिक स्तर को प्रभावशाली बनाना । 

8- कहानी और कथा के मध्यम से जीवन में मूल्यों को उतरना ( Value based) 

9- Observation power को बढ़ावा देना । 

10- लेखन कला के माध्यम से writing ✍️ skills को बढ़ाना । 

⭐️Most important 

Social media के इस दौर में बच्चों के कुछ वक़्त को constructive कार्यों के लिए निर्धारित करना । 

⭐️ बच्चों कि इस पहल से अनेक बच्चों को प्रोत्साहित करके , देश में एक ऐसी युवा शक्ति का विकास करना , जिसकी भाषा, सोच और लेखनीं दमदार हो ।

बुधवार, 25 सितंबर 2024

ग़ज़ल (1) / अच्छी थी पगडंडी अपनी / सिन्हा आत्म स्वरूप

 1


*"अच्छी थी, पगडंडी अपनी,

सड़कों पर तो, जाम बहुत है!!*


*फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो,

सबके पास, काम बहुत है!!*


*नहीं जरूरत, बूढ़ों की  अब,

हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है!!*

  

*उजड़ गए, सब बाग बगीचे,

दो गमलों में, शान बहुत है!!*


*मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं,

कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है!!*


*पीते हैं, जब चाय, तब कहीं,

कहते हैं, आराम बहुत है!!*


*बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री,

व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है!!*


*झुके-झुके, स्कूली बच्चे,

बस्तों में, सामान बहुत है!!*


*नही बचे, कोई सम्बन्धी,

अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है!!*


*सुविधाओं का,ढेर लगा है यार.

पर इंसान, परेशान बहुत है!!*

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

गणेश चतुर्थी / डॉ वेद मित्र शुक्ल,


गणेश चतुर्थी (विशेष:)

ग़ज़ल 


       - डॉ वेद मित्र शुक्ल, 

          नई दिल्ली

 

सबसे पहले जिनकी पूजा हम करते, प्यारे गणेश,

जन-गण-मन में गणपति बप्पा हो बसते प्यारे गणेश|


सारे जग में जीवन भर हम कहाँ-कहाँ घूमें, लेकिन -

माँ-बाबू जी मेरी दुनिया हैं कहते प्यारे गणेश|


अच्छे कारज में देरी क्यों, शुरू करें हिलमिल आओ,

बाधाएं यदि आ जायेंगी, हैं हरते प्यारे गणेश|


अन्यायी से लड़ने को जो करे एकजुट जन-जन को,

गणपति उत्सव ऐसा ही जहँ हैं सजते प्यारे गणेश|


लिखना होता सोच-समझकर काल चक्र की जब गति से,

देखो, कथा महाभारत की हैं लिखते प्यारे गणेश|

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...