गुरुवार, 22 जुलाई 2021

भारतीय संस्कृति के चार अध्याय और मैं / मनोहर मनोज

रामधारी सिंह दिनकर की लिखी सुप्रसिद्ध पुरस्तक भारतीय संस्कृति के चार अध्याय के  पढ़ने का कार्य  अभी मैंने पूरा किया । करीब ५३० पृष्ठ की इस पुस्तक को पढ़ने में मुझे पैतालीस दिन लगे। सच कहूं तो इस पुस्तक को पढ़कर मै अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा हु। जब एक पुस्तक का पाठक पढ़ने के उपरांत अपने को गौरान्वित महसूस करे तो यह अनुमान सहज लग जाना चाहिए की इस पुस्तक के लेखक ने किंतना युगांतकारी कार्य इस पुस्तक के लेखन के मार्फ़त सम्पन्न किया था।


वैसे तो भारत के गौरवशाली इतिहास , संस्कृति , जनजीवन , राजनीती , समरनीति , धर्म , पंथ समाज और अर्थ का एक व्यापक दिग्दर्शन प. नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया के जरिये भी मिलता है। परन्तु वह किताब नेहरू की विराट इतिहास दृष्टि और इतिहास बोध की एक तप्सरा या यो कहें एक कमेंटरी है। परन्तु दिनकर की यह किताब एक शोध साध्य , श्रमसाध्य और व्यापक संयोजन साध्य कृति है। भारत के पुराने गौरव के महाकवि दिनकर की ये कृति एक प्रबंध काव्य की तरह है जिसे उन्हें गद्य रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक को लिखने में स्वयं लेखक के मुताबिक ५ साल लगे जिसमे उन्होंने समूची भारतीय धरा के पांच  हज़ार साल के जीवाश्म को जीवंत स्वरुप प्रदान कर दिया है। पुस्तक के विषय वस्तु की प्लानिंग , स्ट्रक्टरिंग और प्रेजेंटेशन स्वयं सिद्ध है। हिंदुत्व यानि प्राग्वैदिक वैदिक आर्य द्रविड़ उत्तर दक्षिण के समन्नाव और संश्लेषण  का काल  खंड , फिर वैदिक प्रथाओं के खिलाफ क्रांतिजीवी जैन और बौद्ध पंथ के आविर्भाव और प्रसार का  काल  खंड, फिर हिंदुत्व पर आयी इस्लामी प्रभाव का कालखण्ड और हिंदुत्व पर आये यूरोपीय प्रभाव का कालखंड। इस पुस्तक में लेखक ने शोध , दृष्टि , नजरिये में तथ्यों के साथ अनुमानों का भी सहारा लिया है , परन्तु लेखक कही पर भी स्वयं के भाव से बहकता नहीं जान पड़ा है। इस पुस्तक में दिनकर जी ने भारत के सभी संभावित महापुरुषों का आख्यान किया है जिन्होंने इस  महान भारत की धरोहर की रचना में अपना योगदान दिया है। इस समूचे इतिहास और संस्कृति के धरोहर को कागज पर उतरने वाले दिनकर भी मेरी नजर में उन्ही इतिहास पुरुषों की श्रेणी में शामिल हैं। हमारा समाज लेखक कवी पत्रकार रचनाकार को दोयम और महापुरुषों की बी श्रेणी का दर्ज़ा देता है। जब राधाकृष्ण कहते है की फिलोसोफर दी किंग , ऐसे में लेखक और रचनाकार जो एक विचारक दार्शनिक ,शव्दशिल्पी और एक द्रष्टा सब गुण  अपने में समाहित किये हुए होता है , उसे हम समाज की सबसे ऊँचे पायदान में क्यों नहीं रखते कहा जाता है दिनकर राज्य सभा के सदसयस बने थे नेहरू की मेहरबानी की वजह से। इस तरह की उक्ति पर मुझी सख्त इतराज है। राज्य सभा  सभी राजनीतिज्ञों के लिए कोई खुला मैदान नहीं होना चाहिए और ना ही उनकी मजमर्जी का अड्डा। देश के प्रति योगदान करने वाले सभी तरह के लोगो को प्रतिनिधित्व प्रदान करने वाला स्थल होना चाहिए। मेरी नजर में दिनकर के इस अतुलनीय कार्य का दर्जा वही है जो महाभारत के रचयिता वेदव्यास का है और  , रामायण के रचयिता बाल्मीकि का है।  जब भारतीय संस्कृति के एक विराट  दिग्दर्शन की बात आएगी तो दिनकर की यह किताब सचमुच दिनकर की तरह देदित्यमान रहेंगी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...