सोमवार, 5 सितंबर 2022

सलाम जिंदगी टीचर डे / रूचि

 सलाम ए जिंदगी💐(टीचर्स डे)


तो जिंदगी आप ही हमारी जनाब,सर,टीचर है।कितना कुछ सिखाया तुमने मुझे,बहुत बुद्धि तो हासिल नही थी, किन्तु राहो में पत्थर रख रख कर,ठोंकरे मार मार कर,बहुत कुछ सीखा दिया।लहू पोंछना घावों को धोना,और फिर उठ खड़े होना ,गिरने तो दिया ही नही तुमने मुझे।लोहा बना दिया मुझे तुमने ए जिंदगी।


सुबह के वक्त से मेरा जुड़ाव एक स्फूर्ति है।जो मुझे दर्शन,एहसास,कुदरत की मौजूदगी सबका पाठ पढ़ा जाती।सुबह मुझे बताती है ,की मैं अधूरी हूँ, कल फिर आना होगा मुझे कुदरत की गोद मे।


दोपहर जिंदगी भर से मेरे सर से होकर गुजरती है,कोई दोपहर खाली नही मेरी।जिंदगी के मैराथन मैंने दोपहर में ही जिये,कभी पीछे रह गई,कभी हार गई।किन्तु इस दोपहर का साथ वफादारी का नमूना जो था, उसे भी साथ होना था, मुझे उसकी परछाई में चलना था।तो जिंदगी तल्ख धूप में झुलसाने के लिए धन्यवाद।मैं तांबा बन गई।शुद्ध,चमकदार,साफ।


 ये शाम ,इस शाम क़े खाली बर्तन से बनते पलो ने तो मुझे लेखक बना दिया।जिंदगी में जो जितना तन्हा वो उतना लिखेगा,पन्ने भरेगा।ये सबक शाम ने दिया जिंदगी भर।मन जो अक्सर ठहरा,वो यही शाम होती है।जिंदगी थी हर शाम में,किन्तु सीर्फ़ खाली जिंदगी आपकी शाम को एक नई कविता दे जाती।इस शाम के सबक उतने ही रूमानी है,जितना कि आसमान का नारंगी होना।इन खाली शामो का हिसाब जिंदगी ,मुझे बगीचों के धुंलके रंग में दे ही जाती।इस शाम ने मुझे आईना बना दिया,हर तस्वीर साफ दिखती।

 

रात तो ऐसी की फिरदौस ,या की यायावर स्वप्न। जिंदगी की इन रातों में अक्सर मैंने पाठ अमावस्या के ही पढ़े।जिंदगी सही थी,तुम। अमावस्या के रहने से पूर्णिमा के आने की आस रहती है,इंसान को।50+की उम्र तक कि अमावस्या में,मुझे तारो जैसे तीन बच्चे जन्म देने की पूर्णिमा राते दी इस जिंदगी ने।जो मेरी तमाम अमावस्या की रातों को,पूर्णिमा में बदलने का माद्दा रखते है।इन रातों में गहन अंधेरों ने मुझे दिए कि रोशनी करना सिखाया,जो मुझे साहसी बनाता है,सच्चा,और दयालुता से भर देता है,एक दिया जलाना मेरा।इन रातों के रोशन दियों ने मुझे चांदी बना दिया।जिंदगी की कीमत चांदी सी सफेद उम्र में ही प्रस्तुत होती है।ये उम्र की चांदी अभी भी अपने मेहबूब (म्रत्यु)के इंतज़ार में ,रातों को सांसों का अलख धूना ,लोभान की महक से कटती रहती है।ताश के पत्तो सी उम्र को कभी जिंदगी पुराना महल बना देती,कभी युद्ध की ढाल।कभी आरजू ,कभी ख्वाहिश की दावत।

     

बस जिंदगी आज़ टीचर्स डे है।तुमने हमारी बहुत क्लासेस ली,बहुत एग्जाम लिए।साल दर साल।हमे नम्बर भी मिले,ये परिवार,दोस्त,दुनियाभर की नैमते।किन्तु हम समझे वही सबक जो तुमने हरी बेंत से सिखाए।

        साथ रहना,जिंदगी।।     रुचि

रविवार, 4 सितंबर 2022

भारतीय संस्कृति के संवाहक / : सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन /

 (5 सितंबर, शिक्षक दिवस)

  सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन की 134 वीं जयंती पर विशेष

विजय केसरी 



भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, एक आस्थावान हिंदू विचारक, देश के प्रथम उपराष्ट्रपति, द्वितीय राष्ट्रपति और 'भारत रत्न' से अलंकृत सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन का जीवन सदा लोगों को अपनी ओर प्रेरित करते रहेगा। उनका संपूर्ण जीवन स्वाध्याय, शिक्षा दान और भारतीय राजनीति को समर्पित रहा। उन्होंने भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का गहराई से अध्ययन किया। उनका जन्म गुलामी के कालखंड में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा क्रिश्चियन स्कूल और कॉलेज में हुई थी।  इन क्रिश्चियन शिक्षण संस्थानों में पढ़कर वे यह  समझा पाए  कि किस तरह क्रिश्चियन धर्म गुरु हिंदू जनों से निम्न स्तर का व्यवहार करते थे। हिंदुओं के साथ क्रिश्चियन  शिक्षकों का बदला हुआ व्यवहार उन्हें कभी पसंद नहीं आया। इसलिए उन्होंने भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म का बहुत ही गहराई से अध्ययन किया। अध्ययन के बाद उन्हें यह ज्ञात हो गया कि क्रिश्चियनों का हिंदुओं के प्रति जो भेदभाव है, बिल्कुल पूरी तरह गलत है। उनका प्रारंभ से ही हिंदू धर्म पर गहरी आस्था थी। उन्हें गर्व था कि हिंदू धर्म दर्शन संपूर्ण विश्व को सत्य, अहिंसा और मानवता  का शिक्षा प्रदान करता है। उन्हें गर्व था कि मेरा जन्म एक हिंदू कुल में हुआ । उनका जीवन स्वाध्याय,शिक्षा दान और राजनीति को समर्पित रहा था। राजनीति में उनकी कभी रुचि नहीं रही कि मैं राजनीति में जाऊं। लेकिन जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नजर सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन पर पड़ी और उन्होंने जब  राधाकृष्णन जी का भाषण सुना तो अचंभित रह गए। भारतीय वांग्मय और भारतीय दर्शन पर इतना जबरदस्त कमांड और धाराप्रवाह बोलते हुए आज तक नेहरू जी ने किसी को नहीं सुना था । तभी से नेहरू जी उनके मुरीद हो गए थे। नेहरू जी ने राधाकृष्णन की विलक्षण प्रतिभा को देखकर मन में यह इरादा कर लिया था कि देश की आजादी के बाद उन्हें कहां स्थान दिया जाए।  डॉ० राधाकृष्णन जी को इस बात का पता ही नहीं चला था कि नेहरू जी से उनकी यह मुलाकात उन्हें देश की राजनीति के सबसे ऊंचे ओहदे पर विराजमान कराएगा। भारतीय राजनीति में उनकी ओर से प्रवेश की कोई जानकारी नहीं मिलती है। 15 अगस्त 1947  को जब देश आजाद हो रहा था। तब सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन ने आजादी का प्रथम भाषण प्रस्तुत किया था। उन्होंने अपना भाषण  निश्चित समय पर  बारह बजे रात्रि को समाप्त किया था। उसके बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भाषण दिया था। यह बात भी सिर्फ दोनों को ही पता था। डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक गैर राजनीतिक व्यक्ति थे। दर्शनशास्त्र के महान विद्वान थे। भारतीय राजनीति का भी उन्हें बहुत ही अच्छा। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन जी की अंदर की विलक्षण प्रतिभा को पहचान कर ही उन्हें देश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया था । राधाकृष्णन जी जब मंच से अपनी बातों को रखा करते, तो लोग बिल्कुल शांत होकर उनकी बातों को सुनते थे। उनके हर एक वाक्य में जीवन का गुढ़ दर्शन छुपा रहता था। वे कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात को  कह गुजरते थे। उनकी बातों को काटने की हैसियत बड़े से बड़े विद्वानों तक को ना थी । जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय संविधान सभा की निर्मात्री  सभा का उन्हें सदस्य बनाया। जबकि सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति थे। कांग्रेस जनों में इस बात की चर्चा हुई थी कि उन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य क्यों बनाया  गया ? इस सभा में वे क्या योगदान दे पाएंगे ?नेहरु जी चुप रहे। भरतीय संविधान निर्मात्री  सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने  दो वर्षों तक जो कार्य किया, निर्मात्री सभा के सभी सदस्य देखकर हतप्रभ रह गए। कांग्रेसियों ने  नेहरू जी के चयन को लोहा माना था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को देश के प्रथम राष्ट्रपति बनाए जाने के बाद  उपराष्ट्रपति के रूप में सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन को इसकी जवाबदेही दी गई थी। इस पर भी कई कांग्रेसियों ने अंदर ही अंदर कई सवालों खड़ा किया था।  उपराष्ट्रपति उन्होंने जो कार्य किया।  प्रश्न उठाने वालों का मुंह बंद हो गया था।  उप राष्ट्रपति के रूप में वे  1952 से 1962 तक रहे। उसके बाद उन्हें  देश का द्वितीय राष्ट्रपति  बनाया गया। इस पद पर वे 1962 से 1967 तक रहे। 1954 में उन्हें भारत सरकार ने दर्शनशास्त्र पर उनकी उल्लेखनीय सेवा के लिए 'भारत रत्न' सम्मान से अलंकृत किया था ।


सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन का जन्म एक गरीब हिंदू ब्राह्मण परिवार में जरूर हुआ था। लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई में गरीबी को आने नहीं दिया। वे बचपन से ही ट्यूशन पढ़ाकर अपनी  शिक्षा खर्च का भार उठाते  रहे थे। जबकि उनके पिता भी उन्हें काफी सहयोग करते थे। एक शिक्षक का क्या दायित्व होना चाहिए? एक शिक्षक का अपने छात्रों के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए ?सबों को शिक्षित करने वाला यह शिक्षक समुदाय इतना  गरीब और असहाय क्यों है? यह बात उन्हें बहुत कचोटती थी। जिस कालखंड में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी। उस समय शिक्षकों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी।  उस समय वे चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते थे। क्योंकि वे स्वयं उतने सामर्थ्यवान नहीं थे। जब वे राष्ट्रपति बने तो अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में घोषित कर दिया था।


 आगे चलकर जब उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व पटल पर भारतीय दर्शन शास्त्र की पोटली खोली तो संपूर्ण विश्व भारतीय दर्शन को जानकर दंग रह गया। विश्व धर्म सभा शिकागो में जब पहली बार स्वामी विवेकानंद ने जीरो पर बोलना प्रारंभ किया और भारतीय जीवन दर्शन, नैतिक मूल्य, हिंदू धर्म की  बात रखी तो धर्म सभा में बैठे तमाम विद्वानों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। ठीक उसी प्रकार अपने लेखों के माध्यम से पहचान बनाने वाले  सर्वपल्ली डॉ ० राधाकृष्णन ने ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में अपने भाषण में कहा था कि 'मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। यह तभी संभव है, जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति स्थापना का  हो।' इतने वर्ष पूर्व कही गई उनकी बात आज भी प्रासंगिक है। राधाकृष्णन जी का मत था कि संपूर्ण विश्व एक है।  सबों को एक प्रकार की शिक्षा मिलनी चाहिए। मनुष्य न छोटा है, ना बड़ा है।  मनुष्य को एक ही समान जन्म लेना है और एक ही समान मृत्यु को प्राप्त करना है।  फिर मनुष्य छोटा और बड़ा कैसे हो सकता है? मनुष्य का जन्म इस धरा पर मुक्ति के लिए होता है। जिंदगी उसके लिए एक अवसर होता है। मनुष्य   अच्छे कर्म कर मुक्ति को प्राप्त करता है। अथवा बुरे कर्म कर इस अवसर को खो देता है। उनका मत था कि सच्चा ज्ञान वही है, जो आपके अंदर के अज्ञान को समाप्त करता हो।  उनका मत था कि सादगी पूर्ण संतोष युक्त  जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है । आज भी उनके विचारों पर चलकर हम सब अपने जीवन को सफल बना सकते हैं । उन्होंने जितने भी लेख लिखें अथवा भाषण दिए। सब में कहीं ना कहीं भारतीय दर्शन का पुट मिलता है। 


विजय केसरी,


 कथाकार स्तंभकार,


 पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,


 मोबाइल नंबर - 92347 99550,

शनिवार, 3 सितंबर 2022

रोम यात्रा की स्मृतियाँ। / अजय तिवारी

 रोम यात्रा की यादें 


यह कोलोसियम का विहंगम दृश्य है। यहीं ऊपर शासक बैठते थे, नीचे तलघर में दास क़ैद रहते थे। पाँच मंज़िला इस ढाँचे में पहली मंज़िल पर एक मंच है। वहीं दासों को आपस में या भूखे शेरों से लड़ाया जाता था। यह दासप्रथा पर आधारित रोम साम्राज्य के सत्ताधारियों का प्रिय मनोरंजन था। 


दासप्रथा के अत्याचारों से पीड़ित समाज में अपने सत्ताधारियों को बचाने की इच्छा नहीं थी। इसीलिए जब ईसाई क्रूसेड हुआ तो रोमन साम्राज्य ढह गया। वहाँ ईसाइयों के शासन हो गया। पुरानी सभ्यता नष्ट कर दी गयी। पुराने देवी-देवता भुला दिए गये। इस कोलोसॉलियम में भी ईसाई सत्ता का प्रभाव अंकित कर दिया गया। मोबाइल से ली गयी तस्वीर में इतने बारीक डिटेल्स नहीं आ सके। लेकिन यह अवशेष बहुत अनोखा है। 


मुझे बार-बार भारत की याद आया करती थी। हमारे यहाँ दासप्रथा जैसी क्रूरता नहीं थी। पर अस्पृश्यता का अभिशाप था। शूद्रों और अछूतों को समाज में खास सम्मानजनक दर्ज़ा नहीं मिला हुआ था। इसलिए जब इस्लामी हमले शुरू हुए तो शासक क्षत्रिय आपसी लड़ाइयों और कन्या-हरण में उलझे हुए थे और ब्राह्मण पुरोहित अंधविश्वासों में स्वयं लिप्त थे और जनता को उलझाए हुए थे। देश परास्त हुआ। 


दास हों या दलित, जहाँ भी श्रमजीवियों को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग रखा गया, वहाँ पतन और विनाश हुआ। यूरोप ने नवनिर्माण पर ध्यान दिया। भारत में हज़ार साल पहले अपने पुरखों के पाप पर पछताने की जगह पुराने विजेताओं के वंशजों से बदले की राजनीति होती है। 


यूरोप की यात्रा और उस इतिहास के साक्षात्कार से नई दृष्टि मिलती है। बस आत्मा भारतीय रहनी चाहिए। ज्ञान हर जगह है, हर जगह से मिल सकता है।

❤️
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शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

प्रेमचंद : आज का किसान और यथार्थ


आज जबकि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की विभाजक रेखा को मिटाने की महीन साजिश हो रही है और तमाम तरह के प्रतिरोध को सोख लेने का नापाक उपक्रम किया जा रहा है। खुशियों की वजहें कम होती जा रही हैं और आशाएँ अवसाद में बदलती जा रही हैं। 

बहुमूल्य के नष्ट होने की बेचैनी है।


गरीबी से ग्रस्त इस देश में खतरनाक रफ्तार से अरबपति पैदा हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर इस देश के अन्नदाता किसान अपनी माँगों के समर्थन में आठ महीने से दिल्ली के विभिन्न बार्डर पर धरने पर बैठे हैं, आन्दोलनरत हैं।

ऐसे समय में डेढ़ दर्जन उपन्यास और लगभग तीन सौ कहानियों के रचनाकार 'प्रेमचंद' को उनके 141वीं जयंती पर याद करते हुए उनके साहित्यिक अवदान के साथ सामाजिक अवदान की चर्चा  आज मौंजू है। 

प्रेमचंद निरूद्देश्य कहानीकार नहीं हैं, वे 'कला कला के लिए' के सिद्धांत के विरोधी हैं। वे कला को उपयोगी मानते हैं। कहानी को सामाजिक परिवर्तन का हथियार मानते हैं। उनकी कहानियाँ अमूर्त विचार को मूर्त करने के लिए उदाहरण के रूप में नहीं लिखी गई है बल्कि जीवन के ज्ञान और अनुभव की जिन्दा जमीन से निर्मित होती है।

भारतीय साहित्य में प्रेमचंद पहले रचनाकार हैं जिन्होंने साहित्य में किसानों को प्रवेश दिलाया। किसान-मजदूरों को कहानी का मुख्य पात्र बनाया। प्रेमचंद गरीब किसानों के लेखक हैं, वे धनी किसानों के समर्थक नहीं हैं। उनका किसान वह है जिनके पास पाँच-छ: बीघा जमीन है, न उतरने वाला ऋण है,न चुकाया जा सकने वाला लगान है, वह धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों से जकड़ा हुआ है, निरक्षर है, देश दुनियाँ की बड़ी-बड़ी बातें नहीं जानता। अस्तित्व - रक्षा की लड़ाई लड़ता रहता है और असंगठित है। ये किसान खेत-मजदूर बनने की प्रक्रिया में है। ऐसा किसान 'गोदान' का 'होरी' है, 'सवा सेर गेहूं' का 'शंकर' है, 'पूस की रात' का 'हल्कू' है।इस किसान के पक्षधर होने के कारण ही प्रेमचंद सामंतवाद के विरोधी हैं और इसीलिए साम्राज्यवाद विरोधी भी हैं।आज प्रेमचंद के विचारों का साहित्य ही हमारे लिए प्रकाश - पुंज है, मार्ग-द्रष्टा है, जिनके बारे में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन (1936) में अध्यक्षीय संबोधन में कहा था-" हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे,सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।

आज भी स्थितियां जस की तस है। हमें अपनी भूमिका तलाशने होंगे।

हम संकल्पित हैं ,सच्चाई के लिए उठते नारों की बँधी मुट्ठियों में हमारी मुट्ठी भी लहराती रहेगी।


अन्त में 'रणेन्द्र' की इन पंँक्तियों के साथ-


"कैसे समझाएँ साहब,ये खतियान में दर्ज

जमीन के टुकड़े भर नहीं हैं, हमारे खेत

हमारी भूख का विस्तार है,

हमारे होने का सबूत।

यहाँ की हवा में

हमारे पूर्वजों की साँसे घुली हैं

उनकी देह का ताप शेष है

इस पीली धूप में अब भी।"


महान साहित्यकार प्रेमचंद को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।


              नूतन देव आनन्द

             प्रगतिशील लेखक संघ, पूर्णियाँ

*🙏 नमक का स्वाद....*

 

प्रस्तुति  - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


एक बार एक परेशान और निराश व्यक्ति अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला - गुरूजी मैं जिंदगी से बहुत परेशान हूँ। मेरी जिंदगी में परेशानियों और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं है। कृपया मुझे सही राह दिखाइये।


गुरु ने एक गिलास में पानी भरा और उसमें मुट्ठी भर नमक डाल दिया। फिर गुरु ने उस व्यक्ति से पानी पीने को कहा। उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया।


गुरु - इस पानी का स्वाद कैसा है ? बहुत ही ख़राब है, उस व्यक्ति ने कहा। फिर गुरु उस व्यक्ति को पास के तालाब के पास ले गए। गुरु जी ने उस तालाब में भी मुठ्ठी भर नमक डाल दिया फिर उस व्यक्ति से कहा– इस तालाब का पानी पीकर बताओ की कैसा है। 


उस व्यक्ति ने तालाब का पानी पिया और बोला– गुरूजी यह तो बहुत ही मीठा है।


गुरु ने कहा - बेटा जीवन के दुःख भी इस मुठ्ठी भर नमक के समान ही है। जीवन में दुखों की मात्रा वही रहती है, न ज्यादा न कम। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों का कितना स्वाद लेते हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी सोच एवं ज्ञान को गिलास की तरह सीमित रखकर रोज खारा पानी पीते हैं या फिर तालाब की तरह बनकर मीठा पानी पीते हैं।


*सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है....* बस इसी सोच के साथ आप अपना व अपने परिवार का ख्याल रखते हुयें सदा हंसते - मुस्कुराते रहें और सदा चलते रहें जोश, जुनून और जज्बे के साथ ....

एडवोकेट जयनारायण शर्मा उर्फ़ बाप जी

 मध्यप्रदेश में आगर मालवा

नाम का जिला हैं।


वहाँ के न्यायालय में सन 1932 ई. में

जयनारायण शर्मा नाम के वकील थे।


उन्हें लोग आदर से बापजी कहते थे।


वकील साहब बड़े ही धार्मिक स्वभाव के

थे और रोज प्रातःकाल उठकर स्नान करने

के बाद स्थानीय बैजनाथ मन्दिर में जाकर

बड़ी देर तक पूजा व ध्यान करते थे।


इसके बाद वे वहीं से सीधे कचहरी जाते थे।


घटना के दिन बापजी का मन ध्यान में

इतना लीन हो गया कि उन्हें समय का

कोई ध्यान ही नहीं रहा।


जब उनका ध्यान टूटा तब वे यह देखकर

सन्न रह गये कि दिन के तीन बज गये थे।


वे परेशान हो गये क्योंकि उस दिन

उनका एक जरूरी केस बहस में लगा

था और सम्बन्धित जज बहुत ही कठोर

स्वभाव का था।


इस बात की पूरी सम्भावना थी कि उनके

मुवक्किल का नुकसान हो गया हो।


ये बातें सोचते हुए बापजी न्यायालय पहुँचे

और जज साहब से मिलकर निवेदन किया

कि यदि उस केस में निर्णय न हुआ हो तो

बहस के लिए अगली तारीख दे दें।


जज साहब ने आश्चर्य से कहा

”यह क्या कह रहे हैं।

सुबह आपने इतनी अच्छी बहस की।

मैंने आपके पक्ष में निर्णय भी दे दिया

और अब आप बहस के लिए समय

ले रहे हैं।"


जब बापजी ने कहा कि मैं तो था ही नहीं

तब जजसाहब ने फाइल मँगवाकर उन्हें

दिखायी।


वे देखकर सन्न रह गये कि उनके हस्ताक्षर

भी उस फाइल पर बने थे।


न्यायालय के कर्मचारियों, साथी वकीलों

और स्वयं मुवक्किल ने भी बताया कि आप

सुबह सुबह ही न्यायालय आ गये थे और अभी

थोड़ी देर पहले ही आप यहाँ से निकले हैं।


बापजी की समझ में आ गया कि उनके रूप

में कौन आया था। उन्होंने उसी दिन संन्यास

ले लिया और फिर कभी न्यायालय या अपने

घर नहीं आये।


इस घटना की चर्चा अभी भी आगर मालवा

के निवासियों और विशेष रूप से वकीलों

तथा न्यायालय से सम्बन्ध रखनेवाले लोगों

में होती है।


न्यायालय परिसर में बापजी

की मूर्ति स्थापित की गयी है।


न्यायालय के उस कक्ष में बापजी का चित्र

अभी भी लगा हुआ है जिसमें कभी भगवान

बापजी का वेश धरकर आये थे।


यही नहीं लोग उस फाइल की प्रतिलिपि

कराकर ले जाते हैं जिसमें बापजी के रूप

मे आये भगवान ने हस्ताक्षर किये थे और

उसकी पूजा करते हैं।

💐साभार💐


जयति सनातन💐

जयतु भारतं💐

हर हर महादेव💐

गुरुवार, 1 सितंबर 2022

आत्मा कथ्य परक कविता?/डॉ

 सप्रेम नमस्ते! प्रस्तुत है आत्म-कथ्य-परक एक गीत :

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रहा विसंगतियों से लड़ता, जीता या हारा 

नहीं बहायी किन्तु दीन हो, आंसू की धारा.


तख़्त-ताज को झुका न किंचित 

हर पल कष्ट सहा 

पकड़ किसी की पूंछ धार के 

संग-संग नहीं बहा 


रह-रह घिरता रहा राह में यद्यपि अंधियारा.


किसी प्रलोभनवश कोई 

समझौता नहीं किया 

जैसे भी जी सका 

शर्त पर अपनी सिर्फ जिया 


यह भी नहीं कि मुझको कोई स्वप्न न था प्यारा.


किसी हाथ ने कभी न 

जलता मस्तक सहलाया 

एकाकीपन में गीतों को 

सुबक-सुबक गाया 


जीवन में अंधियार घिरा था, मन में उजियारा .


नहीं किसी ने आकर मन से 

मन का हाथ गहा 

सदा सहज अभिलाषाओं का 

यद्यपि साथ रहा 


सबके हित सर्वस्व लुटाकर रहा सर्वहारा.


हर ठोकर ने फिर से उठकर 

चलना सिखलाया 

किसी किरण को लेकिन 

मन का घाव न दिखलाया 


बीहड़ पथ पर बढ़ा अकेला, बनकर बंजारा.


------- धनञ्जय सिंह.

कूट नीति

 *कूटने से बढ़ती है -इम्युनिटी पॉवर*                 *दादा जी से पूछा*     *कि पहले लोग बहुत कम*           *बीमार  होते थे ?*            *तो...