बुधवार, 2 दिसंबर 2015

मिर्जा गालिब 1797-1869 की गदलें






प्रस्तुति- अनिल कुमार चंचल





अज़ मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
अजब नशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे
अफ़्सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने
अर्ज़-ए-नाज़-ए-शोख़ी-ए-दंदाँ बराए-ख़ंदा है
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
'असद' हम वो जुनूँ-जौलाँ गदा-ए-बे-सर-ओ-पा हैं
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
आमद-ए-सैलाब-ए-तूफ़ान-ए-सदा-ए-आब है
आलम जहाँ ब-अर्ज़-ए-बिसात-ए-वजूद था
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
इश्क़ तासीर से नौमीद नहीं
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए
एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिखा था सो भी मिट गया
ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
क़तरा-ए-मय बस-कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ
क़फ़स में हूँ गर अच्छा भी न जानें मेरे शेवन को
कब वो सुनता है कहानी मेरी
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ कहिए
काबे में जा रहा तो न दो ताना क्या कहें
कार-ख़ाने से जुनूँ के भी मैं उर्यां निकला
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है
किस का ख़याल आइना-ए-इन्तिज़ार था
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए
क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
क्यूँ न हो चश्म-ए-बुताँ महव-ए-तग़ाफ़ुल क्यूँ न हो
क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है
ख़ुद-परस्ती से रहे बा-हम-दिगर ना-आश्ना
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
ग़म खाने में बोदा दिल-ए-नाकाम बहुत है
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़ यक नफ़स
ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
गर न अंदोह-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त बयाँ हो जाएगा
गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के
घर जब बना लिया तिरे दर पर कहे बग़ैर
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है
चाक की ख़्वाहिश अगर वहशत ब-उर्यानी करे
चाहिए अच्छों को जितना चाहिए
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
जब ब-तक़रीब-ए-सफ़र यार ने महमिल बाँधा
ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
जराहत तोहफ़ा अल्मास अर्मुग़ाँ दाग़-ए-जिगर हदिया
जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं
जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआ
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी
जौर से बाज़ आए पर बाज़ आएँ क्या
तग़ाफ़ुल-दोस्त हों मेरा दिमाग़-ए-अज्ज़ आली है
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
ता हम को शिकायत की भी बाक़ी न रहे जा
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म ओ राह हो
तू दोस्त किसू का भी सितमगर न हुआ था
तेरे तौसन को सबा बाँधते हैं
दर-ख़ूर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए
दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया

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