बुधवार, 2 दिसंबर 2015

निजाम रामपुरी 1822-1872 की गजलें


ग़ज़ल
अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ
आदत से उन की दिल को ख़ुशी भी है ग़म भी है
इस क़दर आप का इताब रहे
उस से फिर क्या गिला करे कोई
और अब क्या कहें कि क्या हैं हम
कभी मिलते थे वो हम से ज़माना याद आता है
कहते हैं सुन के माजरा मेरा
कहने से न मनअ कर कहूँगा
कहिए गर रब्त मुद्दई से है
किसी ने पकड़ा दामन और किसी ने आस्तीं पकड़ी
क्यूँ नासेहा उधर को न मुँह कर के सोइए
ख़बर नहीं कई दिन से वो दिक़ है या ख़ुश है
ख़ैर यूँही सही तस्कीं हो कहीं थोड़ी सी
गए हैं जब से वो उठ के याँ से है हाल बाहर मिरा बयाँ से
गर कहूँ मतलब तुम्हारा खुल गया
गर दोस्तो तुम ने उसे देखा नहीं होता
छेड़ मंज़ूर है क्या आशिक़-ए-दिल-गीर के साथ
जब तो मैं हूँ आह में ऐसा असर पैदा करूँ
ज़ाए नहीं होती कभी तदबीर किसी की
जो चुप रहूँ तो बताएँ वो घुँगनियाँ मुँह में
जो सरगुज़िश्त अपनी हम कहेंगे कोई सुनेगा तो क्या करेंगे
तसव्वुर आप का है और मैं हूँ
तिरे आगे अदू को नामा-बर मारा तो क्या मारा
तुम से कुछ कहने को था भूल गया
तुम्हें हाँ किसी से मोहब्बत कहाँ है
दिल पे जो गुज़रे है मेरे आह मैं किस से कहूँ
दिल में क्या उस को मिला जान से हम देखते हैं
दिल लगे हिज्र में क्यूँ कर मेरा
देख अपने क़रार करने को
देखिए तो ख़याल-ए-ख़ाम मिरा
नहीं सूझता कोई चारा मुझे
फ़िक्र यही है हर घड़ी ग़म यही सुब्ह ओ शाम है
फ़िराक़ में तो सताती है आरज़ू-ए-विसाल
बिगड़ने से तुम्हारे क्या कहूँ मैं क्या बिगड़ता है
मज़ा क्या जो यूँही सहर हो गई
महफ़िल में आते जाते हैं इंसाँ नए नए
मिरी साँस अब चारा-गर टूटती है
मुझ से क्यूँ कहते हो मज़मूँ ग़ैर की तहरीर का
याँ किसे ग़म है जो गिर्या ने असर छोड़ दिया
ये अजब तुम ने निकाला सोना
वही लोग फिर आने जाने लगे
वाँ तो मिलने का इरादा ही नहीं
वो ऐसे बिगड़े हुए हैं कई महीने से
वो तो यूँही कहता है कि मैं कुछ नहीं कहता
वो बिगड़े हैं रुके बैठे हैं झुँजलाते हैं लड़ते हैं
शब तो वो याँ से रूठ के घर जा के सो रहे
सदमे यूँ ग़ैर पर नहीं आते
साफ़ बातों में तो कुदूरत है
हम को शब-ए-विसाल भी रंज-ओ-मेहन हुआ
हाल-ए-दिल तुम से मिरी जाँ न कहा कौन से दिन
हिलती है ज़ुल्फ़ जुम्बिश-ए-गर्दन के साथ साथ
हो के बस इंसान हैराँ सर पकड़ कर बैठ जाए

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