बुधवार, 2 दिसंबर 2015

शेख इब्राहिम जौक1890-1054 की गजलें




प्रस्तुति- रेणु दत्ता


अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
आँख उस पुर-जफ़ा से लड़ती है
आँखें मिरी तलवों से वो मिल जाए तो अच्छा
आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई
इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है
उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है
ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ
कब हक़-परस्त ज़ाहिद-ए-जन्नत-परस्त है
कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर
क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं
कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे
किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा
क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए
कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे
कोई कमर को तिरी कुछ जो हो कमर तो कहे
कौन वक़्त ऐ वाए गुज़रा जी को घबराते हुए
क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बाद
क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले
गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में
गुहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं
चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे
चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए
ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से
जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर
जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा
जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है
तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं
दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया
दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे
दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से
दूद-ए-दिल से है ये तारीकी मिरे ग़म-ख़ाने में
न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता
न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से
नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए
नाला इस शोर से क्यूँ मेरा दुहाई देता
निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी
नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा
बज़्म में ज़िक्र मिरा लब पे वो लाए तो सही
बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई
बलाएँ आँखों से उन की मुदाम लेते हैं
बाग़-ए-आलम में जहाँ नख़्ल-ए-हिना लगता है
मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते
मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ
मार कर तीर जो वो दिलबर-ए-जानी माँगे
मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला
ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है
रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले
वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता
सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है
हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का
हम हैं और शुग़्ल-ए-इश्क़-बाज़ी है
हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो
हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से
हैं दहन ग़ुंचों के वा क्या जाने क्या कहने को हैं

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