शुक्रवार, 6 मई 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 आखिर अब तक / रवि अरोड़ा



याददाश्त अच्छी होने के भी बहुत नुकसान हैं । हर बात पर दिमाग अतीत की गलियों में भटकने चला जाता है और हुई प्रत्येक घटना की तुलना इतिहास की मिलती जुलती किसी घटना से करने लगता है । हो सकता है कोई इसे दिमागी फितूर कहे और इसे ही पागलपन की शुरुआत माने मगर हो तो यह भी सकता है कि कोई कोई इसे अतीत से सबक सीखने का हुनर ही करार दे दे । बहरहाल जो भी हो, हाल ही में पटियाला में खालिस्तान समर्थकों और शिवसेना के बीच हुई हिंसा ने मुझ जैसे खाली दिमाग लोगों को फिर इतिहास की गलियों में छोड़ दिया है और आशंकाएं जन्म लेने लगी हैं कि कहीं पंजाब में फिर से तीस चालीस साल पुराना इतिहास दोहराने की कोशिशें तो नहीं की जा रहीं ? पंजाब की गंदी राजनीति और ताज़ा घटनाक्रम तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहा है ।


हाल ही में संपन्न हुए पंजाब के विधानसभा चुनावों से पहले ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चाएं शुरू हो गईं थीं कि कट्टरपंथी सिक्खों के वोट हासिल करने के लिए आम आदमी पार्टी खालिस्तानी मूवमेंट को हवा दे रही है । आप पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल के पुराने साथी रहे कवि कुमार विश्वास ने भी कुछ ऐसा आरोप लगाया था । खालिस्तान आंदोलन के नेता और आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को अपनी संस्था सिख फॉर जस्टिस के लेटरहेड पर पत्र लिख कर दावा भी किया है कि आप पार्टी की सरकार खालिस्तान समर्थकों के चंदे और वोट से बनी है अतः अब वे खालिस्तान बनाने में सहयोग करें। खालिस्तान समर्थकों का पंजाब में इनदिनों अचानक से दिख रहा जोश भी अनेक सवाल खड़े कर रहा है । उधर आप की इतनी बड़ी जीत को भाजपा पचा पा रही है और न ही अकाली और कांग्रेसी। सो आप की सरकार को असफल करने को वे भी आग में दौड़ दौड़ कर घी डाल रहे हैं । पटियाला की घटना से कुछ ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं ।


आजादी के बाद सबसे संपन्न राज्य के रूप में उभरे पंजाब को देश की राजनीति ने ही हमेशा से कुतरा है । अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए सातवें दशक में शिरोमणि अकाली दल ने अलगाववाद की राजनीति शुरू की तो उसके जवाब में कांग्रेस ने भिंडरवाला को खड़ा कर दिया । जब भिंडरवाला कांग्रेस के हाथ से निकल कर कांग्रेस और सरकार को ही चुनौती देने लगा तो कांग्रेस ने उसे और उसके साथियों को ही खत्म कर दिया । बदले की कार्रवाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई और फिर उसके बाद देश में हुई सिख विरोधी इकतरफा नृशंस हिंसा । बेशक कोई कहे कि कांग्रेस ने ही खालिस्तान आंदोलन को कुचला मगर यह अधूरी सच्चाई ही होगी । सच्चाई का एक बड़ा भाग यह भी था कि स्वयं पंजाब की जनता ने ही उकता कर अलगाववाद को नकार दिया था और इसी के चलते खालिस्तान आंदोलन जमीदोज हो गया । लगभग डेढ़ दशक तक चले इस आंदोलन में हजारों लोगों की जानें गईं और ऑपरेशन ब्लूस्टार में स्वर्ण मंदिर में टैंक घुसने, प्रधान मंत्री की हत्या और हजारों मासूम सिक्खों के निर्मम कत्ल से दुनिया भर में देश की छवि इतनी खराब हुई कि उससे बाहर आने में दशकों लगे । पंजाब के करोड़ों लोगों ने जो दशकों तक नारकीय जीवन जीया सो अलग । 


सभी जानते हैं कि पंजाब इस वैहशियाना दौर को भूल कर फिर तरक्की की राह पर सरपट दौड़ रहा है मगर हाय री हमारी राजनीति , पता नहीं क्यों उससे पंजाब की खुशी देखी नहीं जाती । बॉर्डर से सटे इस सूबे पर पहले से ही पड़ोसी देश पाकिस्तान की तिरछी निगाह रहती है और विदेशों में बैठे देश विरोधी संघटन भी समय समय पर पंजाब की शांति में व्यवधान डालने से बाज नहीं आते और अब रही सही कसर मुल्क की गंदी राजनीति पूरी कर रही है । पटियाला कांड इसका उदाहरण है । पता नहीं क्या होगा पंजाब का ? बेशक यहां के लोग अभी तक इस नेताओं की चालों को नाकाम करते आ रहे हैं मगर मुझ जैसे कमजोरमना लोगों को तो यह आशंका हो ही रही है कि आखिर कब तक ?



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