शनिवार, 7 नवंबर 2015

अन्धे भिखारियों का गीत /


   

 

राजकमल चौधरी



जाने की इच्छा एकदम नहीं थी, मगर शशि का आग्रह टाल देना बड़ा ही कठिन है, जाने की
अस्त-व्यस्तता से अधिक कटु हैं। जाने की इच्छा एकदम नहीं थी, फिर भी शशि का साथ देना ही था, दिया।
रात के आठ बज रहे थे। हवा बहुत तेज थी। पानी बरस रहा था और पांच कुलियों वालें बंद रिक्शे के शीशों पर हवा और पानी का शोर मन को उतना बुरा नहीं लग रहा था। शशि ने कहा-दुबारा तो मसूरी आना नहीं है, फिर क्यों रात-दिन फ्लैट में घुसे जासूसी किताबें पढ़ते रहें?
रिक्शे से उतरकर हम लोग सीधे ‘रायल्टी सिनेमा‘ में घुस गए। ‘हाउ दे लव इन साउथ सी‘, दक्षिणी सागरों के निवासी कैसे प्यार करते हैं-फिल्म का नाम यही था। शो-बोर्ड के बड़े पोस्टर पर एक लड़का और एक लड़की थी। मैं उदास हो गया। एक लड़का और एक लड़की। मैं सचमुच उदास हो गया। दुनिया के सारे लड़कों और दुनिया की सारी लड़कियों को जैसे आमने-सामने खड़े होने के सिवा और काम ही नहीं है।
-- और काम क्यों रहे? खड़े होने के पैसे मिलते हैं -- शशि ने समाजशास्त्र पर अपना लेक्चर शुरू किया -- थियेटर के स्टेजों पर खड़े होते हैं और पैसे मिलते हैं। चित्रकारों के मॉडल बनते हैं और पैसे मिलते हैं। स्टैग-पार्टी में शराब की आदम-कद बोतलों में नंगी खड़ी होनेवाली लड़कियां देखी हैं, महेन्दर?
मैंने नहीं देखी है। मैं देखना नहीं चाहता। लोग प्यार कैसे करते हैं, चाहे दक्खिनी सागरों में, चाहे उन्नीस हजार फीट की ऊंचाई पर मसूरी हिल में, मैं देखना नहीं चाहता। प्रेम को, प्रेम करने के तरीकों को किसी कथा का विषय बनाना न्याय नहीं है, नैतिक नहीं है। स्त्री और पुरुष का प्रेम, स्त्री पत्नी हो या प्रेमिका या बाजार से खरीदी गई कोई कठपुतली और पुरुष पति हो किंवा प्रीतम या रात के डाकबंगले में ठहरा हुआ कोई अपरिचित राहगीर, स्त्री और पुरुष का प्रेम अत्यंत व्यक्तिगत वस्तु है। उनका आकलन न तो उपयोगी है, न शोभन।
हमने आदम और ईव और अदन के बाग को हजारों साल पीछे छोड़ दिया है। हम तो सोने के कमरों में पर्दे लगाते हैं, खिड़कियों में लोहे की सलाखें और दरवाजे लगाते हैं, हम अपने इर्द-गिर्द अंधेरे की नकाब डाल लेते हैं, चेहरों पर ही नहीं, हर चीज पर!
मगर, यह सच है कि दक्षिणी सागर के सुदूर द्वीपों में, पोलिनेशिया के इलाके में, ताहिती और टोंगा और समोआ में लोग प्यार करते हैं तो अंधेरा नहीं करते, उनके इर्द-गिर्द कोई सभ्यता, कोई संस्कृति, कोई पर्दागिरी, कोई आइन-कानून नहीं है।
फिल्म की रीलें तेज चल रही थीं और हवाई-द्वीप के होटलों में जंगली और आदिम धुनों पर नंगी वहशियतों के नाच उभार पर थे और अंधेरा न था, उजाला ही उजाला था।
मैंने ताहिती की एक आदिम औरत से पूछा-तुम्हें शर्म नहीं आती? तुम प्यार करना भी नहीं जानती हो?
वह मुस्कुराई। वह मुस्कुराई और अपने मोटे होठों और अपने नुकीले चेहरे को अपनी लगातार मुस्कुराहटों से छिपाए रखकर नाचती हुई, हवा के बगूले की तरह नाचती हुई, दूर चली गई। चली गई, क्योंकि उसकी भाषा में ‘शर्म‘ और ‘प्यार‘ ये दो शब्द नहीं हैं। क्योंकि प्रकृत है लज्जा-विहीनता, क्योंकि प्रकृत है शरीर-बोध, क्योंकि प्रकृत पशुत्व है।
और मैं और शशि देर तक पोलिनेशियन औरतों, होंगि (नासिका-चुंबन, दक्षिणी द्वीपों के लोग अधरों से अधिक महत्त्व नासिका को ही देते हैं) की भंगिमाओं, हुला-हुला नाचों और इन सब में फैले हुए नंगेपन का सुख लेते रहे।
फिर फिल्म खत्म हो गई। बरसात रुक गई। मसूरी-हिल के वसंत की निशा अधिक शांत और अधिक एकांत होने लगी।
-- पहले ‘क्वालिटी‘ में काफी पिएंगे, फिर वापस लौटकर सो जाएंगे-शशि ने कहा और हमलोग ‘क्वालिटी‘ में आ गए।
शशि मेरा दोस्त है। लगभग अठारह-बीस साल पहले हम दोनों बच्चे थे और मसूरी के ‘सेंट मेरी हिल-स्कूल‘ में जूनियर कैंब्रिज में पढ़ते थे। मसूरी के बाद मैं कलकत्ते चला गया और चौरंगी और पार्कस्ट्रीट और डलहौजी के फुटपाथों पर अपनी किस्मत ढूंढ़ने लगा। किस्मत, यानी नौकरी और घर-परिवार और शांति। मसूरी के बाद शशि अपने बूढ़े पिता का कारोबार संभालने दिल्ली चला गया और सोने-चांदी की सिलों और पत्नी की मुस्कानों में खो गया। दो दुनिया थीं, मगर नंगापान नहीं था, असभ्यता नहीं थी, शांति और सहजता थी।
मगर, आदमी (पता नहीं क्यों) शांति से ऊब जाता है। सहजता से भागने लगता है। आदमी के अंदर पोलिनेशिया की औरतें छटपटाने लगती हैं।
हमारे होटल में कुल चार अदद फ्लैट हैं और चारों फ्लैटों के बेडरूम एक-दूसरे से टिके खड़े हैं। पार्टीशन की दीवारें प्लाइ-उड की हैं। आंखें आर-पार न हों, ध्वनियां बिना इच्छा किए भी कानों से टकराती रहती हैं। जैसे हम सभी अंधे हों और भिखारी हों और एक-दूसरे को अपने रटे-रटाए गीत सुना रहे हों...
शशि अपने कमरे में चला गया और बालीनीज औरतों की बातें सोचने लगा। बालीनीज औरतें, जापान की गेइशा नर्तकियां सुदूर पूर्वी टापुओं की मरमेड्स, मलाया की रिफ्यूजी लड़कियां, हांगकांग की बार-गर्ल्स यानी औरतें! और औरतें और सिर्फ औरतें! मगर...
-- आइए, डॉक्टर मिश्रा! चले आइए, मुझे भी नींद नहीं आ रही है -- मैं निद्रालस-सी खोखली हँसी हँसता हूँ। डॉक्टर मिश्रा बहुत परेशान हैं। इस सर्दी में उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलछला रही हैं।
-- आप पिक्चर देखने गए थे? लीलावती वहां थीं?...देखिए न, ग्यारह से ज्यादा हो रहे हैं। पता नहीं, कहां रह गई हैं -- डॉक्टर मिश्रा मेरे उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करते, वापस चले जाते हैं। अपने कमरे में रोती हुई बच्ची को चुप करने की नाकामयाब कोशिश करते हैं। लिलि चुप नहीं होती है। लिलि चुप नहीं होगी और ‘हिक्मेन‘ होटल के बाल-रूम में नाच और नाच के हर मोड़ पर शराब के दौर और दौर के हर चौराहे पर ठहाकों की भीड़ खत्म नहीं होगी।
मुझे लगता है, इतनी मामूली-सी बात के लिए मैं पागल हो जाऊंगा। लिलि का रोना बंद करना ही होगा, नहीं तो मैं नंगी दीवारों से अपना सिर फोड़ लूंगा। शराबी ठहाकों की भीड़ तोड़नी ही होगी, नहीं तो मैं अपने कपड़े चीरकर नंगा हो जाऊंगा और वहशी होकर शहराहों पर दौड़ने लगूंगा। मुझे लगता है, मुझे मौत की खामोशी चाहिए। मुझे चीख और ठहाके नहीं चाहिए।
ताहिती की एक औरत अपनी मुस्कुराहटों की नकाब में अपना चेहरा छिपाए आती है और मुझसे पूछती है-पागल क्यों होते हो? लीलावती सुबह होने से पहले लौट आएगी। हर औरत लौट आती है। स्पार्टा की हेलेन तक लौट आई थी...
बीच का पार्टीशन प्लाइ-उड का है और उस पार चिमनभाई दौलत भाई हीरेवाला का फ्लैट है। चिमनभाई जूट के उद्योगपति हैं। उनके फ्लैट के दरवाजों और खिड़कियों पर टंगे जूट के मोटे पर्दों पर अजंता के देवता और खजुराहो की यक्षिणियां सो रही हैं। इन पर्दों के पीछे उनका समूचा परिवार सो रहा है। बूढ़े बरगद के पेड़ जैसी बीवी और सात-आठ लड़के-लड़कियां। लड़कों की बीवियां और बच्चे और नौकर, खानसामे, बावर्ची, ड्राइवर! अच्छा-खासा करावां है, और फ्लैट में कुल दो अदद सोने के कमरे हैं। एक बाथ-रूम है, जिसमें नौकर सोते हैं। एक किचन है, जिसमें पतोहुएं सोती हैं। एक बरामदा है, जिसमें सारे असबाब बिखरे पड़े हैं। सोने के एक कमरे में लड़के और चिमनभाई। सोने के दूसरे कमरे में लड़कियां और मिसेज चिमनभाई।
और अब रात का एक बज चुका होगा। डॉक्टर मिश्रा के कमरे में घिसे-पिटे ग्रामोफोन पर कोई घिसा-पिटा फिल्मी गाना बज रहा है। वातावरण बहुत कुरूप है, निरीह है, ऐसी लड़की की तरह जो अपने क्वारेपन में ही बहुत बूढ़ी हो चुकी हो। लिलि की चीख और ‘मेरा नाम अबर्दुरहमान...मेरा नाम अबर्दुरहमान‘ और आइ विल वाक इन द रेन, आल नेकेड, नेकेड...आइ विल वाक इन द रेन...नेकेड‘ और ‘या निशा सर्वभूतनां तस्याम् जागर्ति संयमी‘...और आवाजों का जुलूस। तरह-तरह के भावों और अर्थों की आवाजों का जुलूस और वातावरण, एक ऐसी लड़की है जो शादी के पहले ही बहुत बूढ़ी हो गई है।
-- ममी, अभी तक जगी हुई हैं। कमला दीदी, घंटे-भर और रुक जाओ। दीदी, घंटे-भर और...
-- जरा शर्म तो करो जी, इतना छोटा कीचन है। पहले नहीं सोचा गया... कहीं बड़ा फ्लैट ले लेते। इस किचन में तो पांव भी नहीं फैला सकते हैं...
-- सो गए क्या? बाथ-रूम का नल खुला रह गया है। उफ, कैसे मैं जाऊं... बरामदे में सारे नौकर सोए पड़े हैं...सुनो, सो गए क्या...
-- कमला की मां, चलो बरामदे में चलें... बड़ी गलती हुई जो इस कन्जेस्टेड होटल में आ गए...
-- एक बीड़ी लाओ, ड्राइवर बाबू, नींच नहीं आती है...कित्ती तेज हवा चल रही है...बाप रे!...
-- बिजली किसने जला दी?...किसने स्विच ऑन किया?...जरा भी शर्म-हया नहीं है...हाय! बत्ती ऑफ करो! बत्ती ऑफ करो!... मगर, बत्ती ऑफ करने से क्या होता है? मगर, अंधेरे से क्या होता है? अंधेरा क्या हमारी मजबूरियों को ढक सकता है? अंधेरा क्या हमारी आवाजों को रोक सकता है? अंधेरा क्या अंधेरे की वहशियतों को शांत कर सकेगा?
ताहिती की एक औरत आती है और मुस्कुराहटों का नकाब चेहरे से उतारकर मेरी तरफ फेंक देती है, और मेरे पास खड़ी होकर कहती है-इस अंधेरे की क्या जरूरत है? अंधेरे की पर्तें चीरकर रख दो, तुम्हें उजाले से कभी, किसी दिन डरना नहीं पड़ेगा! उजाला दोस्त है, उजाला दुश्मन नहीं है।
यह अंधेरा ही है, जिसे हम संस्कृति और सभ्यता और सामाजिक चेतना और धार्मिक आचार कहते हैं। और, हम यह अंधकार ध्वस्त कर दें? स्तेन्दां की कहानी के नायक की तरह... ‘दहा सहाती सहाती सैतिस्फैक्तो‘ के प्रेत का स्याह नकाब चीर दें? क्या अंधकार हमार शत्रु है?
डॉक्टर मिश्रा का ग्रामोफोन बंद हो गया है और लिलि सो गई है। नींद बहुत ही मेहरबान है। हम सो जाते हैं और कई बातें उसकी अजानी घाटियों में, अंधकार-ग्रस्त कंदराओं में खो जाती हैं। ग्रामोफोन बंद है, लिलि (सपने में) ममी की गोद में लेटी हुई है और डॉक्टर मिश्रा बहुत ही मीठे लहजे में कहते हैं-आ जाइए कमला बहन, कुछ बातें करें। लीला नहीं लौटी है, शायद आज रात लौटेगी भी नहीं!
-- अब रात बची ही कितनी है। मैं तो घंटे-भर से आने की कोशिश कर रही थी। किसी ने बत्ती जला दी...ममी जग गईं, विमला मुझे रोक रही थी। एक सिगरेट दीजिए डॉक्टर। -कमला बहन की आवाज में बड़ी ही बेसब्र थरथराहटें हैं।
-- सिगरेट मैं जला देता हूं...उफ, कितनी सर्द हवा चल रही है! आपका हाथ तो बर्फ हो गया है। यह शाल डाल लीजिए! -- डॉक्टर मिश्रा की आवाज में बड़ी ही कमजोर वहशियतें हैं।
शशि झल्लाता हुआ मेरे कमरे में आता है। उसके चेहरे पर अथाह गुस्सा है, उसकी आंखों में थ्री-एक्स रम की तेजी और तीखापन है।
-- यह रात बर्दाश्त के काबिल नहीं है। तुम यहां बैठे तमाशा देखते रहो... मैं बाहर जा रहा हूं-शशि एक हवाना-सिगार जलाता है और भूखे कुत्ते की तरह कमरे में चक्कर काटने लगता है। मैं उसकी और अपनी और सारे लोगों की हालत समझता हूं। मुझे सभी लोगों से सहानुभूति है। मैं पूछता हूं-कहां जाओगे? इतनी सर्दी में कहां जाओगे?
-- कहीं भी चला जाऊंगा। मसूरी है और जाने की जगहों की कमी नहीं है। और कहीं नहीं ंतो किसी बार-हाउस में घुस जाऊंगा और किसी बूढ़ी औरत के साथ बैठकर ‘राक-एन-रोल‘ सुनूंगा और रमी खेलूंगा और बेमतलब ठहाके लगाऊंगा। -- शशि गुस्से में है, शशि गुस्से के नशे में है, शशि नशे के गुस्से में है। वह बुझा हुआ सिगरेट फिर से जलाकर कमरे के बाहर, फ्लैट के बाहर, होटल के बाहर निकल जाता है। शशि बहुत भावुक है। मैं सोचता हूं और मुस्कुराता हूं।
ताहिती की एक औरत आती है और मेरी कुर्सी की पीठ पर अपना शरीर टिकाकर खड़ी होती है और सिगरेट का कश खींचती हुई कहती है-अब सो जाओ तुम! तुम्हें नींद आ रही है, सो जाओ तुम! अंधेरे और उजाले का फर्क निकालने की कोशिश मत करो। दरअसल फर्क नहीं है। फर्क कभी नहीं था, कहीं नहीं था।
मैं उसकी बात पर यकीन कर लेता हूं और कमरे की बत्ती बुझाकर बिस्तरे में घुसता हूं। मुझे सो जाना चाहिए। जागकर रात काट देने से कोई लाभ नहीं है।
अचानक दरवाजे के पस दो धुंधली आकृतियां आकर समाप्त हो जाती हैं। मैं बत्ती नहीं जलाता हूं, चुपचाप बिस्तरे से नीचे उतरकर खड़ा होता हूं। एक सिगरेट जलाता हूं, माचिस की मद्धिम रोशनी में अपना चेहरा अपरिचित लगता है। मैं कौन हूं? मैं किसके लिए जगा हूं?
-- मैं आपके फ्लैट की बगल में रहता हूं। डाइनिंग हॉल में रोज आपसे मुलाकात होती है। यह मेरी बहन है, ललिता! यू नो, आइ एम विद माइ वाइफ आल्सो... और हमारे पास एक ही कमरा है, ओनली वन रूम। -- चौथे फ्लैट के मिस्टर नम्बूद्रीपाद कहते हैं और कहते वक्त उनके चेहरे पर शर्मिंदगी की हल्की-सी भी शिकन नहीं है।
-- फिर? व्हाट कैन आइ डू फार यू? मैं क्या कर सकता हूं? एक कमरे में तो आपको बड़ी मुसीबत होती होगी। कहिए?
मैं उनकी मुसीबत समझ रहा हूं। समझ रहा हूं और तीस-बत्तीस साल की मोटी-सी क्वांरी लड़की ललिता नम्बूद्रीपाद को देख रहा हूं। ललिता सुंदरी नहीं है पर युवती है। ललिता कोमल-कांत नहीं है, ठोस और मजबूत है। ललिता संगीत नहीं है, नृत्य है...
-- देखिए, आपके दोस्त अभी-अभी बाहर गए हैं। सुबह तक लौटेंगे नहीं। क्या ललिता को उनके कमरे में सोने दे सकेंगे? सिर्फ आज रात सोने दे सकेंगे? ए मैटर ऑफ फोर-फाइव आवर्स। आइ थिंक...प्लीज! -नम्बूद्रीपाद की आवाज में बहुत सुसंस्कृत प्रवाह है, बहुत दुर्वह व्यथा है। ललिता की आंखों में उत्सुकता भी है और नींद का गहरा खुमार भी है। और मेरी आवाज में तथा मेरी आंखों में कुछ नहीं है।
नम्बूद्रीपाद ‘थैंक्यू‘ कहकर अपने कमरे में वापस लौट जाते हैं और प्रतीक्षा करती हुई अपनी पत्नी से कहते हैं, ‘ही इज ए नाइस चैप।‘ -- फिर दोनों की चंचल खिलखिलाहट समूचे फ्लैट में गीत की एक मीठी लहर बनकर फैल जाती है।
ललिता कमरे में खड़ी रहती है और मैं रोशनी नहीं जलाता हूं। मैं सोचने की कोशिश करता हूं कि यह अनजान, अपरिचित औरत किसलिए मेरे कमरे में बुत-सी खड़ी मेरी आज्ञा का इंतजार कर रही है, क्यों?
-- मैं भी बाहर जा रहा हूं। दोनों कमरे खाली हैं सुबह तक खाली रहेंगे। आप जहां चाहें सो सकती हैं। मैं जा रहा हूं -- मेरे संस्कार कहते हैं कि मैं बाहर जाऊं, जिधर शशि गया है। उधर ललिता कहती है-आप क्यों जा रहे हैं? आप सो जाइए। मैं भी आपके दोस्त के बिस्तरे में जाती हूं। या अगर सोना नहीं चाहते हों तो यहीं बैठिए। हम दोनों बातें करेंगे, रात कट जाएगी। मैं आपके लिए और अपने लिए कॉफी बनाऊंगी।
ललिता कितनी ही बातें कहती है, मगर मैं चुपचाप कमरे के बाहर निकल आता हूं। होटल की सीढ़ियों पर आकर खड़ा हो जाता हूं। सीढ़ियां बहुत नीचे सड़क तक चली गई हैं, स्याह पत्थरों की काली सीढ़ियां...
वह घर के बाहर है, और शराब की बेहोशी में डूबे हुए कहकहों में शांति ढूंढ़ रही है। होटल के बाहर शशि है और सुनसान और बर्फीली सड़कों पर शांति ढूंढ़ रहा है। और होटल के चौड़े दरवाजें पर खड़ा मैं सोच रहा हूं कि यह शांति क्या है? मुझे पता नहीं, शांति क्या है और अंधेरा क्या है और उजाला क्या है?
ताहिरी की एक औरत मेरे पास आती है और मेरी बांहों को थामती हुई, मेरे चेहरे को अपने बालों में लपेटती हुई, मेरी गर्म सांसों में नहाती हुई, मेरी नसों में तेज जहर बनकर रेंगती हुई कहती है -- मेरे दोस्त, अपने कमरे में लौट चलो। नही तो सीढ़ियों से नीचे गिर जाओगे! पहाड़ों की गहरी घाटियां तुम्हें निगल जाएंगी! अपने कमरे में लौट चलो।
और मैं अपने कमरे में लौट आता हूं। ललिता अब तक वहीं खड़ी है, पत्थर की मूरत की तहर जमी हुई। मुझे लौटता पाकर वह मुस्कुराती है। मुस्कुराती हुई कहती है-हमारे पास कुल तीन-चार घंटे ही हैं...इसके बाद, हम फिर एक-दूसरे के लिए अपरिचित हो जाएंगे!
-- और क्या अभी हम एक-दूसरे के लिए अपरिचित नहीं हैं? तुम तो मेरा नाम तक नहीं जानती हो। -- मैं गुस्से में भरकर उत्तर देता हूँ और फ्लैट की सारी बत्तियाँ जला देता हूँ।
ललिता बहुत खूबसूरत है। ललिता बहुत खूबसूरत है और ऊँची सीढ़ियों पर अपने भारी बूट पटकता हुआ शशि वापस आ रहा है और शशि की बाँहों में खिलखिलाती हुई लीलावती वापस आ रही है और लिलि सो गई है।

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