शनिवार, 7 नवंबर 2015

मैकलुस्कीगंज की कहानी

 

 

 

 

मैकलुस्कीगंज

मैकलुस्कीगंज झारखण्ड की राजधानी राँची से मात्र 40 किलोमीटर की दुरी पर अवस्थित है। इस शहर में एक समय एंग्लो-इंडियन बडी़ संख्या में बसते थे। लेकिन अब इनकी संख्या में भारी गिरावट आई।

संस्थापना

मैकलुस्कीगंज की स्थापना कोलोनाइजेशन सोसाइटी आफ इण्डिया द्वारा 1933 में की गई थी। यह एंग्लो-इंडियन के लिये होम लैंड यानि मुल्क के रुप में था। 1932 में एडवर्ड थामस मैक्लुस्की ने पुरे भारत में रह रहे लगभग 200000 एंग्लो-इंडियन को यहां बसने का न्योता भेजा था। लगभग 300 परिवार यहां आकर बसें और अब केवल 20 परिवार ही बचे, ज्यादातर परिवार द्वितीय विश्व युध के बाद यहां से आस्ट्रेलिया, अमेरिका, व युरोपीय देशों में चले गये।
शहर की शांति, हरियाली और धुल धुसरित सड़कें देखने ही बनती।
आज ज्यादातर पुरानी हवेली को गेस्ट हाउस मे परिवर्तित कर दिया गया है। जिसका प्रयोग पर्यटक यहां ठहरने के लिये करते है। डुग डुगी नदी और जागृति विहार पर्यटकों के मुख्य आकर्षण का केन्द्र होता है।
मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा की आमने सामने की स्थिती भी लोगों को आकर्षित करती है।

शहर मे डान बास्को एकाडेमी की स्थापना की गई है।

मैकलुस्की

पुरा नाम अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की (McCluskie) था। पेशे से मैकलुस्की कलकत्ता में एक संपत्ति डीलर था। वह शिकार के लिए इस क्षेत्र में कुछ गांवों का दौरा करता था और उसनें हरहु नामक स्थान पर एक अस्थायी मकान बनाया। उनके दोस्त पीपी साहिब रातू महाराजा संपत्ति के प्रबंधक के रूप में काम किया और यह पीपी, जो महाराजा को आश्वस्त कर मैकलुस्की के लिए भूमि पट्टे का इंतजाम करवाया। रातू महाराजा से पट्टे पर 10,000 एकड़ जमीन अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की को मिली। इस क्रम में 1933 में, मैकलुस्की ने कोलोनोईजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया लिमिटेड का गठन किया गया था और महाराजा के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय लिया गया कि एंग्लो भारतीयों नौ गांवों में उन गांवों के मूलवासियों के जमीनों और संपत्ति पर कब्जा नही करेगें और नदी, नालों, पहाडो़ पर एंग्लो भारतीयों का कोई हक नही होगा।
Colonisation सोसायटी Harhu, Duli, Ramdagga, Konka, Lapra, Hesalong, Mayapur, Mohulia और Baseria के गांवों में भूमि प्रसार के 10,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया। समाज के एक कंपनी के रूप में पंजीकृत किया गया था और एंग्लो भारतीयों को नई कॉलोनी में बसने की कामना के लिए शेयरों की बिक्री शुरू कर दिया.
इसकी शरुआत अच्छी तरह से शुरू हुआ। हजारों शेयर बिके और लगभग 350 परिवारों के बसने के लिए आया था। एंग्लो भारतीयों ने एक शहर के संस्थापना का सपना देखा था जो अपनी खुद की मातृभूमि कहला सके। यह एक स्वप्नलोक ही साबित हुआ, एक दूरदर्शी को सपना आया था कि कभी भी सच नहीं था।

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