मंगलवार, 15 अगस्त 2023

रवि अरोड़ा की नजर से......


बदशक्ल विभाजन रेखा /  रवि अरोड़ा



रुटीन ही कुछ ऐसा है कि दोपहर के लगभग एक बजे रोजाना उस सड़क से गुजरता हूं। कचहरी और जिला मुख्यालय निकट होने के कारण वह गाजियाबाद के व्यस्ततम क्षेत्रों में से एक है। राज नगर की इस प्रमुख सड़क के एक तरफ जाने माने मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट आईएमटी का गेट है और ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर इंग्राहम इंटर कॉलेज का मुख्य दरवाजा है। आईएमटी के छात्र छात्राओं का एक बजे शायद लंच ब्रेक होता है और ठीक इसी समय इंटर कॉलेज की भी छुट्टी होती है। यहां इंटर कॉलेज की दीवार से सटी कुछ दुकानें हैं, जहां खाने पीने की कई चीजें बिकती हैं । नतीजा इंटर कॉलेज के बच्चों और आईएमटी के वयस्क छात्र छात्राओं का एक बजे इन दुकानों पर रेला सा दिखाई देता है। मगर दोनों शिक्षण संस्थानों के बच्चों की दुकानें अलग अलग हैं। जिस दुकान पर छोले कुलचे, भटूरे और रायता जैसा कुछ मिलता है वहां इंटर कालेज के बच्चे दिखाई देते हैं जबकि जिस दुकान पर कोल्ड ड्रिंक, चाय, सिगरेट, बर्गर और पैटी-पेस्ट्री जैसा सामान मिलता है, वहां आईएमटी के लोग होते हैं। दोनो दुकानों में बामुश्किल दस गज की दूरी होगी मगर सामाजिक दृष्टि से यह दूरी सदियों की लगती है। 


इस इंटर कालेज की मासिक ट्यूशन फीस शायद पांच छः सौ रुपए होगी । जाहिर है कि इसके बच्चों की माली हालत भी इसी शिक्षा के लायक होगी। उनके माता पिता की सामाजिक आर्थिक स्थिति के बाबत भी सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। उधर आईएमटी की सालाना फीस दस पंद्रह लाख के करीब है। यहां पढ़ने आए युवा अवश्य ही बड़े बड़े अधिकारियों अथवा व्यवसायियों की संतान होंगे । आईएमटी के युवा कभी ऐसे सस्ते इंटर कालेज में नहीं पढ़े होंगे । उधर, इस इंटर कालेज के बच्चे भी कभी आईएमटी जैसे संस्थान से डिग्री नहीं ले सकेंगे। हालात से जन्मा अतीत और उसी से उपजने वाला भविष्य दोनों की सीमाएं निर्धारित करता है । दोनों तरह के छात्रों ने अपने अपने ठीये अघोषित रूप से तय कर रखे हैं। इंटर कालेज के बच्चे इसका नियमानुसार पालन करते हैं मगर आईएमटी के बच्चे अपनी मर्जी के मालिक हैं और वे मुंह का स्वाद बदलने को कभी कभी दूसरी ओर भी चले जाते हैं। दोनों दुकानों के ग्राहकों पर सामाजिक दबाव भी यकसा नहीं है। इंटर कालेज की छात्राएं तमाम कपड़ों से खुद को ढकती छुपाती वहां से गुजरती हैं जबकि आईएमटी की अधिकांश छात्राएं आधुनिक कपड़ों में लापरवाही से सिगरेट का धुआं उड़ाती नजर आती हैं। कुलचे छोले की दुकान पर इंटर कालेज के बच्चों के साथ वे लोग भी बड़ी संख्या में आ जुटते हैं जो कचहरी अथवा जिला मुख्यालय किसी काम से आए हुए होते हैं और दुकान पर भीड़ देख कर अपनी भूख शांत करने को इसे उपयुक्त स्थान मान लेते हैं। मगर आईएमटी के युवाओं की भीड़ वाली दुकान पर वे लोग भी नहीं जाते । फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते आधुनिक लड़के लड़कियों के बीच जाने का साहस ही शायद उन्हें नहीं होता । 


इस सड़क से गुजरते हुए लगभग रोज हिसाब लगाता हूं कि अब से दस बीस साल बाद ये दोनो तरह के बच्चे और युवा कहां होंगे। तमाम काबलियत के बावजूद इस इंटर कालेज के बच्चे शायद कहीं क्लर्क ही बनेंगे और आईएमटी वाला ही कोई उनका बॉस होगा । कई उस फैक्ट्री के कर्मचारी होंगे , जिसका मालिक कोई आईएमटियन होगा । हो सकता है कि अपवाद के तौर पर इक्का दुक्का मामलों में ऐसा न हो मगर आम तौर पर तो ऐसा ही होगा । लाख बकवास मैं और आप करें मगर मुल्क की नियति तो यही जान पड़ती है। अब बेशक इस गहरे सामाजिक आर्थिक विभाजन को रोज ही देखना पीड़ा दायक होता हो मगर मुल्क का ऐसा कौन सा शहर अथवा कस्बा है जहां ये बदशक्ल विभाजन रेखा रोजाना दिखाई न पड़ती हो । आपने भी तो देखी होंगी कई तह वाले हमारे समाज की ऐसी परतें ?

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