परसाई के लिए कोई जगह नहीं /रामस्वरूप दीक्षित

व्यंग्य-परसाई के लिए कोई जगह नहीं /रामस्वरूप दीक्षित 


हम तो परसाई जी को कभी पढते ही नहीं । उनकी जो किताबें थीं , उन्हें उन लोगों को दान कर दिया , जिनमें बिगड़ने की ललक थी।

बाद में पता भी चल गया कि वे पूरी तरह से बिगड़ चुके हैं।

और जिला प्रशासन और सत्ता दल के नेताओं की नाक में दम किये हुए हैं।

बहुत बार पुलिस से भी रूबरू हुए , मगर गनीमत रही कि उन्होने अपने बिगड़ने की असली वजह नहीं बताई ।

बरना आंच मुझ पर भी आना तय था।

परसाई को पढ़ते हैं तो हमें लगता  है कि हमें व्यंग्य लिखना छोड़कर किसी कीर्तन मंडली में भरती होकर मंजीरे बजाना चाहिए , पर चूंकि अपनी दुकान चल निकली है तो वापस होना भी सम्भव नहीं। 

परसाई जी को पढ़ते हैं तो हमारे हाथ पत्थर उठाने को लालायित होने लगते हैं , जो हमारे माला पहनाने वाले स्वभाव के विरुद्ध है।

कहते हैं कि आदमी को अपने स्वभाव के साथ ही रहना चाहिए , किसी दूसरे का स्वभाव उसे नहीं अपनाना चाहिए।

हम भी अपना स्वभाव छोड़ने वाले नहीं।

हमें नहीं लिखना परसाई जैसा ।

न सत्ता या व्यवस्था का विरोध करना है।

जब सरकार की तरफदारी करने पर भी व्यंग्यकार समझे जा रहे और खूब इनाम खिताब मिल रहे तो कोई बेवकूफ ही होगा जो , परसाई बनना  चाहेगा।

और हम कुछ भी और कैसे भी हों , पर इतने बेवकूफ तो नहीं ( थोड़ी बहुत बेवकूफी स्वास्थ्य के जरूरी है )

तो भइये जिनको अच्छा व्यंग्य लिखना हो वे ही परसाई के चक्कर में पड़ें न, हम तो पड़ने वाले नहीं ।

खराब लिखेंगे तो क्या नाम न होगा ? खूब होगा ।

और हमें नाम ही तो चाहिए । 

दूसरे हम तीखा व्यंग्य लिखकर किसी का दिल दुखाने के पक्ष में नहीं ।

इसलिए कोशिश भर ऐसा लिखते हैं कि हमारे व्यंग्य लेख में अच्छे अच्छे लोग व्यंग्य ढूंढते

ही रह जाते हैं ।

हमने सहजोर पर व्यंग्य लिखकर उससे पिटने के डर से कमजोर पर व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया है।

हम सत्ता के खिलाफ नहीं विपक्ष के खिलाफ व्यंग्य लिखते हैं कि वह सरकार की आलोचना करके देश को कमजोर कर रहा है।

हम टांग तोड़ने वालों पर नहीं, टांग टूटने वालों पर व्यंग्य लिखते हैं , कि देखो इनकी टांग ने खुद आत्महत्या कर ली और ये दूसरों पर झूठे आरोप लगा रहे हैं , कमीने कहीं के।

तो भइया हमारा एजेंडा एकदम साफ है , उसमें दुनिया भर के मसखरे , चुटकुलेबाज और भड़ैती करने वाले शामिल है , पर परसाई के लिए उसमें कोई जगह नहीं ।

जिसे जो समझना हो समझे , हमारी बला से। हम कतई सुधरने वाले नहीं ।

आखरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे।

आमीन। 


@ सिद्धबाबा कॉलोनी

     टीकमगढ़ 472001

     मो. 9981411097

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