सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

काश / दीपाली जैन ' ज़िया

प्रेम_दिवस  (14 फ़रवरी) पर लिखी गयी पहली कहानी 


#काश


आज बरसों बाद वो चेहरा देखा , वही आँखें, वही बाल, वही दिलकश मुस्कुराहट , पल भर को तो यकीन ही नहीं हुआ कि ये सच है या सपना।फिर उस नाम पर tap किया और  wall पर जाकर देखा तो पैरों तले से ज़मीन सरक गयी थी।

इधर उधर कुछ ढूँढने लगी, कभी तस्वीरें तो कभी profile , अचानक खटखटाने की आवाज़ आयी, झाँक कर देखा तो दरवाज़े पर कोई नहीं था, मैं दोबारा facebook पर व्यस्त हो गयी तभी फिर से दस्तक हुई, यहाँ वहाँ देखा तो पाया कि आवाज़ दिल से आ रही थी " कहाँ ढूंढ रही हो, मैं तो यहीं हूँ,  पिछले बीस सालों से , तुमने ही सारी खिड़कियाँ बन्द कर दी थीं, सारे दरवाज़ों पर ताले लगादिये थे"।

इसी आवाज़ के साथ मैं खो गयी अतीत के पन्नों में, जहाँ चित्रांकित थी एक अल्हड़ सी लड़की, १६-१७ साल की नाज़ुक उम्र के दौर से गुज़रती हुई।

जब पहली बार उसे देखा था, एक भीड़ भरे माहौल में और ज़हन में  बस गया था वो चेहरा , वो नाम और वो अन्दाज़।

वो वक्त जब हर सहेली सपने देखती थी शाहरुख खान के, बातें करती थी उसकी अदाओं की,  तब मैं चुपचाप आँखें मूँद कर उस चेहरे में खो जाया करती थी। 

वक्त गुज़रा , उम्रका वो दौरभी गुज़र गया पर मैंबड़ी होती रही अपने सपने के साथ ।

फिर वो वक्त आया जब मुझे ये अहसास हुआ कि मैं एक काल्पनिक दुनिया में जी रही हूँ , सिर्फ एक नाम और बरसों पुराने चेहरे के सहारे कैसेढूँढ पाऊंगी उसे और अगर ढूंढ भी लिया तो हालतों की इतनी सारी सीढ़ियाँ पार कैसे कर पाऊंगी ।

 दबा दिया दिल की सारी भावनाओं को अंतस में कहीं बहुत गहराई तक , ढ़क दिया हज़ारों परदों से , और शुरुआत की एक नये जीवन की।

पर आज अचानक एक facebook post ने उस दबी ढकी  किताब के पन्नों पर जमा धूल को उड़ा दिया और दिल में एक हूक सी उठा दी, 

 आज भी आँखों में बसा है  वही चेहरा , वही आँखें, वही बाल, वही दिलकश मुस्कुराहट

और अब दिल से बस एक ही सदा आती. है, इतना  मुश्किल भी नहीं था 

काश एक बार  कोशिश की होती।


दीपाली जैन ' ज़िया'

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