सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

सियासत, साहित्य और सिनेमा में गधे का दखल/ आलोक यात्री

  खटराग / आलोक यात्री 

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  चार्ल्स डार्विन ने बंदर को हमारा पूर्वज बताया है। लेकिन एक रामायण को छोड़ कर किसी अन्य ग्रंथ या साहित्य में बंदर का मानव से उतना सामंजस्य देखने को नहीं मिलता जितना गधे का देखने को मिलता है। आज बैठे बिठाए गधे का तसव्वुर दिमाग में ‌न जाने कहां से आ गया? कामगारों की दुनिया में गधे को बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता है। उसकी संज्ञा निकृष्ट कोटि के प्राणियों के तौर पर देखने को मिलती है। तुच्छता के स्तर पर तुलना करने ‌के लिए इससे बेहतर उदाहरण दूसरा कोई देखने में नहीं आता। यूं तो गधा पूरी दुनिया में विचरण करता है लेकिन इतिहास में इसके दो ही स्वामी दर्ज हैं। एक धोबी और दूसरा कुम्हार। वैसे यह ऐसा जीव है जो प्रतीक स्वरूप दुनिया के लगभग हर घर, स्कूल, सरकारी व निजी दफ्तर में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। डिक्शनरी हिंदी की हो या अंग्रेजी की इसके पर्यायवाची नामों से भरी पड़ी है। मसलन गधा, खर, खच्चर, गर्दभ, टट्टू, डौंकी, पौनी और न जाने क्या-क्या...?

   वेद-पुराणों में भी गधे का उल्लेख मिलता है।ऋग्वेद के ३:५३:२३ तथा ऐतरेय ब्राह्मण-४:९ तैत्तिरीय संहिता-५:१:२:१ में इसका उल्लेख बताया जाता है। ऐसा ऐसा प्रतीत होता है कि गधा भी बेचारा कालसर्प से पीड़ित है। जिसकी कुंडली में कालसर्प दोष होता है, वह व्यक्ति भी जीवन भर गधे की तरह अथाह मेहनत करके भी कुछ भी हासिल नहीं कर पाता है।

  गधे के व्यापक पालतू और उपयोग के कारण, दुनिया भर में मिथक और लोककथाओं में गधे का उल्लेख मिलता है। शास्त्रीय और प्राचीन संस्कृतियों में गधों की भागीदारी थी। मिस्र में गधा सूर्य देवता 'रा' का प्रतीक था। बाइबिल में गधों का कई बार उल्लेख किया गया है। जो पहली किताब से शुरू होता है और पुराने और नए नियम दोनों के माध्यम से जारी रहता है। इसलिए गधा वहां जूदेव-ईसाई परंपरा का हिस्सा बन गया। 


  भारतीय पुराण कहते हैं कि अंतिम समय में गऊ माता की पूंछ पकड़ने से भवसागर पार हो जाता है। लेकिन भारतीय साहित्य सहित दुनिया के किसी भी शास्त्र में इस मान्यता का प्रमाण नहीं ‌मिलता। जबकि एक शब्द "पौनी टेल" ऐसा है जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। हमारे बचपन में अक्सर मां, बहन, बुआ, चाची, मामी बच्चियों से बड़े दुलार से कहती थीं 'आ तेरी पोनी टेल बना दूं...'।

  थोड़े बड़े हुए ‌तो लंदन से आए पिताश्री के मित्र श्रीराम विद्यार्थी अंग्रेजी का एक बाल उपन्यास 'ब्लैक ब्यूटी' ले आए। अब साहित्य में गधे के योगदान विषय पर शोध करने बैठा तो पता चला कि इस उपन्यास की रचना ब्रिटिश लेखिका आन्ना सेवेल ने की थी। 1877 में प्रकाशित इस उपन्यास को लिखने में उन्हें छह साल लंबा अर्सा लगा। सोचिए करीब डेढ़ सौ साल पहले कोई व्यक्ति गधे की किसी प्रजाति की कल्पना के साथ छह साल व्यतीत कर दे। उपन्यास का कथानक तो मुझे याद नहीं लेकिन हां कथा के केंद्र ‌में एक पौनी (गधे का बच्चा) था। यह पुस्तक ब्लैक ब्यूटी नाम के पौनी द्वारा आत्मकथात्मक संस्मरण के साथ शुरू होती है। आज यह पुस्तक विश्व के दस सर्वश्रेष्ठ बाल उपन्यासों में शामिल है। पाठकों को जानकर आश्चर्य होगा कि इस नन्हे पौनी ने लेखिका को आज के हिसाब से डेढ़ सौ साल पहले लगभग साढ़े तीन लाख रुपए का पारिश्रमिक दिलवाया था। 

  गधे की महिमा यहीं खत्म नहीं होती।‌ हिन्दी के प्रख्यात लेखक कृशन चंदर ने तो गधे को केंद्र में रखकर 'एक गधे की आत्मकथा', 'गधे‌ की वापसी' और 'गधा नेफा में' शीर्षक से तीन उपन्यास ही लिख मारे। जो दुनिया भर में काफी चर्चित हुए। 'एक गधे की‌ आत्मकथा' व्यंग्य उपन्यास है। जिसके माध्यम से कृशन चंदर सन 1950-60 के भारत के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, जातिवाद व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर एक गधे के माध्यम से कटाक्ष करते हैं। जो मौजूदा दौर में भी उतने ही सटीक नजर आते हैं। उपन्यास की पटकथा गधे की नज़रों और शब्दों से देखने और सुनने को मिलती है।  उपन्यास का नायक गधा जो विभिन्न भाषाएं बोलता और समझता है, वह समाज के दोनों वर्ग ‘समझदार’ (पढ़े-लिखे और सभ्य, भाषा और संस्कृति का ज्ञान रखने वाले) 'मूर्ख' (अशिक्षित, असभ्य और अज्ञानी) समझे जाने वाले मनुष्यों का प्रतीक है। गधा कहलाने वाला जानवर दरअसल हम मनुष्यों से कितना अलग, बेहतर और समझदार है यह उपन्यास के विभिन्न हिस्सों, घटनाओं और संवादों में समय-समय पर प्रकट होता है। अन्य किसी भी जानवर को छोड़कर गधे को नायक के रूप में चुनकर कृशन चंदर ने बड़े ही साहस का काम किया है। गधा (नायक) नायक लिबास में जिस तरह से मनुष्यों के दोगले व्यवहार, कटुता, पक्षपात को दर्शाता है वह पढ़ना बहुत ही रोचक है। कृशन चंदर ने बहुत ही सरल और सीधे तरीके से अपनी बात कहकर समाज के हर वर्ग से जुड़े व्यक्ति और व्यवहार पर चुटकी ली है। पूरा उपन्यास पढ़कर भी पाठक इसी पाशोपेश में रहता ही कि यह आदमी के रूप में गधा है या गधे के रूप में आदमी? 

  उपन्यास की एक पंक्ति 'एक मुसलमान या हिन्दू गधा हो सकता है लेकिन एक गधा हिंदू या मुसलमान नहीं हो सकता' इस उपन्यास के मर्म को समझने के लिए पर्याप्त है। कहानी के केंद्र में एक गधा है। जो हिन्दू मुस्लिम दंगो से बचकर दिल्ली पहुंच जाता है। रामू धोबी उसे अपने खूंटे से बांध लेता है। रामू के पास रह कर वह कई अनुभव पाता है। जिसमें कई जगह वह पाता है कि लाखों मनुष्यों की जिंदगी गधे से भी तुच्छ है। एक दिन मगरमच्छ रामू की टांग खींच लेता है जिससे उसकी मौत हो जाती है। अपने मालिक के मर जाने के बाद उसके बीवी बच्चों को मुआवजा दिलवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता है। ठीक वैसे ही जैसे आम नागरिक अपने छोटे छोटे कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते है। 'एक गधे

गधे की आत्मकथा में आम नागरिक द्वारा किया जाने वाला संघर्ष है। 

  गधे को लेकर लिखे गए‌ व्यंग्यों की फेहरिस्त काफी लंबी है। लेकिन सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने गधे को केंद्र में रखकर एक बेहतरीन नाटक 'एक था गधा उर्फ अलादाद खां' रच डाला। नाटक में दर्शाया गया है कि राजनैतिक दल अपने स्वार्थ की खातिर सामान्य जनता को कैसे मूर्ख बनाएk रखते हैं? इसी राजनीतिक परिवेश के कारण देश में घट रही मूल्यहन्ता त्रासदी को दर्शाना ही इस नाटक का मुख्य उद्देश्य है। यह नाटक शरद जोशी जी ने उस समय लिखा था, जब देश में आपातकाल के कारण आम जनता शोषित थी। इस नाटक को उसी सच्चाई का दर्पण माना जा सकता है।

  नाटक में दर्शाया गया है कि विरासत में मिली सियासत व नवाबी में कुछ लोग नेतृत्व में सक्षम न होने के बावजूद ऐसे फैसले लेते रहते हैं जो कि आवाम के लिए सही नहीं होते। नाटक में कई पात्र हैं। लेकिन मुख्य पात्र नवाब साहब व कोतवाल हैं। दोनों ही राजनैतिक व प्रशासनिक शक्ति के प्रतीक हैं। अलादाद खां जनसाधारण का प्रतीक है। जो दुखी है, परेशान है, जिनकी कोई नहीं सुनता। नवाब साहब जिनके पूर्वज भी नवाब थे, एक नाकामयाब सियासतदान व लोगों का भला करने में सक्षम नहीं होने के बावजूद विरासत में मिली नवाबशाही के ऐसे-ऐसे फरमान जारी करते थे, जिन्हें मानना लोगों की मजबूरी थी। नवाब साहब चाहते हैं कि हर तरफ उन्हीं के जयकारे गूंजे और जनता में केवल उन्हीं की चर्चा हो। 

  एक दिन कोतवाल नवाब साहब के पास देर से पहुंचता है। नवाब साहब उससे देरी से आने की वजह पूछते हैं। कोतवाल झूठ बोलते हुए कहता है कि अलादाद खां मर गया। वह तो उसके परिवार को दिलासा देने गया था। नवाब साहब उससे पूछते हैं कि इस मामले में उन्हें क्या करना चाहिए? जिससे उनकी भी वाहवाही हो सके। कोतवाल सुझाव देता है कि नवाब साहब शवयात्रा में अलादाद की अर्थी को कंधा दे दें। जिससे नवाब साहब की शोहरत पूरे इलाके में फैला जाएगी। नवाब साहब अलादाद की शवयात्रा को कंधा देने की सार्वजनिक घोषणा करने के साथ-साथ कई और इंतजामात भी करते हैं। शव यात्रा का आंखों देखा हाल टेलीविजन पर प्रसारित करने की तैयारी भी पूरी हो जाती है। 

  इसी बीच पता चलता है कि अलादाद खां नाम का कोई आदमी नहीं मरा बल्कि अलादाद एक धोबी के गधे का नाम है। नवाब साहब परेशान हो उठते हैं। नवाब साहब सोचते हैं कि एक गधे के जनाजे को कंधा कैसे दें? क्योंकि वह खुद ही इलाके में इसकी चर्चा कर चुके थे। वह सोचते हैं कि सारी तैयारियां हो गईं, प्रचार भी हो गया, लेकिन जनाजा किसका निकाला जाए? 

  वह कोतवाल को बुलाते हैं। जिसने यह खबर दी थी कि अलादाद खां मर गया। कोतवाल अपनी जान बचाने की जुगत में ‌लग जाता है।

इसी दौरान उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से होती है। जिसका नाम अलादाद खां है। नवाब साहब की इज्जत बचाने के लिए अलादाद नाम के व्यक्ति का कत्ल करवा दिया जाता है और नवाब साहब जाकर उसकी शवयात्रा में कंधा देते हैं। नाटक में दर्शाया गया है कि विरासत में सियासत के बावजूद कुछ लोग जोकि लोगों का भला करने में सक्षम नहीं है। मात्र अपने स्वार्थ व वाहवाही के लिए गलत कदम उठाते हैं। जोकि समाज के लिए घातक साबित होते हैं। 

  तो... कौन कहता है कि गधा किसी नायक से कम है। भारतीय सिनेमा में भी गधे ने झंडे गाडे़ हैं। 1967 में एक फिल्म आई थी 'मेहरबान'। सुनील दत्त और नूतन अभिनित इस फिल्म का बचपन में सुना एक गाना भी जेहन में खरदौड़ कर रहा है। जिसके बोल थे 'मेरा गधा गधों का लीडर...।' मेरे ख्याल से इस गीत का आज के या तब के राजनैतिक दौर से कोई लेना-देना नहीं है। तो... अब गीत के बोल पर आते हैं-

'मेरा गधा गधों का लीडर, कहता है के दिल्ली जाकर

सब मांगे अपनी कौम की मैं, मनवा कर आऊंगा

नहीं तो घास न खाऊंगा, मेरा गधा गधों का लीडर...

सबसे पहली मांग हमारी, धोबी राज़ हटा दो

अब न सहेंगे डंडा चाहे, फांसी पर लटका दो

अगर न मानी सरकार, किया इंकार तो यूएनओ तक जाऊंगा

नहीं तो घास न खाऊंगा...

दूजी मांग के जात हमारी, मेहनत करने वाली

फिर क्यों यह इंसान, गधे का नाम समझते गाली

न बदला यह दस्तूर, तो हो मजबूर,

मैं इन पर केस चलाऊंगा, नहीं तो घास न खाऊंगा...

तीजी मांग हमारी,  हमको दे दो एक एक क्वार्टर

हफ्ते में एक बार घास के बदले मिले टमाटर

अगर कर दो यह एहसान, ओ मेरी जान, दुआएं देता जाउंगा

कभी न दिल्ली जाऊंगा, मेरा गधा गधों का लीडर...'

  कहना न होगा कि यह गीत अपने समय के श्रेष्ठ हास्य अभिनेता महमूद पर फिल्माया गया था। जिसने कई साल रेडियो पर धूम मचाए रखी। इस गीत के बारे में एक रोचक ‌तथ्य यह भी है कि सत्तर से नब्बे के दशक में देश में चुनाव के दौरान इस गीत के प्रसारण पर‌ पाबंदी लगा दी जाती थी। जबकि गीत के बोल‌ ऐसे नहीं हैं जो राजनीति पर सीधे- सीधे ‌प्रहार करते हों।

  बात गीत की निकली ही है तो यह जानना भी रोचक है कि संगीत के क्षेत्र में भी गधे का बड़ा सम्मान है। गधे के सम्मान में संगीतज्ञों ने 'गर्दभ राग' की रचना कर डाली। वैसे अपनी अब तक की जिंदगी में मैंने गर्दभ राग सुना नहीं है लेकिन हिंदी अदब में इस राग का उल्लेख कई जगह हुआ है।

  मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि हमारे सभ्य समाज ने गधे की महिमा और क्षमता को कम कर आंका है। मेरा मानना है कि धरती के इस सर्वश्रेष्ठ जीव जिसकी महिमा के वृतांत से हिंदी साहित्य और फिल्में ही नहीं विदेशी‌ साहित्य भी भरा पड़ा‌ है, का आकलन नए सिरे से किया जाना आवश्यक है।

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