🙏 आज 'अपने प्रिय कवि' स्तंभ में उस प्रगतिशील लेखक की बात करेंगे जो आधुनिक हिंदी कविता के कमल हैं। जी हां ,आज बात अरुण कमल की। अरूण कमल का वास्तविक नाम 'अरुण कुमार' है। साहित्यिक लेखन के लिए उन्होंने 'अरुण कमल' नाम अपनाया और आज वे इसी नाम से साहित्य जगत में जाने जातें हैं।उनका जन्म 15 फरवरी 1954 ई० को बिहार के रोहतास जिले के नासरीगंज में हुआ । वे पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक रहे हैं।
अरूण कमल निर्विवाद रूप से समकालीन हिन्दी साहित्य की एक प्रखर प्रगतिशील विचारधारा संपन्न कवि हैं, जिनकी कविताएं सहज भाषा विन्यास में रचित होते हुए भी आधुनिक जीवन और राजनीति की जटिलताओं की गहरी पड़ताल करती है।
साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त इस कवि ने जीवन और कविता के बीच के सामिप्य को अविश्वसनीय रूप से बढ़ाया है। वह जीवन को जैसे जीतें है कविता को उसी सांचे में ढाल देते हैं। उन्होंने कविता के अतिरिक्त आलोचनाएं भी लिखी हैं, अनुवाद कार्य भी किये हैं तथा लंबे समय तक वाम विचारधारा को फ़ैलाने वाली साहित्यिक पत्रिका आलोचना का संपादन भी किया है।
अरुण कमल साठोत्तरी लेखन का अराजक दौर चुक जाने के बाद सक्रिय प्रमुख कवियों में से एक हैं।
उनकी पहली पुस्तक 'अपनी केवल धार' ने उन्हें समकालीन दौर के एक महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में स्थापित कर दिया था और इस पुस्तक की 'धार' शीर्षक कविता की पंक्ति हर पाठक की जुबान पर अंकित हो गया था।
सामान्य जन के सर्वहारा होते जाने के बावजूद उनमें निहित आंतरिक शक्ति तथा परिवर्तन की संभावना का सहज कलात्मक परिचय देने वाली यह कविता पुस्तक अत्यधिक लोकप्रिय हुई। सन् 1989 में उनका दूसरा संग्रह 'सबूत' प्रकाशित हुआ और 1996 में तीसरा संग्रह 'नये इलाके में' जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उन्होंने कविता के लेखन के साथ साथ अनुवाद भी किया है।
वियतनामी कवि 'तो हू' की कविताओं-टिप्पणियों की एक अनुवाद पुस्तिका, मायकोव्स्की की आत्मकथा का अनुवाद तथा अंग्रेजी में 'वॉयसेज़' नाम से भारतीय युवा कविता के अनुवादों की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। किपलिंग की जंगल बुक का अनुवाद भी उन्होंने किया है। इसके अतिरिक्त देश एवं विदेश के अनेक साहित्यकारों की कविताओं तथा लेखों के हिंदी अनुवाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। वे प्रभात खबर (राँची) में हर पखवाड़े 'अनुस्वार' नामक एक अनुवाद-स्तंभ लिखते रहे हैं। बीच में उन्होंने नवभारत टाइम्स (पटना) के लिए 'जन-गण-मन' स्तंभ में सामयिक टिप्पणियाँ भी लिखीं तथा इंटरनेट पत्रिका 'लिटरेट वर्ल्ड' के लिए भी स्तंभ-लेखन किया।
कविता-
अपनी केवल धार 1980
सबूत 1989
नये इलाके में 1996
पुतली में संसार 2004
मैं वो शंख महाशंख
आलोचना-
कविता और समय 2002
गोलमेज 2009
साक्षात्कार-
कथोपकथन 2009
अरूण कमल अफ्रोएशियाई युवा लेखक सम्मेलन, ब्राजाविले, कांगो में भारत के प्रतिभागी रहे। रूस, चीन तथा इंग्लैंड की साहित्यिक यात्राएँ कीं। वे साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद् एवं सलाहकार समिति के सदस्य तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की कार्यसमिति के सदस्य भी रहे। लंबे समय तक हिंदी साहित्यिक माफिया रहे नामवर सिंह के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका 'आलोचना' के संपादन का दायित्व भी सँभाला। 'आलोचना' के सहस्राब्दी अंक 21 (अप्रैल-जून, 2005) से 51 (अक्टूबर-दिसम्बर 2013) तक का संपादन उन्होंने किया। इस अवधि में इस पत्रिका के अंक 28 के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित तथा अंक 40 से 43 के रूप में शमशेर, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल एवं नागार्जुन पर केंद्रित महत्त्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित हुए।
सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार 1989
श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार 1990
रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार 1996
शमशेर सम्मान 1997
साहित्य अकादमी पुरस्कार 1998 ('नये इलाके में' के लिए)
अरूण कमल की कविताएं:-
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संविधान का अंतिम संशोधन
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संसद के संयुक्त अधिवेशन ने ध्वनि मत से
संविधान का अन्तिम संशोधन पारित कर दिया
जिसके अनुसार अब से किसी भी सिक्के में
एक ही पहलू होगा
इस प्रकार सहस्रों वर्षों से चला आ रहा
अन्याय समाप्त हुआ ।
उर्वर प्रदेश
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मैं जब लौटा तो देखा
पोटली में बँधे हुए बूँटों ने
फेंके हैं अंकूर
दो दिनों के बाद आज लौटा हूँ वापस
अजीब गन्ध है घर में
किताबों कपड़ों और निर्जन हवा की
फेंटी हुई गन्ध
पड़ी है चारों ओर धूल की एक पर्त
और जकड़ा है जग में बासी जल
जीवन की कितनी यात्राएँ करता रहा यह निर्जन मकान
मेरे साथ
तट की तरह स्थिर, पर गतियों से भरा
सहता जल का समस्त कोलाहल--
सूख गए हैं नीम के दातौन
और पोटली में बँधे हुए बूँटों ने फेंके हैं अंकुर
निर्जन घर में जीवन की जड़ों को
पोसते रहे हैं ये अंकुर
खोलता हूँ खिड़की
और चारों ओर से दौड़ती है हवा
मानो इसी इन्तजार में खड़ी थी पल्लों से सट के
पूरे घर को जल भरी तसली-सा हिलाती
मुझसे बाहर मुझसे अनजान
जारी है जीवन की यात्रा अनवरत
बदल रहा है संसार
आज मैं लौटा हूँ अपने घर
दो दिनों के बाद आज घूमती पृथ्वी के अक्ष पर
फैला है सामने निर्जन प्रान्त का उर्वर-प्रदेश
सामने है पोखर अपनी छाती पर
जलकुम्भियों का घना संसार भरे।
अपनी केवल धार
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कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने
यह कमीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सरदी लू में
सब उधार का, माँगा चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक
सब कर्जे का
यह शरीर भी उनका बंधक
अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार ।
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