शनिवार, 9 मई 2020

सुबह को आंखों में जगाये रखना / सुरेन्द्र सिंघल




अभी तो रात की स्याही को और बढ़ना है
 और भी वहशी अभी होगा सिरफिरा साया
रगों में और अभी दौड़ न पायेगा लहू
रगों में और अभी जमता चला जाएगा खौफ
अभी तो गाड  खुदा ईश्वर भी खुद डर कर
मंदिरों मस्जिदों गिरजों में ही रहेंगे बंद
रहेंगे बैठे ख़ज़ानों पे कुंडली मारे
अभी तो मजहबी उत्पात मचायेंगे और
अभी तो और जमातें निकल के आयेंगी
सिर्फ तबलीगी नहीं श्रद्धालु भी नहीं पीछे
 अभी तो भूख भी सड़कों पे करेगी तांडव
अभी बदन का पसीना भी होगा बेइज्जत
अभी जो घर से हैं बाहर घरों को तरसेंगे
 अभी जो घर में हैं उन पे भी घर की दीवारें
तंग होती ही चली जाएंगीं
सांस लेने को छटपटाएंगे वे
अभी तो ख़्वाब भी आंखों में तोड़ देंगे दम
अभी तो और लगाएंगी घात छिपकलियाँ
अभी तो और नहाएगा रक्त में बिस्तर
भूमिगत हैं जो अभी तक निकल के आएंगे
और तिलचट्टे रेंगने तन पर
और तिलचट्टे रेंगने मन पर
 अभी से कांप उठे सिर्फ शुरुआत है ये
अभी अंधेरे के उस पार भी अंधेरा है
अभी तो लंबी लड़ाई है सबको लड़नी है
और इसके लिए तैयार करना है खुद को
अभी है दूर बहुत दूर बहुत दूर सुबह अभी सुबह की तरफ लालसा से मत देखो
टूट जाओगे चांद हंस देगा
हाँ मगर सुबह को आंखों में जगाये रखना

              सुरेंद्र सिंघल

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