शनिवार, 17 दिसंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 


डंडी मारने का राष्ट्रीय धर्म  /  रवि अरोड़ा



मेरी एक मित्र मंडली अक्सर वृन्दावन जाती है । कभी कभार मैं भी साथ हो लेता हूं।  ग्रेटर नोएडा पार करके एक्सप्रेस वे पर चढ़ने से पूर्व मित्र अक्सर आइस क्रीम खाते हैं। इस जगह लाइन लगा कर दर्जन भर आइस क्रीम की आधुनिक ठेलियां खड़ी होती हैं। हम लोग आइस क्रीम लेते समय ठेली चालक से यूं ही ठिठौली कर रहे थे जब उसने बताया कि अक्सर ऐसे ग्राहक भी आते हैं जो आइसक्रीम लेकर बिना पैसे दिए रफूचक्कर हो जाते हैं। यह काम केवल कार सवार ही करते हैं। हमसे कुछ समय पहले ही एक कार सवार उससे तीन सौ रुपयों की आइसक्रीम लेकर बिना पैसे दिए अपनी कार भगा ले गया था । सुन कर बड़ी हैरानी हुई कि खाते पीते घर के लोग भी ऐसी हरकतें करते हैं ? हमने जब अपनी आइसक्रीम के दाम पूछे तो उसने उसकी कीमत अनुमान से अधिक बताई। एक मित्र ने जब आइसक्रीम के रैपर पर उसके खुदरा मूल्य की जांच की तो पता चला कि दुकानदार हमें पचास रुपए अधिक बता रहा है। इस और जब उसका ध्यान दिलाया तो उसने अपना टोटल दोबारा जांचा और फिर खुद को दुरुस्त करते हुए खुदरा मूल्य के अनुरूप ही हमसे सही सही पैसे लिए । हो सकता है कि उसने ऐसा जान बूझ कर न किया हो मगर मन में आशंका हुई कि अपने तीन सौ रुपए के नुकसान की भरपाई क्या अब वह हम जैसों से करेगा ? 


वृंदावन पहुंच कर मंदिर के लिए ई रिक्शा ली और उसकी महिला चालक से साठ रुपए तय किए मगर गंतव्य पर पहुंच कर चालक ने हमसे सौ रुपए वसूले । पूछने पर उसने कहा कि मैंने तो सौ रुपए ही बताए थे , शायद आपने सुना नहीं। समझ नहीं आया कि यह माजरा क्या है? जिसका जहां दांव लग रहा है वही सामने वाले को ठग रहा है ? क्या अब बेइमानी को पूरी तरह चालाकी ही समझा जाने लगा है ? सामने वाले पर विश्वास कर लेना अब मूर्खता की श्रेणी में रखा जाने लगा है क्या ? बेशक युगों से ऐसा होता आ रहा है मगर क्या अब ऐसी चतुराई बढ़ती नहीं जा रही ? कोई भी अपनी नजरों में बेवकूफ साबित नहीं होना चाहता और एक जगह नुकसान खाकर उसका बदला किसी दूसरे से लेने लगता है और फिर खुद को स्ट्रीट स्मार्ट समझता है । अमीर आदमी का तो जमाने से यही विनिंग फार्मूला है मगर देखा देखी अब गरीब और मेहनत कश वर्ग भी न जाने क्यों इसी दिशा में चल पड़ा है। 


हो सकता है कि मेरे द्वारा गिनाई गई घटनाएं आपको मामूली लगें और आप कहें कि बड़े बड़े घोटाले करने वालों को छोड़ कर गरीब आदमी की छोटी मोटी हेराफेरी के पीछे मैं क्यों पड़ गया ? मगर क्या ऐसा नहीं है कि जिसको जितना मौका मिलता है, वह उससे चूकता नहीं है ? बड़ा आदमी बड़ी ठगी कर रहा है और छोटा आदमी छोटी। ऊपर से नीचे तक डंडी मारना ही हो गया है हमारा राष्ट्रीय चरित्र , हमारा राष्ट्रीय धर्म । मेरी बात पर विश्वास न हो तो किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लीजिए। हम सबके साथ लगभग रोज ही ऐसा नहीं होता क्या ? सामने वाले की जेब से पैसे निकाल लेने को ही अब असली सफलता माना जाने लगा है। सही गलत के बाबत न कोई पूछता है और न ही अब इसका संज्ञान लिया जाता है। ईमानदारी अभिशाप होती जा रही है और बेईमानी कला । इसमें कोई संदेह नहीं कि देश की बड़ी आबादी अभी भी इस कीचड़ से दूर है मगर मुझे चिंता तो इस बात की है कि धीरे धीरे तराजू का पलड़ा अब बेईमानी की और झुकता दिखाई पड़ रहा है ।


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