बुधवार, 14 दिसंबर 2022

अँजुरी_भर_अंगारा / प्रवीण परिमल

 गीत :  

 #अँजुरी_भर_अंगारा / प्रवीण परिमल 


यदि तुमने कुछ दिया मुझे, तो 

अँजुरी भर अंगारा! 


पीर हुई पर्वत- सी दिल की 

उर में उठे फफोले, 

मिले नेह के बदले तुमसे 

सिर्फ दहकते शोले। 

अमृत- सा जीवन- जल मेरा 

किया तुम्हीं ने खारा! 


सहज भाव से कभी न तुमने 

निर्मित किया घरौंदा, 

मेरे स्वप्निल ताजमहल को 

फिर भी तुमने रौंदा 

अपना तन- मन- धन तिस पर भी 

मैंने तुम पर वारा। 


लाँघ गई लक्ष्मण- रेखा, पर 

हुई नहीं तुम सीता, 

अपने मन से रही कुतरती 

रामायण औ' गीता। 

रही तुम्हारे लिए शिला बस, 

गिरजा या गुरुद्वारा!


कौन तुम्हें समझाए, क्योंकर 

गीत हुए दर्दीले, 

तृप्ति- द्वार पर पड़े- पड़े क्यों 

सूखे अक्षत पीले! 

घनी दुपहरी में ही तुमने 

फैलाया अँधियारा! 


बूँद- बूँद कर रहा पिघलता 

घटता गया हिमालय, 

द्रवित नहीं पर हुआ तुम्हारे 

अंतः का देवालय। 

भाग्य- पटल पर लिखा नियति का 

लेख न तनिक सँवारा।

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