रविवार, 2 अक्तूबर 2022

कैफ़ी आज़मी के संग जीवन की यादों का रोचक दास्ताँ

 याद की रहगुज़र : शौकत कैफ़ी

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चर्चित अभिनेत्री और रंगकर्मी शौकत कैफ़ी का नाम जितना उनके अभिनय के लिए जाना जाता है उससे कहीं अधिक कैफ़ी आज़मी के साथ उनके दाम्पत्य और जीवन संघर्ष के लिए जाना जाता है। कैफ़ी आज़मी की एक चर्चित नज़्म है 'औरत' जिसकी पंक्ति "उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे" से शौकत जी का ही अक्स उभरता है,यद्यपि  कैफ़ी ने यह नज़्म उनसे मिलने से पहले लिखी थी।


'याद की रहगुज़र' एक तरह से उनकी संक्षिप्त आत्मकथा है जो उन्होंने कैफ़ी के निधन के बाद लिखी थी।इसमे उन्होंने अपने बचपन की ज़िंदगी हैदराबाद से लेकर कैफ़ी आज़मी से सम्पर्क, विवाह,बम्बई,लखनऊ,मिजवाँ के उनके जीवन विवरण दिया है। साथ ही अपने रंगकर्म, फिल्में,कैफ़ी की फिल्में,सफलता-असफलता,शबाना और बाबा आज़मी के बचपन और जीवन के बारे में भी विवरण दिया है।


इस तरह किताब में शौकत जी से जुड़े जीवन के कई रंग हैं, मगर इन सब में उन्हीं के शब्दों में "लेकिन मेरी ज़िंदगी मे जो रंग सबसे गहरा है वह कैफ़ी का रंग है और वह इस किताब में जगह-जगह बिखरा हुआ है।" सचमुच इस किताब में हर जगह कैफ़ी मौजूद हैं।दाम्पत्य का ऐसा उदात्त उदाहरण सफल कहे जाने वाले लोगो में इधर विरल हो चुका है।बरबस रामविलास शर्मा और भीष्म साहनी जैसों का दाम्पत्य ध्यान में आता है।


ऐसा नहीं कि शौकत जी की कैफ़ी से पृथक कोई अस्मिता नहीं।वह उनके अपने कामों से है।उन्होंने लिखा भी है उनके सम्बन्ध दोस्त की तरह रहे।उन्हें जो उचित लगा वह काम किया।मुख्य बाद एक दूसरे के सम्मान की होती है,जो उनमें रही है।


शौकत जी के पिता आधुनिक सोच के थे। उस दौर में भी उनके घर पर्दा प्रथा नहीं थी और उन्होंने अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा की सुविधा दी।


मगर आजादी से पूर्व हैदराबाद का एक अलग रंग था। निज़ामशाही के अत्याचार से जनता पिस रही थी। दलितों,ग़रीबों से निर्ममता से बेगार कराया जाता था। सामन्तों के साहिबजादे अय्याश और आवारा थे और लड़कियों को उठा कर तक ले जाते थे। शौकत जी ने ठीक ही लिखा है "शायद उसी ज़ुल्म के ख़िलाफ़ तिलंगाना मूवमेंट ने जन्म लिया था"


शौकत जी ने कैफ़ी से अपनी पहली मुलाकात से लेकर उनसे प्रेम,प्रेम का परवान से लेकर विवाह तक की घटनाओं का रोचक वर्णन किया है जो किसी भी 'फ़िल्मी' रोमांस से कमतर नहीं है। इसमे  अदा है,प्रेम की तड़प है फिर मिलन है।


कैफ़ी आज़मी उन दिनों बम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर मेम्बर थे और पार्टी कम्यून में रहते थे। दोनो का विवाह भी पार्टी कार्यालय में हुआ और वे अंधेरी के पार्टी कम्यून में रहने लगे।विवाह हो गया मगर जीवन की राह आसान न थी। आर्थिक दिक्कतें सबसे बड़ी थी।फ़िल्म 'हकीकत' के पहले तक कैफ़ी आज़मी 'सफल' गीतकार नहीं हो सके थे।पहले संयोग यह होता रहा कि उनके गीत तो हिट होते मगर फ़िल्म असफल हो जाती थी।इस दौरान उनका ठिकाना मुम्बई,मिजवाँ, हैदराबाद,लखनऊ में घूमता रहा।


शौकत जी ने घर आर्थिक स्थिति में सहयोग के लिए 1951 से पृथ्वीराज कपूर की 'पृथ्वी थियेटर' में अभिनय करना शुरु किया तथापि स्कूली दिनों में रंगमंच में उनकी रूचि थी। बाद में उन्होंने ऐलिक पदमसी के ड्रामे, त्रिवेणी रंगमंच,इप्टा फिर फ़िल्मों में काम किया। मगर आर्थिक स्थिति डाँवाडोल ही रही।कैफ़ी उन दिनों मुख्यतः पार्टी से मिलने वाले सहयोग और छोटे-मोटे लेखन पर निर्भर थे जो पर्याप्त नहीं थी।


यों पुस्तक के हवाले से देखा जाय तो शबाना के फिल्मी सफलता से पूर्व तक परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य ही रही। इसमे सबसे मार्मिक प्रसंग उनके पहले बच्चे 'ख़ैयाम' का जन्म के बाद साल भर में बीमार होकर निधन हो जाने(1949) का है।इसका एक पहलू आर्थिक समस्या के कारण उसका ठीक से इलाज नहीं हो पाना भी है।यद्यपि शौकत के माता-पिता से उन्हें सहयोग मिलता रहा लेकिन शौकत लिखतीं हैं कि वे अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी।


1973 में परिवार में एक बड़ी त्रासदी हुई।कैफ़ी साहब पक्षाघात के शिकार हुए।शरीर बाँया हिस्सा निष्क्रिय हो गया।काफी इलाज के बाद भी बाँया हाथ काम के लिए सक्रिय नहीं हो सका। इस समय भी, शौकत लिखती हैं "मेरे घर में उस वक़्त सिर्फ़ सौ रुपये थे जो मैंने ख़ैरात के लिए कैफ़ी के तकिये के नीचे रख दिये थे।" कैफ़ी साहब जिस दिन्दादिली से बीमारी से जूझते आगे जीवन मे सक्रिय रहे वह एक मिसाल है। ज़ाहिर है इसमे शौकत जी उनके साथ साये की तरह रही।


इस पुस्तक से चालीस के दशक में प्रगतिशील आंदोलन और कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। फैफ़ी पार्टी कम्यून में रहते थे;शादी के बाद शौकत भी साथ रहने लगी।वहां के हालात-


"आहिस्ता-आहिस्ता मुझे एहसास होने लगा कि यह दुनिया हैदराबाद की दुनिया से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है। इन लोगों का रिश्ता चंद इंसानों से ही नहीं बल्कि सारी इंसानियत से बँधा हुआ है। ये अपने घर, अपनी बीवी-बच्चों के बारे में इतना नहीं सोचते, जितना मज़दूर, किसान और मेहनतकश इंसानों के बारे से में सोचते हैं। इनका मक़सद उन्हें इस इस्तेहसाल(शोषण)करनेवाले सरमायादाराना 

निज़ाम के पंजए-ग़ज़ब से छुड़ाना है।"


कम्युनिस्टों का जीवन-


"रेड फ़्लैग हॉल एक ऐसे गुलदस्ते की तरह था जिसमें मुख़्तलिफ़ क़िस्म के फूल एक साथ सजे थे फिर भी हर फूल की अपनी एक इन्फ़िरादियत(विशेषता) थी, एक

अलग ख़ुश्बू थी। मसलन गुजरात से आए हुए मणि बेन और अम्बू भाई, मराठवाड़ा से सावन्त और शशि, यू.पी. से कैफ़ी, सुल्ताना आपा, सरदार भाई, उनकी दो बहनें रबाब और सितारा, मध्य प्रदेश से सुधीर जोशी, शोभा भाभी और हैदराबाद से मैं । रेड फ्लैग हॉल में सब एक-एक कमरे के घर में रहते थे। सबका बावरचीख़ाना बाल्कनी में होता था। वहाँ सिर्फ़ एक बाथरूम था और एक ही लेट्रीन, लेकिन नौ साल के अर्से में मैंने कभी किसी को बाथरूम और लेट्रीन के लिए लड़ते नहीं देखा। होली, दीवाली और ईद सब मिलकर मनाते। सबके एक-एक दो-दो बच्चे थे । खेल-खेल में शायद बच्चों की लड़ाई हो जाती होगी, लेकिन किसी बच्चे की माँ आकर किसी दूसरे बच्चे की माँ से नहीं लड़ती थी और न ही शिकायत करती थी। सुल्ताना आपा सब बच्चों की अम्माँ कहलाती थीं और सरदार जाफ़री सबके दोदा। मैं सबकी मम्मी और कैफ़ी सबके अब्बा। शोभा भाभी सब बच्चों की भाभी थीं।"


15 अगस्त 1947 के दिन-


"दिन गुज़रते गए और हिन्दुस्तान की आज़ादी का हसीन दिन पन्द्रह अगस्त आ पहुँचा। कम्यून में सुबह-सवेरे से ही हलचल मच गई। तमाम कॉमरेड नहा-धोकर, जो भी अच्छे कपड़े थे, पहनकर तैयार हो गए और सवेरे आठ बजे ही कम्यूनिस्ट पार्टी के दफ़्तर के सामने जमा होने लगे। तिरंगा लहराया गया। चारों तरफ़ नारों का शोर बुलन्द हो रहा था, “इन्क़िलाब ज़िन्दाबाद, हिन्दुस्तान की आज़ादी ज़िन्दाबाद, भारत माता की जय, सल्तनते-बर्तानिया मुर्दाबाद।" सबसे पहले मजाज़ ने अपना गीत सुनाया, 'बोल अरी ओ धरती बोल' । सरदार जाफ़री ने एक इन्क़िलाबी नज़्म पढ़ी। कैफ़ी ने नज़्म सुनाई। फिर पार्टी की ख़ूबसूरत नौजवान लड़कियों ने जिनमें दीना और तरला भी थीं, 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' गाया। पी.सी. जोशी और सज्जाद ज़हीर वग़ैरह ने तक़रीरें भी कीं। फिर सब लोग जुलूस की शक्ल में जमा होने लगे। और मैं एक धान-पान-सी, दुबली-पतली लड़की आँखों में आज़ाद हिन्दुस्तान के वास्ते हसीन ख़्वाब लिए कैफ़ी का हाथ पकड़े-पकड़े उस जुलूस के साथ चल पड़ी। जुलूस ग्वालिया टैंक जाकर रुका। फिर तक़रीरें, नाच-गाना, नारे और खूब हंगामे हुए।फिर जुलूस ख़त्म हुआ। मैं तो अपने कमरे में आकर सो गई। बहुत थक गई थी। लेकिन सरदार भाई, जोए अंसारी, मिर्ज़ा अशफ़ाक़ बेग, मेहँदी, मुनीष, सब शहर में घूमते रहे। एक ईरानी होटल में गए जहाँ जार्ज पंजुम(पंचम) की बड़ी तस्वीर लगी थी। सरदार भाई मेज़ पर चढ़ गए और जार्ज पंजुम की तस्वीर निकालकर ज़मीन पर पटक दी। बेचारा मालिक मना ही करता रह गया लेकिन इन लोगों के तेवर से डर भी गया था। इस पर जोए अंसारी बिगड़ गए कि सरदार को ऐसा नहीं करना चाहिए था और कुछ बुरा-भला भी कहा। सरदार भाई को गुस्सा आ गया। उन्होंने जोए अंसारी को इतना कसकर तमाँचा रसीद किया कि उनका सिर घूम गया। वो डरकर चुप हो गए। उस वक़्त तमाम कम्यूनिस्ट इसी मूड में थे कि अंग्रेज़ों की एक-एक निशानी मिटा देंगे।"


शौकत जी 1949 में पी.सी.जोशी के बाद बी.टी. रणदिवे के कार्यकाल को पार्टी के पतन की शुरुआत मानती हैं


"पी.सी. जोशी की जगह बी.टी. रणदीवे ने ले ली थी। कॉमरेडों के तेवर बदले हुए थे। मैं हैरान-हैरान सबको देखती थी लेकिन किसी से पूछने की हिम्मत नहीं थी।

फिर आहिस्ता-आहिस्ता पता चला कि दूसरी पार्टी कांग्रेस जो कलकत्ता में हुई थी, उसमें पी. सी. जोशी पर इल्ज़ाम लगाया गया था कि वो रिफ़ार्मिस्ट हैं और कांग्रेस के तरफ़दार हैं। वो इन्क़िलाब नहीं ला सकते। बी.टी. रणदीवे ने जो रिपोर्ट तैयार की थी उसमें उन्होंने कहा था : "मुसल्लह(सशस्त्र)इन्क़िलाब का वक़्त आ चुका है, अवाम' हमारे साथ हैं।” इसके बर-अक्स पी.सी. जोशी ने लिखा था कि अभी अवाम पूरी तरह हमारे साथ नहीं हैं। अवाम में अभी पार्टी का काम पूरी तरह नहीं हुआ है। अभी अवाम में मुसल्लह इन्क़िलाब का शुकर पैदा करने के लिए बहुत वक़्त दरकार है। मुसल्लह इन्क़िलाब उस वक़्त तक नहीं आ सकता जब तक कि पार्टी अवाम के अन्दर न पहुँचे और मुसल्लह इन्क़िलाब के लिए उन्हें तैयार न करे। लेकिन ज़्यादातर कॉमरेड बी.टी. रणदीवे के साथ हो गए और पार्टी पॉलिसी बदल गई। वहीं से पार्टी का ज़वाल(पतन)शुरू हुआ। बड़े-बड़े लीडर जेल में ठूंस दिए गए, जो बचे थे वो अंडर-ग्राउंड हो गए। 


शौकत जी ने पहले 'इप्टा' फिर 'पृथ्वी थियेटर' आदि जगहों में काम किया। इसका एक कारण आर्थिक जरूरत भी थी मगर-


"चुनाँचे एक दिन मैं अपने कमरे में बैठी, एक टीकोज़ी काढ़ रही थी।(क्योंकि टी सेट में चाय पीने की ख्वाहिश को मैं अभी तक रोक नहीं सकी थी) कि पी.सी. जोशी मेरे कमरे में आए। ख़ाकी रंग का नेकर और सफ़ेद रंग की आधी आस्तीनों वाली शर्ट पहने हुए थे। मैं घबराकर खड़ी हो गई। अभी तक मैंने उन्हें इतने क़रीब से नहीं देखा था। रंग खुलता हुआ साँवला, नमकीन, नेक चेहरा, लगता था कि मोहब्बत करनेवाले आदमी हैं। मुझे बैठने के लिए कहा। मैं बैठ गई। पूछा : “तमाम दिन क्या करती रहती हो ?” मैंने शर्माकर कहाः “कुछ नहीं।” वो मुस्कुराएऔर बहुत ही नर्म लहजे में कहा, “कम्यूनिस्ट शौहर की बीवी कभी बेकार नहीं रहती। उसको अपने शौहर के साथ पार्टी का काम करना चाहिए। पैसे कमाने चाहिए और बाद में जब बच्चे हों तो उन्हें अच्छा शहरी बनाना चाहिए, तब ही वह कम्यूनिस्ट की मुकम्मल बीवी बन सकती है।” वो तो यह कहकर चले गए लेकिन मेरे कच्चे दिमाग़ में इन बातों ने एक हलचल-सी मचा दी, बल्कि ये बातें मेरे दिल में पत्थर की लकीर बन गईं। उनके लहजे की सादगी और इतनी ताक़त थी कि मैंने दिल ही दिल में फ़ैसला कर लिया कि उन्होंने जो कहा

खुलूस में है, मैं कर दिखाऊँगी।"


पृथ्वी राज कपूर के 'पृथ्वी थियेटर' की ज़िंदगी-


"मैंने पृथ्वी थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था। सौ रुपए माहवार तनख़्वाह मिलती थी । रोज़ सुबह नौ बजे शबाना को कंधे पर लादकर पृथ्वी थियेटर ले जाती, जो ऑपेरा हाउस में था और दोपहर में दो बजे वापस आकर

खाना पकाती। अक्सर बस में आते हुए मेरे पर्स में सिर्फ़ दस पैसे होते थे और मेरा दिल धड़कता था कि अगर यह सिक्का खोटा निकला तो मुझे इन सारे मुसाफ़िरों के सामने इस बस से बेइज्ज़त होके नीचे उतरना पड़ेगा। शुक्र है कि कभी सिक्का खोटा नहीं निकला। शाम को पाँच बजे एक लड़के को ट्यूशन पढ़ाती, उससे पैंतालीस रुपये मिल जाते। जब नागपुर टूर पर गई तो पर्दे और बेडकवर ख़रीद लिए जो पंद्रह-पंद्रह रुपये में मिल गए थे। मुनीष के साथ हैंगिंग गार्डन जाकर चम्पा के फूलों की टहनियाँ तोड़कर लाती और गुलदान में सजाती। मुनीष को नज़्दीक के चोर रास्ते मालूम थे, इसलिए हम दोनों पैदल जाते और टहनियाँ लेकर पैदल ही आते थे।"


पृथ्वी राज कपूर नेकदिल, सादगीपसंद सच्चे कलाकार थे। थियेटर कलाकार उन्हें 'पापा जी' कहते थे-


"तीन घंटों के शो के बाद पृथ्वीराज जी दरवाज़े पर एक झोली लेकर, गर्दन नीचे किए खड़े हो जाते थे ताकि लोग बाहर निकलते वक़्त झोली में जितने पैसे डालना चाहें डाल दें। जो कुछ मिलता वो मैनेजरों के हवाले करके मेकअप रूम में चले जाते। यह पैसा थियेटर के वर्कर फंड में जमा होता और ज़रूरतमन्द आर्टिस्टों को उधार दिया जाता था। फिर उनकी तनख़्वाह से उनकी मर्जी के मुताबिक़ काटा जाता था। इस फंड से मैंने कई बार फ़ायदा उठाया। जब मेरा बेटा बाबा आज़मी आठ महीने की उम्र में बीमार हुआ तो मैंने इसी फंड से क़र्ज़ लेकर उसका इलाज करवाया था। उस वक़्त मेरी तन्ख्वाह सौ रुपये थी और मैं अपने दोनों बच्चों को उनकी आया ऐलिस के साथ टूर पर ले जाया करती थी। थियेटर सिर्फ़ टूर पर ही पैसे कमाता था वर्ना बम्बई में तो वह नुक़्सान में ही चलता था।"


"वो बेइंतिहा रहमदिल थे। एक मर्तबा कलकत्ते में एक वर्कर को, जिसका नाम ढोंडू था, हैज़ा हो गया। पृथ्वीराज जी किसी मीटिंग में बाहर गए हुए थे। दिन के डेढ़ बजे थे। उसकी उलटियों और फ़ुज़्ले(मल) से कमरा बेहद गन्दा हो गया था। हम लड़कियाँ तो मारे डर के उसके कमरे के आसपास भी नहीं जा रही थीं। जब पृथ्वीराज जी बाहर से आए तो किसी ने कह दिया कि ढोंडू को कॉलरा हो गया है। बस पापा जी बग़ैर जूते उतारे उसके कमरे की तरफ़ भागे और जाकर उसे अपने सीने से लगा लिया। ढोंडू का जिस्म ठंडा होता जा रहा था, मगर पापा जी उसे डॉक्टर के आने तक इस तरह लिपटाए रहे कि उसको उनके जिस्म की हरारत मिलती रहे। जब डॉक्टर आया तो उसने कहा : “पृथ्वीराज जी, इस शख़्स की जान सिर्फ़ आपने अपने जिस्म की गर्मी देकर बचाई है, वर्ना यह बिल्कुल ठण्डा हो गया था।”


शौकत जी ने अपने बच्चों शबाना और बाबा आज़मी के बचपन का भी जिक्र किया है जो कि एक सामान्य मध्यमवर्गीय कामकाजी परिवार सा है।आगे जाकर दोनो ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अपना क्षेत्र चुना। शबाना ने पूना इंस्टिट्यूट में एक्टिंग का कोर्स किया और गोल्ड मेडल हासिल की।इसी कारण उसे श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'अंकुर' का ऑफ़र मिला और अपने पहले ही फ़िल्म में उन्हें नेशनल अवार्ड मिल गया। आगे उन्होंने समाजिक फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनय किया और सफलता अर्जित किया। शबाना के इस बनने में अन्य बातों के अलावा-


"बचपन में शबाना को कैफ़ी कभी-कभी अपने साथ मज़दूरों की बस्ती या.मीटिंगों में भी ले जाया करते थे। इसका असर भी उस पर था। कैफ़ी की वजह से बड़े-बड़े अदीब और शायर हमारे घर आया करते थे और हमारे साथ रहा भी करते थे मसलन सज्जाद ज़हीर, जोश मलीहाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी। एक बार मख़्दूम मुहीउद्दीन भी हमारे मेहमान हुए थे। शबाना ने अपने बचपन में इन लोगों की महफ़िलें देखी हैं, इनकी बातें सुनी हैं। मेरा यक़ीन है कि आगे चलके शबाना।की जो शख़्सियत बनी, उसमें घर के ऐसे माहौल का भी बड़ा हिस्सा है।"


आगे शबाना ने सामाजिक आंदोलनों में भी सहभागिता की और 1997 में राज्यसभा सांसद बनने पर बम्बई और यू.पी.में काफी काम किया।कैफ़ी जब अपने गांव मिजवां में रहकर उसके विकास के लिए प्रयासरत थे उस समय भी शबाना का काफ़ी सहयोग रहा।


बाबा आज़मी एक सफल कैमरामैन बने।शौकत जी के अनुसार


"अब वह इतना बड़ा हो गया है, इतना कामयाब कैमरामैन है लेकिन बचपन में जैसा था बिल्कुल वैसा ही है, ग़रीब तबके के लोगों से हमदर्दी, सही और ग़लत का शिद्दत से एहसास । जब वह सत्रह साल का था तो चेतन आनन्द की फ़िल्म ‘हिन्दुस्तान की क़सम’ में असिस्टेंट डायरेक्टर बना। एक दिन पता चला कि वह शूटिंग छोड़के वापस आ गया है। जब मैंने वजह पूछी तो उसने बताया, “वहाँ वर्करों के साथ नाइंसाफ़ी होती है। सबसे ज़्यादा काम वही करते हैं लेकिन कोई वर्कर अगर एक कप से ज़्यादा चाय माँगे तो उसे नहीं मिलती। जबकि हम जैसे लोग कितना भी खाना जाए कर दें, तो भी कोई एतिराज़ नहीं करता। वर्कर के बग़ैर फ़िल्म नहीं बन सकती और उसके खाने-पीने में फ़र्क़ करना बुरी बात है।” बाबा में न ग़लत बात की बर्दाश्त है न झूठ बोलने की आदत।"


जीनव के आख़िरी पड़ाव में कैफ़ी अपने गांव मिजवाँ आकर रहने लगे और उसके विकास के लिए जो प्रयास उन्होंने किया वह अनुकरणीय है। उन्होंने गाँव के लिए सड़क,स्कूल,कॉलेज के लिए प्रयास कर उसे मूर्त रूप दिलाया। ज़ाहिर है इसमे तत्कालीन राजनेताओं,शबाना,ग्राम वासियों आदि का भी सहयोग रहा,मगर इन सब में शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे कैफ़ी के अपने गांव के प्रति लगन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।


10 मई 2002 को कैफ़ी आज़मी का निधन हो गया। शौकत जी लिखती हैं-


"मैं अपने दिल को समझाती हूँ कैफ़ी कि तुम अमर हो गए हो। लेकिन इसका क्या करूँ कि बार-बार ख़्याल आता है कि तुम्हारे बग़ैर मैं बहुत अकेली हो गई हूँ कैफ़ी।"


 आज शौकत जी भी हमारे बीच नहीं है(निधन 22 नवम्बर 2019)।मगर शौकत-कैफ़ी का जीवन संघर्ष और आदर्श हमे प्रेरणा देता रहेगा कि जब तक इस दुनिया में ग़ैर बराबरी, असमानता और शोषण रहेगा समाजवाद का सपना जीवित रहेगा। ज़ाहिर है इसके लिए उनके जैसे  प्रतिबद्ध व्यक्तित्वों की बड़ी संख्या में जरूरत होगी जो इधर के उत्सवधर्मी और कैरियवादी साहित्यिक माहौल में दुर्लभ हो चला है।


कृति- *याद की रहगुज़र* 

लेखिका- *शौकत कैफ़ी* 

प्रकाशक- *राजकमल* , नई दिल्ली

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● _अजय चन्द्रवंशी_ , कवर्धा(छत्तीसगढ़)

मो.9893728320

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  प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा  एक नदी किनारे एक पेड़ था, और पास के गांव का एक बच्चा, अपनी स्कूल की छुट्टी के बाद..रोज उस पेड़ के पास...