शनिवार, 8 अक्तूबर 2022

भारतीय संस्कृति का प्रतीक हैं गोदना

 गोदना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। जो की आज परंपरा से ज़्यादा “टैटू” के फैशन के नाम पर ट्रेंड कर रहा है। जबकि भारत के इतिहास में गोदना की अपनी एक कहानी और मान्यता है।

पहले की परंपरा आज फैशन के दौर में बदल गयी है। हम बात कर रहे हैं गोदना  परम्परा की। गोदना जिसे आज लोग शहरों में  टैटू के नाम से जानते हैं। गोदना की परंपरा आज फैशन के नाम से विश्वभर में लोगों द्वारा अपनायी गयी है। चाहें बच्चा हो, जवान हो, महिलाएं हो या कोई बूढ़ा , हर कोई इसके पीछे पागल है।


लेकिन आज  गोदना को परंपरा से ज़्यादा फैशन की वजह से लोगों में बीच में ज़्यादा जगह मिली है। आज का युग ही फैशन का है। जब तक आप फैशन के हिसाब से चलते हैं तो दुनिया आपके साथ चलती हैं। जब आप नए फैशन को नहीं अपना पाते तो आप दुनिया की दौड़ से पीछे रह जाते हैं। लेकिन गोदना की परंपरा कभी नई नहीं थी बस जिन्हें इसके बारे में नहीं पता वह उनके लिए फैशन बन गयी। गोदना भारत की पुरानी परंपराओं में से एक है जिसका अपना इतिहास, अस्तित्व और कहानी है।


कई लोग परंपरा के नाम पर गोदना गुदवाते हैं तो कई श्रृंगार या विरोध के रूप में। हर किसी के पास गोदना गुदवाने की अपनी-अपनी वजह है।

छत्तीसगढ़ जनजातीय बहुल राज्य है यहां 42 जनजातियां निवास करती हैं। जनजातीय दृष्टि से भारत का पाचवां राज्य छत्तीसगढ़ है। छत्तीसगढ़ में कुल जनसंख्या का एक तिहाई भाग जनजातीय जनसंख्या है। यहां बस्तर और सरगुजा जनजातीय बहुल अंचल हैं। गोदना प्रथा बस्तर, सरगुजा, कांकेर, कर्वधा और जषपुर की जनजातीय संस्कृति से अधिक जुडी हुई है। बस्तर अंचल की अबुझमाडियां दण्डामी माडियां, मुरिया, दोरला, परजा, घुरुवा जनजाति की महिलाओं में गोदना गुदवाने का रिवाज पारम्परिक है। बस्तर, कांकेर के जनजातियों में विवाह पूर्व लड़कियों में गोदना गुदवाने का रिवाज है। यहां की जनजातीय महिलायें कोहनी में मक्खी, अंगूठा के किनारे खिच्ची, पंजा में खडडू, बांह में बांहचिंघा और छाती में सुता गोदना गुदवाती हैं। 


सरगुजा अंचल में गोदना प्रथा का प्रचलन काफी प्राचीन है। यहां की सभी जनजातियों मे गोदना गुदवाने की प्रथा प्रचलित है। क्षेत्र और जाति के आधार पर भिन्न-भिन्न गोदना गुदवाये जाते हैं। यहां की जनजातियां सम्पूर्ण शरीर में गोदना गुदवाती हैं। सभी अंगों के गोदना का अलग-अलग नाम और उसका महत्व है। यहां की गोदना प्रिय जनजातियां गोड, कंवर, उरांव, कोडाकू, पण्डो, कोरवा हैं। स्त्रियां सुन्दरता के लिए माथे में बिन्दी आकृति गुदवाती हैं। इनकी मान्यता है कि इससे सुन्दरता के साथ-साथ बुद्वि का विकास होता है। दांतो की मजबूती के लिए ठोढी में गोदना गुदवाये जाते हैं। इसे मुट्की कहते हैं। नाक की गोदना को फूल्ली और कान की गोदना को झूमका कहते हैं। रवांध भुजा में चक्राधार फूल आकृति गुदवाने से सुन्दरता बढती है। गला में हंसुली गहना जैसी आकृति गुदवाने से सुन्दरता के साथ-साथ आवाज में मधुरता आती है। कलाई की गोदना को मोलहा कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इसके गुदवाने से स्वर्ग में भाई-बहन का मिलाप होता है। हथेली के पीछे गोदना को ’करेला चानी’और हथेली के पीछे की सम्पूर्ण गोदना को ’’हथौरी फोराय’ कहते है। हाथ के अंगूठा में मुन्दी और पेंडरी में लवांग फूल गुदवाये जाते हैं। पैर में चूरा-पैरी और पंजा में अलानी गहना गुदवाये जाते हैं। पैर के अंगूठे की गोदना को अनवठ कहते हैं। इसी तरह शरीर के प्रत्येक अंगों में हाथी पांज ,जट, गोंदा फूल, सरसों फूल, कोंहड़ा फूल, षंखा चूड़ी, अंडरी दाद, हल्दी गांठ, माछी मूड़ी पोथी, कराकुल सेत, दखिनहा, धंधा, बिच्छवारी, पर्रा बिजना, हरिना गोदना अनेक अलग-अलग नामों से गोदना गुदवाये जाते हैं, जिसका अपना महत्व है।


जय जोहार जय आदिवासी 🙏🙏🙏🏹



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्याम बेनेगल और रीति कालीन कवि भूषण

 श्याम बेनेगल ने अपने मशहूर सीरियल “भारत एक खोज” में जिस अकेली हिंदी कविता का स्थान दिया है वह है रीतिकाल के कवि भूषण की। कहा जाता है कि भूष...