मंगलवार, 22 नवंबर 2022

जयप्रकाश त्रिपाठी की एक अद्भुत्त कविता --

 प्रस्तुति - वीरेंद्र सेंगर 


आगे-आगे कौवा नाचैं, पीछे से मुँहझौवा नाचैं, 

हौवी नाचै, हौवा नाचैं, पी के अद्धा-पौवा नाचैं ...

.

चारो ओर निखट्टू नाचैं, कुर्सी पर मुँह-चट्टू नाचैं,

महँगी उचक अटारी नाचै, एम०ए० पास बेकारी नाचै,

घर-घर में लाचारी नाचै, दिल्ली तक दुश्वारी नाचै 

लट्टू ऊपर लट्टू नाचैं, राजनीति के टट्टू नाचैं,

गा-गाकर कव्वाली नाचैं, बजा-बजाकर ताली नाचैं...


गुण्डा और मवाली नाचैं, औ उनकी घरवाली नाचैं,

शहर-शहर उजियारी नाचैं, गाँव-गाँव अन्धियारी नाचै,

रहजन खद्दरधारी नाचैं, अफ़सर चोर-चकारी नाचैं,

गाल बजावत मल्लू नाचै, सिंहासन पर कल्लू नाचै,

ठोकैं ताल निठल्लू नाचै, मन्त्री बन के लल्लू नाचै ...


छूरा नाचै, चाकू नाचै, पट्टी पढ़े-पढ़ाकू नाचैं,

चुटकीमार तमाखू नाचै, साधु वेश में डाकू नाचै

रात-रात भर टामी नाचै, मामा के संग मामी नाचै

उजड़े हुए असामी नाचैं, मालामाल हरामी नाचैं

ताकधिनाधिन ताकधिनाधिन ताकधिनाधिन त्ताआ ...

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