बुधवार, 17 जून 2020

पातालगंगा से फूटी जलधारा / उमाशंकर पाण्डेय







फूट पड़ी पातालगंगा

-उमाशंकर पांडेय

 फूट पड़ी पातालगंगा सांसद, पत्रकारों, स्थानीय नागरिकों ने, उठाया जल संरक्षण के लिए फावड़ा, तसला, शायद विश्वास ना हो सूखे बुंदेलखंड में जलधारा अपने आप ही निकलने लगी है जमीनी सतह से, सामूहिक प्रयास से।

 बांदा से चित्रकूट रोड पर अतर्रा 7 किलोमीटर दूरी पर यह स्थान है। जो तुर्रा ग्राम पंचायत ब्लाक नरैनी के अंतर्गत आता है विषहर नदी के किनारे बुंदेलखंड ही नहीं शायद भारत का यह पहला ऐसा स्थान है जहां पर 100 वर्ष से अधिक समय से अपने आप जमीन से पानी सदैव बहता रहा है। लेकिन किसी कारण बस पिछले 4 वर्ष से यह पूरी तरह से सूख गया था, कई दिनों के प्रयास के बाद सामूहिक योजना बनी बगैर किसी सरकारी सहायता के सर्वोदय विचारधारा को साथ लेकर इस स्थान की सफाई शुरू की गई 100 लोगों के सामूहिक प्रयास से, एक नहीं, दो धाराएं अचानक पाताल से पानी निकालने लगे यह चमत्कार कहा जाए या समूहिक प्रयास।

 इस समूहिक प्रयास में सांसद बांदा चित्रकूट भैरव प्रसाद मिश्रा, अतर्रा तहसील के वरिष्ठ पत्रकारों ने खुद मिट्टी खोदी फावड़ा चलाया स्थानीय नागरिकों ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए वह कर दिखाया जो करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद संभव नहीं है।

 शायद विश्वास ना हो जो भी देखना चाहता है वह वहां जा कर देखें हमें खुशी होगी एक ओर जहां बुंदेलखंड में 300 फीट पर पानी नहीं है सरकारी रिकॉर्ड में, वहीं इस स्थान पर अपने आप जमीन से पानी निकल रहा है। मै सौभाग्यशाली हूं, इस अद्वितीय ऐतिहासिक जल संरक्षण के प्रयोग श्रमदान का नेतृत्व स्थानीय ग्राम प्रधान प्रतिनिधि, स्थानीय नागरिकों, ने मुझे सौंपा और मेरे नेतृत्व में शायद यह ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुआ।

मेरे सामाजिक जीवन में शायद यह पहला अवसर है जिसका परिणाम अल्प समय में जल संरक्षण के क्षेत्र में विश्वव्यापी होगा। मुझे खुद विश्वास नहीं था कि जलदेवता ऐसी कृपा इस स्थान पर करेंगे इतनी जल्दी।

ज्ञात हो कि इस विषहर नदी में आज से 20 वर्ष पूर्व बांदा जिले के आसपास के जिलों के कुष्ठ रोगी, चर्म रोगी, बीमार लोग स्नान करने गस नदी मे आते थे, और ठीक होकर चले जाते थे। इस स्थान के पास जब इस कुंड से पानी निकलता था आसपास के दमा रोगी इसका पानी लेकर जाते थे, पानी पीकर ठीक हो जाते थे, यह एकमात्र ऐसी नदी है जो केवल 7 किलोमीटर है, जो कुछ समय बाद नाला बन गई। कई लोगों ने, समाजसेवी पत्रकार, स्थानिक नागरिकों ने मुझसे कई बार इस स्थान की चर्चा की थी। चर्चा उपरांत मैंने निर्णय लिया की यदि सब लोग मेरे साथ हो तो प्रयास किया जा सकता है, 3 दिनों के समूह प्रयास का परिणाम आप सब के सामने है। इस सामूहिक प्रयास में बांदा चित्रकूट सांसद भैरो प्रसाद मिश्रा ने साथ ही नहीं दिया बल्कि फावड़ा उठाया, तसला से मिट्टी फेंकी, पत्रकारों के जो हाथ से खबर लिखते हैं, आज पत्रकारों के उन हाथों ने फावड़ा चलाया, तसले से मिट्टी फेंकी, निस्वार्थ भाव से श्रमदान किया और स्थानीय नागरिकों का एवं मेरा उत्साह ही नहीं बढ़ाया हर संभव मदद देने की बात कही।

राष्ट्रीय सहारा के संवाददाता श्री अर्जुन मिश्र, अमर उजाला के श्री मृत्युंजय द्विवेदी, दैनिक जागरण के श्री राजेश तिवारी, हिंदुस्तान समाचार पत्र के मुन्ना द्विवेदी, दैनिक जागरण कानपुर के बिहारी दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार राजाराम तिवारी ने श्रमदान किया।
आश्चर्य व्यक्त किया कि अचानक यह जलधाराएं कहां से आ गई। प्रत्यक्ष ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रज्जू सिंह, दिव्यांग विश्वविद्यालय के चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर सचिन उपाध्याय, विशेष नारायण मिश्र चित्रकूट, राजेश सिंह नंदना, राजा शिवहरे, पंडित रामस्वरूप महाविद्यालय प्रबंधक दिनेश उपाध्याय, बच्चा पांडे प्रबंधक चंद्र शेखर पांडे महाविद्यालय अतर्रा, हनुमान मंदिर के महंत रामगिरी, रामभरोसा पांडे, राम प्रकाश गर्ग, राम प्रबंध पांडे, राज नारायण सिंह, रामाकांत, रामराजा गौतम, राम प्रकाश त्रिपाठी, ओमप्रकाश शिवहरे, राजा बाबू झा, भोला प्रसाद, अनिल वर्मा, मलखान सिंह, संजय सिंह, विश्वनाथ गर्ग, राम अवतार गौतम, विजय वर्मा पूर्व प्रधान, नत्थू यादव मट्ठा वाला, बलराम सिंह खंगार, श्रीमती कमला शिवहरे सहित करीब 100 लोगों ने 3 दिन तक स्वेच्छा से श्रमदान कर जल संरक्षण के क्षेत्र में इतिहास रचा। ईश्वर ने मुझे माध्यम बनाकर देश में कई महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों का नेतृत्व करने का मौका दिया, लेकिन आज जो जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रत्यक्ष जमीनी सतह से पाताल गंगा का पानी निकलना और एक नई धारा का प्रकट होना मैं अपनी निजी उपलब्धि मानता हूं। जल संरक्षण के क्षेत्र में मेरा ऐसा मानना है कि प्राणी और प्रकृति कल्पना जल के बिना संभव नहीं है।

पृथ्वी में जितने भी जीव हैं, उनका जीवन जल पर निर्भर है। शरीर में, पेड़ में, फलों में, अनाजों में, पत्तों में, जो स्वाद है, रस है, वह सब जल है। और इसके बिना सब कुछ सुना है। जल ही जीवन है, पानी में सारे देवता रहते हैं, वेदों में जल को देवता माना है हमारे इस सामूहिक प्रयास को राष्ट्रीय मीडिया ने, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ अधिकारियों ने, जिस तरीके से स्वीकार किया है, सहयोग किया है, उत्साह बढ़ाया है, हम उनके आभारी हैं। अति शीघ्र एक बड़ी योजना बनाकर स्थानीय नागरिकों के साथ बैठक कर सामूहिक सर्वोदय विचारधारा पर जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रयास किए जाएंगे। यदि इस गांव में सामूहिक प्रयास से पातालगंगा निकल सकती है तो अन्य गांव में क्यों नहीं, ज्ञात हो कि अतर्रा की इस भूमि पर आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की वृहद रूपरेखा तैयार की थी तथा देश के जाने-माने समाजवादी जयप्रकाश नारायण ने यहीं पर भूदान आंदोलन के लिए अपना जीवन दान दिय हमने छोटा सा प्रयास किया यह प्रयास बड़ा नहीं है। इससे पूर्व भी इस कुंड की सफाई जल संरक्षण के लिए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उच्च अधिकारियों को लिखा पढ़ी थी लेकिन 4 वर्षों में सरकार तो सरकार है। कब सुनेगी पता नहीं इसलिए मुझे लगता है, की सामूहिक प्रयास करने चाहिए सरकार अपना काम करें, हम अपना काम करें।

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