सोमवार, 8 जून 2020

बेटियां / आभा





बेटियाँ


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बेटियांँ, घर की लक्ष्मी,
बेटियांँ, घर की रौशनी,
चली जाती हैं एक दिन,
रीत ही ऐसी दुनिया ने बनाई है,
बेटियांँ, अपनी होकर भी पराई हैं।
बेटियांँ चिड़ियों सी चहकती,
बेटियांँ, फूलों सी महकती,
गुमसुम हो जाती है ये चिड़िया,
सुख ही जाते हैं ये फूल,
रीत ही ऐसी दुनिया ने बनाई है,
बेटियांँ, अपनी होकर भी पराई हैं।
जनम लेती हैं, मांँ बाबा के घर,
ब्याह दी जाती हैं, परायों के घर,
अपना बसेरा छोड़कर,
घर दूसरों का बसाती हैं,
रीत ही ऐसी दुनिया ने बनाई है,
बेटियां, अपनी होकर भी पराई हैं।
ये प्यारी रहीं बाबा की,
ये दुलारी अम्मा और भईया की,
सबको रोता छोड़कर,
एक दिन ससुराल चली जाती हैं,
रीत ही ऐसी दुनिया ने बनाई है,
बेटियांँ,अपनी होकर भी पराई हैं।
परायों के घर को अपनाती हैं,
बचपन का अंँगना भूलकर,
ससुराल की देहरी अपनाती हैं,
अपने अरमानों को भूलकर,
सपना किसी और का सजाती हैं,
रीत ही ऐसी दुनिया ने बनाई है,
बेटियांँ, अपनी होकर भी पराई हैं।
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         स्वरचित कविता
                "आभा"

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