सोमवार, 15 जून 2020

सुरेंद्र ग्लोश की रचनाएँ






/ सुरेन्द्र  ग्लोश


  एक दिल था शाम को सौंप दिया
अब   दुजा  कहां   से  लाएं  हंम
बंसी   धुन   कान‌   में    बैठ  गई
अब और  क्या  उसे सु नाएं  हंम
एक दिल था शाम को सौंप दिया

आंखों   में  शाम   हैं   आन  बसें
कुछ   और   देख  ना   पाएं  हंम
इस  तन  पे  शाम  का  राज‌ चले
अब   खुद  कैसे   चल  पायें‌  हम
बंसी   धुन    कान   में   बैठ   गई
अब  और  क्या  उसे  सुनाएं  हंम

जब   शाम  शाम   रंग  डाल  गये
किसी  और  ना रंग  रंग पायें  हंम
बैठा    है   लबों   पे    शाम   नाम
कुछ   और   बोल  ना   पायें   हम
 बंसी    धुन   कान   में   बैठ   गई
अब  और  क्या  उसे  सुनाएं   हंम

उदौ ‌ उस   शाम  का  क्या  कहना
हैं   उस    की   आस   लगाए  हंम
अब    रो   रो    ‌आंसू    सूख   गए
दिल   ही   दिल   घुटते  जायें   हम
 बंसी  ‌  धुन   कान    में   बैठ   गई
अब  और   क्या  उसे  सुनाएं   हंम

उस   बिरहा  जल जल  खाक  हुए
अब  किस  को  और  जलांयें‌   हंम
अगर   कांटा  भी  चुभ  जाये‌  उन्हें
यहां   लहू   लुहान   हो  जायें   हम
बंसी   ‌ धुन     कान    में   बैठ  गई
अब   और   क्या  उसे  सुनाएं  हंम

हम   यही    दुआ   नित ‌ करें  सदा
वह      खुश     रहें    आबाद    रहें
जब     याद     हमारी   आ     जाए
उन    के  ही   मन   पा ‌  जायें   हम
 बंसी     धुन   कान   में    बैठ   गई
अब।  और   क्या  उसे  सुनाएं   हंम

जा  ‌  ऊदौ    शाम   से   ना  ‌ कैहना
हमं     घुट    घुट    जिए   जाते    हैं
तेरी  याद  में   तिल   तिल   मरते  हैं
ना    पायें    चैन    ना     सोएं    हंम
बंसी    धुन    कान    में    बैठ    गई
अब   और   क्या  उसे   सुनाएं   हंम

कुछ    ऐसा   ना    कह    देना   उन्हें
जो   और    दुःखी   कर   जाए   उन्हें
हम   खुश  हैं   जिसमें   वो   खुश   हैं
चाहे    जांन   भी   दे    जायें  गे   हंम
बंसी     धुन    कान     में     बैठ   गई
अब   और   क्या ‌  उसे   सुनाएं    हंम
एक   दिल था  शाम  को  सौंप   दिया
अब     दुजा   कहां    से   लाएं    ह

: हम   तो   प्यार _ ए _ वफा   कर  के  सनम
बन  गये  तमाशा  _ए  _ जमानां  ओ  सनम

तुने  क्यूं  तोड़  दिया  आईना _ए_दिल  मेरा
टुकड़े   टुकड़े   बिखरा  है  ज़मी   पे   सनम
बन  गये  तमाशा  _  ए _ जमानां  ओ  सनम

दुनिया  ने दिये   जख्म  वो  भर  गये  तमाम
भर ना पाया एक ज़ख़्म जो तूने  दिया सनम     
बन   गये   तमाशा _ए_ज़माना   ओ    सनम

बहारें  भरी रहें  तेरी  राहों  में  जहां  तुम  रहो
तेरे  ग़म  के  सहारे  जी  लेंगे  सारी  उम्र   हम
बन    गये   तमाशा _ए_ज़माना   ओ    सनम


ना   दर   ना   ठिकाना   पड़ें   रास्तों   पे   हम
राह  तकें   ये   आंखें   तेरे   आने   की   सनम       
बन   गये   तमाशा _ ए _ ज़माना   ओ   सनम
हम   तो   प्यार  _ ए _ वफा   कर    के   सनम
बन  ग   ये  तमाशा  _ ए _  ज़मानां  ओ  सनम




नां मैं तुझ से  खफा  था नां  तू  मूझसे  थी खफा
फिर   क्यु   जिंदगी   ने   हमें   जुदा   कर   दिया

नां  वो   रात  हो  गी   अब  नां  वो   चांद   हो  गा
तुझे  देखने  को  मेरा  दिल  सदा ‌  बेताब   हो  गा
जांनता  हूं  मैं  के  तुम  ना  लौटो  गी  अब   कभी
फिर  भी हर  पल  तेरे  मिलने  का  इंतजार  हो गा
नां  मैं   तुझ  खफा  था  नां  तू   मुझसे   थी  खफा

तुझे  ढूंढें  गी   नज़रें   हर   शाख  पे   हर  फूल   में
आस   रहे   गी   कहीं   तो   तेरा    दीदार   हो   गा
दुआ   मांगूं   रब  से  ले   जाये   मुझे  भी  पास  तेरे
मिला  दे  जान _ए_जिगर  से  बड़ा  उपकार  हो गा
नां  मैं  तुझ  से  खफा  था  नां  तू  मुझसे  थी  खफा

प्यार  भरी    दुनिया   को   उजाड़ ‌   के   रख   दिया
खिजां   ने   खिलते   फूलों   को   बर्बाद   कर  दिया
अंधेरा   छा  गया    मेरे  घर   में  तेरे  जाने   के  बाद
रौशन   रहा   हरदम  तेरे  हुस्न _ ए _ जमाल  से  था
नां  मैं   तुझ  से  खफा  था  नां  तू   मुझसे  थी  खफा
फिर    क्युं    जिंदगी    ने    हमें    जुदा    कर    दिया






दील अंजानें  तुझ   को दे बैठा
एक ज़ैहर - ऐ-,आब.मैं पी बैठा
दिल  अंंजानेंं तुझ  को  दे   बैठा

कुछ ऐसी पी ली निग़ाह - ए -शराब
तेरी   ‌आपनें   होश   गवा   बैठा
दिल  अंजाने  तुझ  को  दे  बैठा

जब   होश  आया  देखा  मैं  तो
तेरी  चौखट  पर था  गीरा  बैठा
दिल  अंजांनें   तुझ को  दे  बैठा

मुझ सा नां इश्क  में खोना यारो
मैं तो आपना जनाजा उठा बैठा
दिल  अंजांनें  तुझ  को  दे  बैठा

वो शख्स जो  इश्क  में डूब गया
वो खुद ही खुद  को मिटा   बैठा

दिल  अंजानें  तुझ  को  दे  बठा
एक ज़हर - ए - आब मैं पी बैठा
दिल  अंजांनें   तुझ  को  दे बैठ




 (यह रचना बच्चों को समर्पित)



ऐक  चिड़िया  ठंड  के  दिनों  में  जा बैठी  धूप  सेंकने

कबुतर  ने देखा  चीडिया  को आ  बैठा  उसके  सामने

देख के  कौवा  उन दोनों  को  लाया  मुंगफली  के दाने
मौसम  सुहाना  देख मोर  भी लगा अपने पंख  फैलाने

अंबवा  बैठी  कोयल  आई  कूहूं कूहूं  करती गाना गाने
दौड़ता  आया  रीछ भी ले  कर ढोल और लगा  बजाने

जमां हो  सब  पंछी  व  जानवर  लग  गये  धूम  मचाने
साथ    साथ    में    खाते    जाएं    मूंगफली     केदाने

लगे  भूल सब  गिले-शिकवे  एक दूजे  को  गले  लगाने
सब  ने कहा  कुछ  वक्त  यहां रोज़  आएं  खुशी  मनाने

एक   चीड़िया   ठंड के  दिनों ‌ में  जा  बैठी  धूप  सेंकने
कबुतर  ने  देखा  चिड़िया  कोआ  बैठा  उस  के  सामने
चिड़िया बैठी धूप सेंकने           चिड़िया बैठी धूप सेंकने



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