गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

सुरेन्द्र सिंघल की दो गजलें








मैं कि अब ख़ुद को समंदर में डुबोना चाहता हूं
 यानि खु़द में ही समंदर को समोना चाहता हूं

मुझको खुद पर तो नहीं विश्वास तुमसे पूछता हूं
मैं तुम्हारा ही कि या अपना भी होना चाहता हूं

खूंटियों पर टांग सारा बोझ दिन भर की थकानें
निर्वसन हो फर्श पर कमरे के सोना चाहता हूं

 अब कि जब तेरे बदन की आग भी धुंधुआ रही है
घुट न जाए दम धुएं के पार होना चाहता हूं

मुझको अब मेरे अंधेरों में भटकने दो अजीज़ो
बात ये है रोशनी के दाग़ धोना चाहता हूं

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गर नहीं बस में मेरे तेज हवाएं रोकूं
 जिस तरह भी हो मगर बुझने से शमऐं रोकूं


मुझको दीवार समझ पीठ टिकाली उसने
अब मेरा फ़र्ज़ है गिरती हुई ईंटें रोकूं

दफ़्न जिंदा ही मुझे करने चली है ये सदी
कैसे ताबूत में ठुकती हुई कीलें रोकूं

रोज़ कुछ और सिमट जाती है तेरी दुनिया
रोज़ कुछ कितना सिमट जाऊं कि सांसें रोकूं

              सुरेंद्र सिंघल

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