शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

एडजस्ट / विजय केसरी



कहानी




एडजस्ट / विजय केसरी

श्रेया बचपन से ही सबकी दुलारी रही थी। उसका रूप भी बड़ा ही लुभावना था, जो भी उसे एक बार देखता, बस देखता ही रह जाता था। उसके रुप के समान ही उसकी वाणी में मिठास थी। श्रेया अपनी तोतली बोली से घर के सभी लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला देती थी। घर के सभी सदस्य श्रेया को बहुत चाहते थे।
समय के साथ अब श्रेया चार वर्षों की हो गई थी।  आकाश और रीता ने श्रेया का दाखिला रांची के एक सबसे बड़े स्कूल में करवा दिया था।  समय के साथ दिन बीतते चले गए। इस दरम्यान आकाश और रीता के जीवन में दो और नन्हें बच्चें सुशांत एवं प्रवीण आ गए थे। तीनों बच्चें एक साथ बड़े हो रहे थें।
पांच जनों का यह परिवार अब एक नए मकान में शिफ्ट कर गए थे
इस नए मकान (वसंत विहार) को आकाश और रीता ने बड़े ही अरमानों से बनाया था। तीनों बच्चें नए मकान में आकर बहुत खुश थें। श्रेया अब दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी। नए मकान में श्रेया के लिए एक अलग से कमरा बनवाया गया था। स्कूल से आने के बाद वह उसी कमरे में ज्यादातर समय बीताती थी। होमवर्क भी उसी कमरे में करती थी। पुराना मकान से नए मकान में शिफ्ट होने से श्रेया बहुत ही खुश थी।  पुराना मकान में उसे कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।  वह पुराना मकान में बंधा - बधा सा महसूस करती थी।  ऊपर से कई बच्चों के शोर भी उसे सुनना पड़ता था। मम्मी-पापा के साथ एक ही कमरा में उसे सोना बिल्कुल पसंद नहीं था।  अब तो नये मकान में उसके लिए एक अलग से कमरा मिल गया था। अब वह अपने कमरे में मन की कर सकती थी। खुले रूप से गा सकती थी। नाच सकती थी। गीत सुन सकती थी। जब मर्जी हुई तो पढ़ सकती थी।  नहीं मर्जी हुई तो नहीं पढ़ सकती थी।
श्रेया बी०कॉमर्स की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गई थी। वह अब एमबीए करना चाहती थी। श्रेया के पापा - मम्मी को जब यह जानकारी हुई कि उसकी बेटी बी०कॉमर्स की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गई है। दोनों बहुत ही खुश हुए थे। आकाश की आंखें भरभरा गई थी।
 यह देखकर रीता ने कहा,- 'आप बहुत भावुक हैं। यह पल तो खुशी की है। और आप आंसू बहा रहे हैं'।
यह सुनकर अकाश ने कहा,- 'नहीं रीता ! यह मेरी आंखों से बहते आंसू खुशी के हैं। मैं भी अपने जीवन में आगे पढ़ना चाहता था। पढ़कर कुछ बनना चाहता था। परंतु परिस्थिति ने ऐसा ना होने दिया था। आज मेरी बेटी श्रेया  बी० कॉमर्स की परीक्षा पास कर ली है। उसने मेरे अरमानों को पूरा किया है। यह मेरे अरमानों की खुशी के आंसू हैं'।
यह सुनकर श्रेया की मम्मी ने कहा,- आप बड़े भावुक हैं जी! आंसू पोछिए। आप आज सभी बच्चों के साथ किसी होटल में डिनर करवाइए'।
'क्यों नहीं? आज जरूर हम सब डिनर करेंगे'। आंखों से बहते आंसूओं को पोछते हुए आकाश ने कहा।
 तभी रीता ने कहा,- 'देखिए।  रीता देखते ही देखते कितनी बड़ी हो गई है। वह तो मुझसे भी लंबी हो गई है'। यह कहते-कहते रीता की आंखों में भी आंसू की बूंदें छलक पड़ी थी।
  हां । तुम ठीक बोल रही हो। श्रेया अब बड़ी हो चुकी है। बस, भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि जैसे श्रेया अच्छे अंको से पास हुई है। उसी प्रकार एक नंबर के लड़के से उसकी शादी हो जाए'। आकाश यह बात बड़े ही गंभीरता के साथ कहा था।
यह सुनकर रीता ने कहा,- 'आप बिल्कुल सही बोल रहे हैं। श्रेया से जब भी शादी विवाह की बातें करती हूं, हो तो वह इसे टाल जाती है। और बातों को बीच में ही काट डालती है।उसकी शादी की उम्र भी हो गई है। हम सब मध्यम वर्गीय परिवार से आते हैं। समय से शादी हो जाए। यही अच्छा रहेगा'।
 इस बात पर आकाश ने कहा,- 'जमशेदपुर में एक लड़का का पता चला है। वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। एक अच्छी सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत भी है। लड़का का परिवार हम लोगों की ही तरह है ।
 यह सुनते ही रीता के चेहरे में चमक आ गई। बीच में ही आकाश की बातें कर काटते हुए रीता ने कहा,- ' इतनी अच्छी बात अब तक आपने मुझसे छुपाए  रखा'।
   'मैं कोई भी बात तुमसे कभी छुपाई है भला। आज ही आदित्य का फोन आया था। शायद उसके ही किसी एक रिश्तेदार का वह लड़का है । अब श्रेया बी०कॉमर्स पास कर गई है। आदित्य से आगे बात करूंगा'।आकाश ने कहा।
    यह सुनकर रीता ने कहा,- 'आदित्य से आज ही क्यों नहीं बात कर लेते ? श्रेया बी० कॉमर्स पास कर ली है। यह खबर भी उन्हें दे दें'।
     रीता की बात सुनकर आकाश ने कहा,- 'तुम ठीक बोल रही हो। तुरंत आदित्य से बात कर लेता हूं'।
     अपनी बातें समाप्त कर अकाश ने अपने मोबाईल से आदित्य को श्रेया के बी०कॉमर्स पास होने की सूचना दिया। जमशेदपुर वाले लड़के के संबंध और भी विस्तृत से जानकारी लिया । साथ ही आकाश ने यह जानना चाहा कि श्रेया के लिए वह लड़का कैसा रहेगा ? आदित्य ने हर तरह से संतुष्ट किया कि श्रेया के लिए वह लड़का बहुत ही ठीक रहेगा। उस लड़के के संबंध में आकाश ने आदित्य से विस्तार से बात की। दोनों ने शीघ्र जमशेदपुर जाने का प्लान भी बना लिया।
     मोबाईल पर आकाश और आदित्य की बातें सुनकर रीता अंदर ही अंदर खुश हुई थी। साथ ही भगवान से भी प्रार्थना कर रही थी कि श्रेया के लिए यह रिश्ता पक्का हो जाए।
 होटल दीप में आकाश, रीता, श्रेया, सुशांत और प्रवीण डिनर कर ही रहे थे। तभी आकाश के मोबाईल पर आदित्य का एक व्हाट्सएप मैसेज आया। जब आकाश ने व्हाट्सएप ऑन किया तो व्हाट्सएप में आई तस्वीर और मैसेज पढ़ कर बहुत ही खुश हुआ। आकाश तस्वीर और मैसेज पढ़ कर तुरंत मोबाईल रीता को दे दिया था। रीता फोटो और मैसेज पढ़ कर बहुत खुश हुई थी। फिर उसने मोबाइल को श्रेया की ओर बढ़ा दिया। श्रेया चूंकि खाने में मशगूल थी। लेकिन मम्मी ने जब मोबाईल श्रेया के हाथों में थमा दिया तो उसे देखना ही पड़ा था। तस्वीर और मैसेज पढ़ श्रेया की आंखें झुक गई थी।
  श्रेया ने यह कहकर मोबाईल मां को वापस कर दिया,-'यह सब क्या है, मम्मी!
रीता ने कहा,- 'तुम जल्द ही समझ जाएगी बेटी।
 यह कहकर रीता ने आकाश से बात किए बिना आदित्य को फोन लगाकर कहा,- 'आदित्य" लड़का मुझे पसंद है। मैसेज में जो पता अंकित है। उससे प्रतीत होता है कि मैं लड़के के परिवार को जानती हूं'।
 उधर से आदित्य ने कहा,- 'यह तो बहुत अच्छी बात है, भाभी। जाना समझा परिवार में ही शादी होनी चाहिए'।
  यह सुनकर रीता ने पूछा,- 'जमशेदपुर जाने का प्रोग्राम कब बनाएंगे?
  आदित्य ने कहा,- 'यह तो आप लोगों पर निर्भर करता है'।
  आकाश समझ रहा था कि रीता किससे बातें कर रही थी। रीता को यह सब बातें  कहते सुनकर आकाश को अच्छा लग रहा था। श्रेया भी मां की बातों को समझ रही थी।  अनजान बनी, खाने में मशगूल थी।
डिनर के दूसरे ही दिन आकाश और आदित्य श्रेया के लिए लड़का देखने जमशेदपुर चले गए थे। दोनों को लड़का का परिवार पसंद आ गया । श्रेया की तस्वीर और बायोडाटा देखकर लड़के वाले बहुत प्रसन्न हुए। पंडित जी को बुलवाकर श्रेया और अभिनव की कुंडली मिलाई गई थी। श्रेया और अभिनव  की कुंडली 30 गुण बैठ था। 30 गुण बैठने की बात सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग खुश हो गए थे। अभिनव के पिता ने अगले सप्ताह लड़की देखने का समय दिया था।
 नियत समय पर लड़की देखने अभिनव के परिवार वाले आकाश के घर आ गए थे। श्रेया एक ही नजर में सबों को पसंद आ गई थी। पसंद कैसे ना होती, श्रेया थी ऐसी।
इसी क्रम में अभिनव के पिता ने आकाश की ओर मुखातिब होकर कहा,-  'दस दिनों के अंदर अभिनव बेंगलुरु से जमशेदपुर आ रहा है। हम लोगों को तो लड़की पूरी तरह पसंद है। एक बार लड़का, लड़की दोनों को एक दूसरे को देख लेतें तो बहुत बेहतर होता'।
 इस बात पर आकाश ने कहा,- 'आप बिल्कुल ठीक बोल रहे हैं। आप जहां बोलेंगे, मैं लड़की लेकर वहां आ जाऊंगा'।
  यह सुनकर अभिनव के पिता अरविंद लाल ने कहा, 'आकाश जी! लड़की लेकर कहीं यहां - वहां, आने - जाने की जरूरत नहीं है। बल्किअभिनव के संग हम सब आपके ही घर आ जाएंगे। ऐसे हमारे परिवार को लड़की तो पूरी तरह पसंद है। आज मॉडर्न टाइम है। लड़का, लड़की एक दूसरे को देख लेंगे, तो बहुत अच्छा रहेगा'।
   तब आकाश ने कहा,- 'हां ! हां ! आप बिल्कुल सही बोल रहे हैं'।
देखते ही देखते दस दिन भी बीत गए। अभिनव अपने मम्मी-पापा के साथ श्रेया के घर पहुंच चुके थे।
 श्रेया अपने कमरे में बिल्कुल शांत बैठी जरूर थी, किंतु मन मस्तिष्क में कई तरह के विचार चल और उठ रहे थे। अभिनव जैसा फोटो में दिख रहा है, वैसा है अथवा नहीं ? किस नेचर का लड़का होगा ? कॉलेज आते जाते समय राह से गुजरते कुछ मनचले लड़कों की हरकतों को याद कर आज भी श्रेया सहम जाती है।  कहीं अभिनव मनचले लड़कों की तरह ही तो नहीं है!  तभी उसे अभिनव के मम्मी - पापा की कुछ बातें याद आ गई थी। पहली बार जब अभिनव के पापा उसे देखने के लिए घर आए थे। तब उन्होंने अभिनव के संबंध में जितनी बातें बताई थी, उन बातों से तो दूर-दूर तक अभिनव में मनचले लड़कों वाली कोई बात नहीं थी। श्रेया जब इन्हीं विचारों में खोई हुई थी। तभी उसे यह भी ख्याल आया किअभिनव अच्छा लड़का जरूर होगा । तभी उसने सभी परीक्षाएं अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ था। जैसे ही यह ख्याल श्रेया के मन में प्रवेश किया। उसकी सभी दुश्चिंताएं दूर हो गई थी। चेहरे पर हल्की मुस्कान भी उभर आई थी।
  तभी जोर कदमों से चलते हुए रीता श्रेया के कमरों में प्रवेश की और उसकी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा,- 'तुम अभी तक तैयार भी नहीं हुई है? लड़का भी आया हुआ है।अरे श्रेया!  लड़का तो बहुत सुंदर है। पापा लड़के को देखकर बहुत खुश हैं'।
   मम्मी से ऐसी बातें सुनकर श्रेया बहुत खुश हो गई थी। वह मम्मो से कुछ कहती किंतु सवाल ही मुंह से नहीं फूटे थे।
    रीता ने श्रेया की चुप्पी पर कहा,- 'अरे जल्दी करो। चाय लेकर तुम्हें ही जाना है। वे सब तुम्हें ही देखने के लिए आए हुए हैं। तुम भी लड़का को देख लेना श्रेया'।
     मम्मी की बातें सुनकर बिना कोई सवाल किए श्रेया तैयार होने के लिए चल गई थी।
      श्रेया चाय लेकर जैसे ही हॉल में दाखिल हुई । हॉल के एक ओर सोफा पर अभिनव और उसके मम्मी-पापा  बैठे हुए थे।
      अभिनव अपने सपनों की राजकुमारी को जिस रूप में देखा था, श्रेया बिल्कुल उसी कल्पना के अनुरूप थी। अपनी कल्पना को मूर्त रूप में देखकर अभिनव अंदर से बहुत खुश हुआ था।
       इसी बीच दोनों परिवारों के बीच कई तरह की बातें हुई।  बीच-बीच में नजरें छुपा कर श्रेया ने भी कई बार अभिनव को देखा। अभिनव को देखकर श्रेया भी अंदर ही अंदर खुश थी।  अभिनव तो बिल्कुल तस्वीर के ही जैसा दिख रहा था। शांत, सहज, कम बोलने का अभिनव का यह अंदाज श्रेया को बहुत पसंद आया था।
        अभिनव और श्रेया दोनों ने अपने-अपने  पापा-मम्मी को पसंद के लिए हामी भर दिया था। दोनों की पसंद की बातें सुनकर दोनों परिवार के सदस्यगण काफी खुश हुए थे।
अभिनव और श्रेया का रिंग शिरोमणि कार्यक्रम बहुत ही धूमधाम के साथ संपन्न हुआ था।
श्रेया और अभिनव शीघ्र ही परिणय बंधन में भी बंद गए थे। श्रेया कुछ दिनों तक ससुराल में रहने के उपरांत अभिनव के साथ बेंगलुरु चली गई थी।
शादी तय हो जाने के बाद अभिनव के जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया था । पहले वह अपने बैचलर, बेरोजगार मित्रों के साथ एक ही मकान में रहता था। तब की जिंदगी कुछ और थी। वे जैसे रहें। कोई बोलने वाला नहीं था। और ना ही कोई डांटने वाला था । सभी आपस में बड़े ही हिल - मिलकर रहते थे।
शादी के पूर्व ही अभिनव ने अपने सभी साथियों से कहा,-  'तुम सब अब अपने-अपने  लिए रैन बसेरा का जल्दी ही जुगाड़ कर लो। अब मेरी शादी होने वाली है। अब तुम लोगों का मेरे यहां रहना संभव नहीं होगा। मैं यह मकान छोड़ने जा रहा हूं ।और नया मकान ढूंढ रहा हूं'।
यह बात सुनकर सभी दोस्तों को करंट लग गया था। अभिनव की शादी में अभी छ: महीने का वक्त था। दोस्तों ने सोचा छ: महीने में कहीं न कहीं कुछ बंदोबस्त जरूर हो जाएगा। यह संयोग ही था कि अभिनव की शादी के पूर्व भी उसके सभी दोस्तों की नौकरी विभिन्न निजी कंपनियों में लग गई थी। मित्रों की नौकरी लग जाने से अभिनव के माथे का बोझ उतर गया था। क्योंकि उसी के विश्वास पर सभी मित्र बेंगलुरु गए थे।
बेंगलुरु में अभिनय और श्रेया के दिन बहुत ही मजे के साथ बीत रहे थे । दोनों शादी के तुरंत बाद हनीमून के लिए मैसूर गए थे । एक सप्ताह तक दोनों मैसूर के एक थ्री स्टार होटल में  रुके थे। मैसूर में दोनों ने बहुत ही शानदार ढंग से हनीमून सेलेब्रेट किया था।
एक सप्ताह बाद दोनों बेंगलुरु लौटे थे। दोनों के बीच पति - पत्नी के साथ दोस्ताना का भी रिश्ता बन गया था।  परिणय बंधन में बंधने के पूर्व दोनों के बीच मोबाईल पर जमकर बातें होती थीं। कई - कई बार तो दोनों के बीच रात - रात भर बातें होती रहती थी । इस बातचीत के क्रम में ही दोनों के बीच दोस्ती का नया रिश्ता स्थापित हो गया था। शादी हो जाने के बाद भी दोनों के बीच दोस्ताना रिश्ता कायम रहा था।
रोज की तरह आज भी अभिनव ऑफिस से लौटा था।
 गुमसुम उदास श्रेया को देखकर अभिनव ने कहा,- 'तुम आज उदास क्यों हो? क्या तबीयत ठीक नहीं है'?
  अभिनव के प्रश्न का कोई उत्तर श्रेया ने नहीं दिया ।अभिनव ने श्रेया की उदासी के कारण जानने का हर संभव प्रयास किया, किंतु श्रेया टस से मस नहीं हुई थी। श्रेया की चुप्पी से अभिनव अंदर ही अंदर परेशान हो रहा था, किंतु अपनी परेशानी को चेहरे पर नहीं आने दे रहा था।  बेंगलुरु में अभिनव को श्रेया के अलावा और कोई भी रिश्तेदारना ना था। वह अपने मन की बात किससे करता। यह सोचते सोचते अभिनव को एक बात याद आ गई थी।
   उसने श्रेया से कहा,-  'तुम्हें हमारी दोस्ती की कसम है। तुम उदास क्यों हो? कोई मन में परेशानी है, तो बेझिझक कर डालो'।
श्रेया आपस की दोस्ती को टूटने नहीं देना चाहती थी।
 अपने मौन को तोड़ते हुए श्रेया ने कहा,- 'मैंने बौ०कॉमर्स तक पढ़ाई की है। आगे एमबीए कर आपके ही तरह नौकरी करना चाहती हूं'।
  यह सुनकर अभिनव ने कहा,-  'बस इतनी सी बात के लिए तुम उदास हो। एमबीए करने से मैंने कहां तुम्हें मना किया है?  अगर तुम्हें एमबीए करना है तो करो'।
  अभिनव की बातें सुनकर श्रेया बहुत खुश हुई ।
  तब उसने कहा,- 'ठीक है पतिदेव जी।
   श्रेया ने फोन से उसी समय यह खुशखबरी सबसे पहले अपनी मम्मी को दी थी।
    श्रेया ने कहा,- :मम्मी, मैं बेंगलुरु में ही एमबीए करूंगी। मैं तो डर रही थी कि अभिनव आगे पढ़ने की इजाजत देंगे कि  नहीं'।
     बेटी की बात सुनकर रीता ने कहा,- 'ठीक है बेटी, तुम खुब पढ़ो और जीवन में आगे बढ़ो'।
 अभिनव ने श्रेया का दाखिला एमबीए विश्वविद्यालय में करवा दिया था। श्रेया के कंधों पर अब दो तरह की जवाबदेही आ गई थी। पहला खुद की गृहस्थी संभालने का और दूसरी पढ़ाई की।
  धीरे - धीरे कर श्रेया घर के कामों से ध्यान हटाती चली जा रही थी।  इधर अभिनव दो - दो प्रमोशन पा लिया था। मासिक तनख्वाह में काफी वृद्धि हो गई थी। अभिनव ने घर में झाड़ू - पोछा और खाना बनाने के लिए एक-एक आया रख लिया था। अभिनव चाहता था कि श्रेया को पढ़ाई में कोई दिक्कत ना हो। अभिनव द्वारा इतना ध्यान देने के बावजूद भी श्रेया किसी ना किसी बात को लेकर हमेशा अभिनव से नाराज हो जाया करती थी। दोनों के बीच नाराजगियां बढ़ती गई थी। श्रेया कभी-कभी अभिनव से ऐसी बातें कर जाती थी, जिसकी कल्पना तक कभी अभिनव ने ना की थी।  एक ही पलंग में दोनों सोते थे। फिर भी रात - रात भर दोनों के बीच कोई बातचीत ना होती थी। यह किच - किच, पीच - पीच रोज की बात हो गई थी। सुबह दोनों एक - दूसरे को बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल जाते थे । अभिनव अपनी ओर से हर संभव प्रयास करता था कि श्रेया से कोई झंझट ना हो। अभिनव की तमाम कोशिशें निष्फल हो जाती थी। बात-बात पर श्रेया और अभिनव के बीच झगड़ा हो ही जाता था ।
  एक दिन सुबह जब अभिनव ऑफिस के लिए जा रहा था तभी श्रेया से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया था। दोनों के बीच बात इस हद तक बढ़ गई थी कि अभिनव ने हाथ ऊपर कर पीट देने की बात तक कह डाला था। अभिनव ने बहुत कोशिश की थी कि वह ऐसा ना करें, किंतु श्रेया की तीखी बातों ने उसे ऐसा करने पर विवश कर दिया था।
   श्रेया ने अभिनव के इन्हीं बातों का बतंगड़ बना दिया था। वह जोर-जोर से रोने लगी थी।
    उसने अभिनव को यहां तक धमकी दे डाला,- 'अब मैं बेंगलुरु में तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रहूंगी। रांची मम्मी पापा के पास चली जाऊंगी'।
    श्रेया की बातें सुनकर खिन्न मन से अभिनव ऑफिस चला गया था।
     अभिनव के ऑफिस जाने के बाद श्रेया ने रो-रोकर सारी बातें अपनी मम्मी से बोल दी थी।
श्रेया की बातें सुनकर रीता ने कहा,- 'बेटी, अभिनव तो तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा है। और ऊपर से हाथ उठा दिया है। यह सब अभिनव की हरकतें सुनकर बहुत दुख हो रहा है। कैसे परिवार में हम सब ने तुम्हें डाल दिया है?
 मम्मी की बातें सुनकर श्रेया ने कहा,- 'अब मम्मी, मैं अभिनव के साथ एक पल भी नहीं रहूंगी। मैं रांची आ रही हूं'।
 रीता ने कहा, :ठीक है बेटी, तुम रांची आ जाओ। यहीं से अभिनव को मजा चखा दूंगी। हम लोगों को अभिनव क्या समझ रखें है ? श्रेया की मम्मी - पापा अभी जिंदा है'।
यह वाक्य जैसे ही रीता पूरी की थी। श्रेया के पिता अरविंद लाल, रीता से मोबाइल लेकर खुद श्रेया से बातचीत करने लगे।
 श्रेया ने रो-रोकर सारी बातों से अपने पिता को अवगत कराया ।
 रोते-रोते श्रेया ने आगे कहा,- 'पापा मैं अब एक पल भी अभिनव के साथ नहीं रहूंगी। मैं रांची आ रही हूं ।आप लोगों के साथ रहूंगी'।
यह सुनकर अरविंद लाल ने कहा, -  'ठीक है, बेटी तुम अभिनव के साथ मत रहो। पर एक भी कोई ठोस कारण बताओ कि अभिनव की क्या गलती है '?
पिता के इस बात पर श्रेया चुप्पी साध ली थी।  और रोए जा रही थी।
फिर चुप्पी तोड़ते हुए श्रेया ने कहा, - 'अभिनव बहुत बुरे हैं '।
यह सुनकर अरविंद लाल ने कहा,- 'मैं कहां कह रहा हूं कि अभिनव बुरा नहीं है, किंतु तुम उसकी एक बुराई तो बताओ । क्या अभिनव तुम्हारा ख्याल ठीक से नहीं रखता है? क्या नशा करता है '? क्या ऑफिस से लेट आता है '?
 पिता की सारी बातों को इग्नोर करते हुए श्रेया सिर्फ रोती ही चली जा रही थी।
तब अरविंद लाल ने कहा,- 'बेटी जब से तुम दोनों के बीच खटपट चल रहा है। हर रोज की जानकारी अभिनव मुझे देता आ रहा है। तुम्हारे आराम और पढ़ने के लिए जो व्यवस्था अभिनव ने कर रखी है। शायद उस तरह की व्यवस्था मैंने भी तुमको नहीं दिया था। अभिनव की समझदारी देखो। उसने मुझे अपने घर वालों को यह बात ना बताने की कसम दे दी है। उनके मम्मी पापा जानेंगे तो बेहद दुखी होंगे।  इतनी ऊंची सोच रखने वाला अभिनव गलत कैसे हो सकता है? रही बात तुम दोनों के बीच की तो इससे तुम दोनों को भी ठीक करना होगा । क्या किसी बात को लेकर तेरी मम्मी और मुझमें झगड़े नहीं होते थे। क्या मम्मी अथवा मैं कहीं भाग कर चले गए थे। हम दोनों के झगड़े को तुम कई बार देख चुकी हो। एक-दो दिन में सब नॉर्मल हो जाता है । रही बात तुम्हारे यहां आने की तो जब भी मन करे यहां आ जाओ।  पर मेरी एक शर्त है।  रिश्ता तोड़ कर नहीं बल्कि रिश्ता जोड़ कर।  अगर तुम रिश्ता तोड़ कर यहां आ भी जाती हो और तुम्हारी दूसरी जगह फिर से शादी भी कर देता हूं। तब क्या गारंटी है कि वह लड़का अभिनव से अच्छा होगा।  अगर बुरा हुआ तो क्या उसे भी छोड़कर फिर मेरे पास आ जाएगी। इसलिए बेटी यह तुम्हारा जीवन है। तुम्हारी खुशी के साथ दो परिवारों की खुशियां जुड़ी है। तुम दोनों को ही एडजस्ट करके रहना है। तुम दोनों का परिवार हजारों में दूर रहते है। हर पल तुम दोनों के लिए हम सब ईश्वर से दुआ करते रहते हैं । इतने दिनों में मैं अभिनव को भलीभांति जान चुका हूं । अगर वह बुरा लड़का होता तो मुझे ये बातें ना बताता। आज से पूर्व मैंने भी इन सब बातों की चर्चा तुमसे इसलिए नहीं की थी कि तुम दोनों पति-पत्नी का मामला है। एडजस्ट कर ही लोगे। किंतु आज तुम्हारी हरकतों ने सभी सीमाओं को लांग दिया।  इसलिए मजबूरी में  मुझे इतना कुछ कहना पड़ा है। अगर इसके बाद भी अभिनव को छोड़ कर तुम आना चाहती हो तो आ जाओ। ठीक है बेटी'।
यह कहकर अरविंद ने मोबाईल बंद कर दिया था।
रीता बहुत ही गंभीरता से अरविंद की बातों को सुन रही थी। रीता को भी अपनी गलती का एहसास हो रहा था।  बेटी की भावना में बहकर मैंने उसकी ही जिंदगी उजाड़ने चली थी।
 यह सोचते हुए रीता ने कहा,- 'आपने बिल्कुल सही कहा। मैं बेटी की भावना में बहकर बड़ी भूल करती जा रही थी'।
  अरविंद लाल ने कहा,- 'इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। इस तरह की भूल हर मां से होती रहती है।  खैर! तुम्हें जल्द ही बात समझ में आ गई '।
श्रेया पर पिता की बातों का बहुत ही गहरा असर हुआ था। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था । खेल-खेल में उसने खुद की ही गृहस्थी  में आग लगा दी थी। मन में एक डर भी समा गया था कि अभिनव को छोड़कर मायके चली जाती तो सचमुच अभिनव से तलाक हो जाता। पापा-मम्मी कहीं ना कहीं मेरी शादी करी देंगे। अगर उसके साथ भी यही करती रही तो फिर गृहस्थी टूटेगी। जबकि अभिनव उसका इतना ख्याल रखता है । वह सिर्फ हंसने मुस्कुराकर ही रहने की बात कहता है। कहां किसी बात को लेकर जिद करता है। मैंने ही अपनी जिद पूरी करने के लिए उसे परेशान करती रहती हूं। श्रेया को अपनी गलतियों का एहसास होने लगा था।अब वह मन बना ली थी कि अपनी गलती के लिए अभिनव से माफी मांग लेंगे। जब वह माफी मांगने की बात सोच ही रही थी कि अभिनव घर में दस्तक दे दिया था।
अभिनव को देखते ही श्रेया ने कहा,- 'अभिनव तुम मुझसे बहुत नाराज हो। मैंने बहुत बड़ी गलती की है। अपने ही हाथों अपनी गृहस्थी बर्बाद करने चली थी। तुम मुझे माफ कर दो।
 यह सुनकर अभिनव ने कहा,- 'सुबह मुझे भी ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए थी। शायद मैंने कुछ ज्यादा ही कहकर घर से निकल गया था। तुम भी मुझे माफ कर दो'।
यह कहते - सुनते श्रेया और अभिनव की आंखें भरभरा गई थी। दोनों एक दूसरे से लिपट गए थे। इसी पल श्रेया ने मन ही मन संकल्प ले ली थीं कि अब दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगी। एडजस्ट कर अपनी गृहस्थी चलाएंगी।

 विजय केसरी,
  (कथाकार / स्तंभकार),
   पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301, मोबाइल नंबर - 92347 99550,

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...