शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कोई है जिसे हमारे शब्द छूते हैं / प्रज्ञा रोहिणी




लेखन में एक ही गहरा सन्तोष मिलता है कि कोई है जिसे हमारे शब्द छू रहे हैं। वो समय और हमें हमारी ही तरह महसूस कर रहा है । और इस तरह अपनी  दुनिया न सिर्फ बड़ी लगती है बल्कि लगातार अकेले कर दिए जाने वाले इस निर्मम समय में हम किसी को साथ खड़ा पाते हैं। लगता है समय की हिमशिलायें पिघलकर नदी होंगी। शुक्रिया हफ़ीज़ भाई।

कहानियों में संसार
 इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में जिन तरक़्क़ी याफ़्ता और मुखतलिफ़ मौज़ुआत (विषय) पर लिखने वाली महिला साहित्यकारों के नाम ज़हन में उभरते हैं उन में प्रज्ञा रोहिणी का नाम सरे फेहरिस्त (टॉप लिसटेड) है । प्रज्ञा रोहिणी आज हमारे दौर की एक अहम कहानीकार हैं । इन की ज़्यादतर कहानियाँ घरेलू और समाजी ताने बने से तयार होती हैं । बल्कि अर्थव्यवस्था , सांप्रदायिकता और समसामयिक विषयों पर लिख कर प्रज्ञा रोहिणी नें अपने को फ़ेमिनिस्म का ठप्पा लाग्ने से बचा लिया , जिस की वजह से फ़िकशन पढ़ने वाले हर हलक़े और तबक़े में उनका इस्तिक़बाल (स्वागत) किया गया ।
 ज़मीनी रिश्तों से ताल्लुक़ रखने वाले साहित्यकार उन साहित्यकारों से ज़्यादा अहमियत रखते हैं जो ड्राइंग रूम में बैठ कर मीडिया और मुखतलिफ़ ज़राए से हासिल शुदा मवाद पर साहित्य का क़िला तामीर करते हैं, ऐसी चीज़ों को “रचना” तो कह सकते हैं लेकिन रचनात्मक नहीं । इस के विरुद्ध प्रज्ञा जी पेशे से एक शिक्षक हैं और यह एक ऐसा पेशा है कि जिस से ताल्लुक़ रखने वाले को समाज के हर तबक़े के फ़र्द से सामना रहता है। और जिस से हर फ़र्द अपनी ज़ाहिरी (खुली) और बतिनी (छुपी) कुछ बातों को खुले या बंद लफ़्ज़ों में बयान ज़रूर करता है । और फिर अगर वह शिक्षक हस्सास और साहित्यकार भी हो तो वह चीज़ें उस के लेखन पर अपना असर ज़रूर डालती हैं । और शायद यही वजह बनी जिस ने प्रज्ञा रोहिणी को फ़ेमिनिन साहित्यकारों में ऊपर उठा दिया ।
 28 अप्रैल 1971 को दिल्ली में जन्मी प्रज्ञा रोहिणी को यूँ तो साहित्य विरासत में मिला है आप के पिता श्री रमेश उपाध्याय जी एक परतिष्ठित साहित्यकार व आलोचक हैं । इसी साहित्यतिक माहौल की वजह से प्रज्ञा जी ने जब आला तालीम (हाई एजुकेशन) के बाद तहक़ीक़ (रिसर्च) के मैदान का रुख़ किया तो अपने लिए हिन्दी साहित्य में “नुक्कड़ नाटक : रचना और प्रस्तुति” को अपना विषय बनाया । और यह काम 2006 में मुकम्मल किया और फिर इस के बाद कहानी लेखन की तरफ़ मुतावज्जह हुईं और पहली कहानी “मुखौटे” (कहानी संग्रह “तक़सीम” मे सम्मिलित) शीर्षक के साथ “परिकथा” के माध्यम से 2011 में पाठकों के हवाले करने के बाद से प्रज्ञा जी का क़लम अब तक दो कहानी संग्रह “तक़सीम”(2016), “मन्नत टेलर्स”(2019), और दो उपन्यास “गूदड़ बस्ती”(2017), “धर्मपुर लॉज”(2020) साहित्य के महारथयों और आलोचकों से दाद (प्रशंसा) हासिल कर चुका है ।
 प्रज्ञा जी कहानी की मक़्बूलियत के अहम हुनर यानी “कथा भाषा” से बा-ख़ूबी वाकिफ हैं इसी लिए वह हर कहानी और किरदार के मुताबिक़ ही ज़बान का इस्तेमाल करती हैं बल्कि अक्सर ख़ुद उन किरदारों में ढल कर कहानी रचती हैं जिस की वजह से कहानी में कहीं लोच नहीं आता और कहानी खूबसूरती से अपने अंजाम को पहुँचती है । और क़ारी (पाठक) कहानी को कहानी समझते हुए भी उसके हर किरदार से सही सही बरताओ करने पर मजबूर होता है । इन की कहानियों में अगर एक तरफ़ माज़ी (भूतकाल) की चमकदार तस्वीरें हैं तो मुस्तकबिल (भविष्य) के रौशन मनाज़िर भी हैं । अगर एक तरफ़ गिरती हुई इंसानियत का रोना है तो दूसरी तरफ़ उम्मीद की किरण भी । अगर एक तरफ़ जिहालत का अंधेरा है तो दूसरी तरफ़ इल्म का नूर भी । अगर एक तरफ़ “तक़सीम” है तो दूसरी तरफ़ मन्नत “टेलर्स” भी । मतलब हमारा साहित्यकार मायूस नहीं है बल्कि सुबह की पहली किरण के मानिंद बाहौसला और पुर-उम्मीद है , और यही सबक़ वह हम को भी देता है । प्रज्ञा जी का सफर अपने पूरे आब-व-ताब के साथ जारी है और सकारात्मक साहित्य के पाठकों को भी प्रज्ञा जी से भविष्य मे अच्छी कहानियों की उम्मीद है ।
हाफ़ीज़ बिन अज़ीज़, कानपुर

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