राधास्वामी सतसंग शाम 012/02

 **राधास्वामी!! 12-01-2021- आज शाम सतसँग में पढे गये पाठ:-                                    

 (1) सुरतिया उमँग उमँग। गुरु आरत करत सम्हार।।-

(राधास्वामी महिमा हिये बसावत। संसय भरम सब दूर निकार।।)

(प्रेमबानी-4-शब्द-4-पृ.सं.106,107)                                                             

(2) गुरु की सरन सम्हालो। औसर न बार बारी।।टेक।।

 ऐ यार टुक तो चेतो। क्यों गहरी नींद सोवो।

आँखे जरा तो खोलो। गौ की कहूँ तुम्हारी।।-

( अगर वह धार अगर न वाँ है। खाली जिस्म बेजाँ है।।

क्यों उससे फिरक्षगुमाँ है। मुश्किल हो हल तुम्हारी।।)

( प्रेमबिलास-शब्द-5-पृ.सं.5,6) 

                                 

(3) यथार्थ प्रकाश-भाग दूसरा

 -कल सै आगे।              

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


**राधास्वामी!!-12- 02- 2021

आज शाम सतसंग में पढा गया बचन-

कल से आगे:-


 [चार जन्म]-

 ( 153)-

 प्रश्न- सारबचन में लिखा है- "एक जन्म गुरु भक्ति कर, जन्म दूसरे नाम। जन्म तीसरे मुक्ति पद ,चौथे में निजधाम"। आक्षेप कहता है कि इस जन्म में तो आपने धोखा देकर लोगों से अपनी भक्ति करा ली। दूसरे जन्म में भी बेचारे कैसे शिकायत करने आवेंगे कि उन्हें भक्ति का फल नहीं मिला। यह निरा स्वार्थ है। और यदि नाम दूसरे जन्म में मिलता है तो आप इस जन्म में नाम का उपदेश क्यों देते हैं ? और यह भी समझ में नहीं आता कि जब तीसरे जन्म में मुक्तिपद मिल गया तो चौथी के लिए निजी धाम कौन सा शेष रह गया इस प्रकार तो कोई व्यक्ति है भी कह सकता है कि निजधाम से आगे भी कोई पद है।                                               उत्तर- जब किसी व्यक्ति को महान पुरुषों के बचन समझने की बुद्धि किंचिन्मात्र भी ना हो और वह अपने आपको बड़ा पंडित समझे, और महापुरुषों के बचनों पर बुद्धि लडावे तो सिवाय इस प्रकार के आक्षेपों के उसके मस्तिष्क से दूसरी बातें कैसे उतर सकती हैं?  राधास्वामी मत में सच्चे मालिक के चरणो में पहुंचने या सच्चे मालिक से मिलने की चार दर्जे या मंजिले निर्धारित की गई है । पहली मंजिल सतगुरु के चरणों में सच्चा अनुराग उत्पन्न करना और अनुराग के द्वारा संसार के मोटे बंधनों से मुक्त होना है। दूसरी मंजिल सुरत का शब्द से अंतर में जोड़ना और झीने बंधनों से मुक्ति पाकर ऊँचे आध्यात्मिक मंडलों में गति की शक्ति प्राप्त करना है। तीसरी मंजिल मुक्तिपद अर्थात ब्रह्मांड की चोटी के स्थान में जिसको सुन्न और परब्रह्मपद भी कहते हैं, पहुँचना है ( सुन्न पद से निर्मल चेतन मंडल आरंभ होता है)। और चौथी मंजिल के निजधाम अर्थात निर्मल चेतन मंडल की चोटी के स्थान पर पहुँचना है। अत: जो कड़ी आक्षेपक ने यहाँ उपस्थित की है उससे अगली कड़ी में फरमाया है:-  

                                                         

मोटे बंधन जगत के गुरु भक्ति से काट। झीने बंधन चित्त के कटें नाम परताप।।                                                   

 और यह आवश्यक नहीं कि किसी व्यक्ति को एक मंजिल तय करने के लिए एक पूरा मनुष्य जन्म खर्च करना पड़ता है।। प्रेमी परमार्थी एक ही जन्म में एक से अधिक मंजिलें तय कर सकता है।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻

 यथार्थ प्रकाश- भाग दूसरा -

परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**


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