जानकी वल्ल्भ शास्त्री

 कल माघ शुक्ल पक्ष की  द्वितीया तिथि थी,   आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का  जन्मदिन, जिसे वे बहुत धूमधाम से मनाते थे। 

 

मुजफ्फरपुर प्रवास के दौरान कई बार उनसे लंबी अनौपचारिक बातचीत हुई  थी। 95 वर्ष की उम्र में भी उनकी स्मृतियां   ताजी थीं। कहीं कोई कठिनाई होती है तो अपनी  धर्मपत्नी छाया देवी की ओर मुखातिब होकर पूछ बैठते  - उनका क्या नाम था बडे़ भाई या क्या हुआ था बड़े भाई (वे अपनी पत्नी को बड़े भाई या बहूजी कह कर बुलाते हैं)। और, इस अर्थ में वे सच में उनकी अर्द्धांगिनी थीं - समझ जाती  हैं कि वे किसको या किस संदर्भ को याद करना चाह रहे हैं।  निजी जीवन के संबंध में मेरे कुछ प्रश्नों को सुनकर वे कहतीं इसका उत्तर इन्होंने अपनी अमुक पुस्तक में दिया है जिस पर शास्त्रीजी भी हामी भरतें लेकिन उसे बताने भी लगते । मैं आकर उउस किताब के पन्नों को पलटता तो बातें सोलह आने सत्य,  कहीं कोई अंतर नहीं। 


2010 में यह बातचीत कई  पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई  थी।  


यह मंदिर किनका है ? 


मेरे पिता का ‎। वे मेरे आराध्य हैें ‎। उनके संयम और तप की जीवनशैली ने मुझे अनुशासित और शिक्षित किया  ‎।  मैें हमेशा उन्हें अपने साथ मानता हूं इसीलिए  उनका मंदिर बनवा रखा है। आपने कहीं और पिता का मंदिर देखा है ? 


इस मंदिर का मुख दक्षिण की ओर क्यों ? 


मेरे पिता जब पहली बार यहाँ आए तो इसी जगह इसी तरह बैठे थे ‎। जब वे नहीं रहे तो मैंने उनकी स्मृति में  यह मंदिर बनवाया उसी तरह मूर्तिें बनवाई जैसे और जिस अवस्था में वे उस दिन बैठे थे। 

छाया देवी - यही नहीं जब हमने यह घर बनवाया तो यह तय किया कि  इसका मुख ठीक मंदिर के सामने हो ताकि सुबह में दरवाजा खोलते ही पिताजी के दर्शन हो जाएं ‎। दक्षिण की ओर मुख करने का एक कारण और भी था कि इस जगह से गंगा दक्षिण की ओर है ‎। 

मेरी माँ की मृत्यु के बाद मेरे पिता ने मेरी खातिर दूसरा विवाह नहीं किया और बहुत कठिनाई से मुझे पाला। माँ की कमी महसूस होने देना नहीं चाहते थे ‎। 


लेकिन आपने तो उनके इस रुप की चर्चा कम की है उनकी प्रताड़नाओं को हमेशा याद किया है ? 


जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत पीटते थे । पीटते समय माँ की करुण-मसृण-कातर दृष्टि भूल जाते थे और तदगतेन मनसा पीटते थे। उन्होने मुझे इतना और इतनी निर्दयता से पीटा, जेठ की दुपहरी में सुरहर नदी (गांव की नदी)  की जलती रेत पर टांग पकड़ कर घसीटा, कांटो से उलझते शरीर पर क्रोधित दृष्टि भी न डाली, पानी में डुबो-डुबो कर प्रतिज्ञा करवाई ‎। यही कारण है   कि लंबे समय तक वे मेरे लिए मान्य और श्रद्धेय तो बने रहे लेकिन मैें उन्हें अपने प्राणों का प्यार अर्र्पित न कर सका‎ ।  


आप अपने पिता से बहुत नाराज थे ?


उनके सीमाहीन क्रोध से दुखी था ‎। क्रोध को क्षमा द्वारा निरस्त करने में वे अक्षम थे ‎।  मैं जब काशी में पढ़ता था तो एक बार बीमार हो गया ‎ । अस्पताल से पिताजी को एक पत्र लिखा जिसमें एक वाक्य था - किमपराद्धं मया, जात्वपि न स्म्रिये यत ? आत्मनेपदी-परस्मैपदी रुप के चक्कर स्म्रिये क्रिया का गलत प्रयोग हो गया  ।  पिताजी को यह गलती खटक गई   और उन्होंने जो पत्र भेजा उसमें मेरा हाल-चाल नहीं पूछा, दुख-तकलीफ के संबंध में नहीं पूछा केवल लिखा - स्मारं-स्मारं वाग्ब्रह्म-विस्मृतिन्ते दावानलज्वालाकुले महारण्ये मोमुह्यते मन्मन: ‎। केन पुन: स्मरिष्यसे । मेरे पिता की लौकिक प्रज्ञा धर्म और अर्थ का अनुवर्तन करती थी और अलौकिक प्रज्ञा शास्त्रों का ‎। मेरे पिता अलौकिक प्रज्ञा के पीछे शास्त्रों को रखकर लोक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहते थे  ‎। जब कि मैं मानता हूं कि जीवन को गढ़ने के लिए शास्त्रों का निर्माण किया गया है ‎। शास्त्रों को गढ़ने के लिए जीवन नहीं बनाए गए हैं ‎। जीवन शास्त्र  से अत्यधिक मूल्यवान हैं ‎। 


आपके पिताजी भी इस तथ्य से अवगत रहे होंगे ?


असल में मेरे पिता का उद्देश्य महान और पवित्र था लेकिन साधन कुत्सित और क्रूर ‎। कहें तो उनमें रौद्रवात्सल्य था । मेरे पिता मेरे लिए व्याघ्र मुख गौ थे ‎। वे चाहते थे कि उनके पुत्र को कोई पांडित्य में या आचार-विचार में गलत सिद्ध  न कर सके । मैं बचपन में अच्छा विद्यार्थी नहीं था ऊपर से क का उच्चारण त करता था यह उनके क्रोध को और बढ़ा देता था ‎।

उनके उग्र क्रोध के कारण करीब दस वर्ष की उम्र  में मैंने घर छोड़ने का निर्णय ले लिया। मेरे इस निर्णय से वे बहुत दुखी हुए। फफक कर रोने लगे, दिन-दुनिया की बातें बताने लगे और फिर कभी नहीं पीटने का वचन देने लगे। एक समय तो ऐसा आया कि मैं भी अपने निर्णय से विचलित होने लगा लेकिन मुझे निराला के भक्त ध्रुव ने अडिग रखा । 


ध्रुव ने कैसे ?


यही बात निराला ने भी पूछी थी जब मैंने उन्हें बताया था कि ध्रुव से मेरा जीवन प्रभावित हुआ है ?


और आपका जबाव क्या था ?


ध्रुव को उनकी माँ बहुत मानती थी। लेकिन एक समय ऐसा आया था कि उन्हें उसी माँ को भूल कर तपस्या के लिए निर्जन वन में जाना पड़ा  था। 


आपकी कविता का मुख्य स्वर करुणा  है?


जब मैं चार वर्ष का था तो मेरी मां को हैजा हुआ था ‎। उनके अंतिम संस्कार से पूर्व ताई मुझे और मेरी बहन को लेकर चंडी मंडप गई थीं हम दोनों को देवी की गोद में डाल कर तरह-तरह की भिक्षाएं मांगी थीं लेकिन देवी थीं कि निर्विकार ही बनी रहीं और मेरी माँ मुझे सोया छोड़कर पहली  बार बिना पुकारे, बिना दुलारे, बिना चूमे, बिना आशीर्वाद दिए चुपचाप श्मशान चलीं गईं‎। वे श्मशान गई या श्मशान मेरे घर चला आया नहीं कह सकता इसे उसी रोज की तरह रोज-रोज बिसूरते मुझे देखने वाले घर आंगन से पूछा जा सकता है ‎। 

माँ का अभाव मेरे जीवन का वह अभाव है जिससे मेरी प्रत्येक भावना ओत-प्रोत है ‎। इसीलिए मेरे जीवन काव्य का प्रधान रस करुण है ‎। मैंने काव्य की सी सहजता में अपने जीवन को नहीं ढाल सका माँ के नहीं होने के कारण बचपन से ही मुझे हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा ‎। आत्म-निर्माण करना पड़ा ‎। और अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि आत्म-निर्माण काव्य निर्माण से ज्यादा कठिन कर्म है ‎। 


और आपकी कविताओं में जहां  निराशा के स्वर आए हैं वह भी इसी कारण से ?


हां, क्योंकि मैें अपने जीवन से ही अपनी कविता को अनुप्रेरित मानता हूँ और  मेरे जीवन में दुख का कुहरा इतना सघन रहा कि उसकी छाया से मैें  अपने काव्य  को बचा नहीं पाया ‎। लेकिन यह भी सच है कि निराशा को मैंने कभी शक्ति के रुप में स्वीकार नहीं किया है ‎। 


अतीत के प्रति यह आग्रह क्या  विकास में बाधक नहीं बनते ?

जो अतीत किसी भी मूल्य पर लौटाया नहीं जा सकता उसे भूल जाना ही व्यवहारिकता होती है ‎ किंतु मेरे अतीत के मंदिर में मेरी माँ की मूर्ति बंद है उसे कैसे भूलूँ, उसका आकर्षण कैसे छोडूँ ‎। मैंने  अपने को क्षणभर के लिए भी कभी नहीं छोड़ा ‎। वह अपनी सभी दुर्बलताओं के साथ मेरे सबसे निकट रहा है ‎। उसे मैंने अपने हाथों से बनाया -बिगाड़ा है ‎। इसीलिए मैंने अपने आशा-निराशा, ध्वंस-निर्माण, और जीवन-मरण के अनुभव को अपनी कविताओं में वैसे ही प्रतिफलित होने दिया  और इसे ही अपनी काव्य-कला मानता हूँ ‎। किसको निस्सार, किसको निष्फल लगती है इसकी चिन्ता कभी नहीं करता ‎। 


लेकिन आज कविता स्वांत सुखाय तो लिखी नहीं जाती ? 


कला जीवन-सौंदर्य का प्रतीक समझी जाती है ‎ किन्तु जीवन की विरुपता और कुरुपता को भी उसे अपनाना पड़ता है क्योंकि वे जीवन के अस्तित्व से बाहर नहीं हैं ‎। जीवन है तो हर्ष-विषाद है, उत्थान-पतन है और इसका एक पक्ष आदर्श है तो दूसरा यथार्थ इन दोनों के बीच सामंजस्य  स्थापित करना होता है यह दुष्कर कार्य है ‎।  जो कलाकार केवल रुप-सौंदर्य की बात करते हैं उनकी रचना जगत से कट जाती है । 


और यह दुष्कर कार्य करने का गुण आपमें प्रचुरता से है ? 


हां, और मुझे यह गुण मेरी माँ से मिले ‎। मेरी माँ दुनिया के हर जीव के प्रति उदार थी ‎। एक बार पड़ोस की स्त्रियों ने समझाया देवी बड़ी जाग्रत होती हैं जो कोई उन्हें बलि नहीं देता उसकी बलि वह अपने आप ले लेती हैं ‎ तो मेरी माँ ने कहा - मैं अपनी ही बलि दूंगी ‎। और, देवी देवताओं  की अहर्निश आराधना करने वाली मेरी माँ अकाल काल-कवलित हो गई थी ‎।


और शायद इसीलिए धर्म-कर्म के प्रति एक हद तक आप उदासीन रहे ?


वेद-वेदान्त पढ़ने के बाद भी मेरी सहज बुद्धि ने मुझे संकरी गलियों में नहीं भटकाया ‎। मैंने न कभी मंत्र जपा, न विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की ‎। संध्यापूजन की तो बात ही दूर है ‎। मेरे कुल गोत्र के लगभग सभी लोग गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित थे लेकिन मैनें किसी भी  प्रकार की सांप्रदायिक दीक्षा लेने से साफ इंकार कर दिया था ‎। शायद अपने कुल का मैं पहला धर्म विप्लवी हूँ ‎। 


देवी ने आपकी पहली प्रार्थना अनसुनी कर दी थी यह भी कारण हो सकता है ?


हो सकता है ‎। दुख न हो तो आदमी ईश्वर की कल्पना भी न करे । कोई देवताओं से क्या मांगे, समय-समय पर दुर्भाग्य के शिकार वे स्वयं हो जाते हैं ‎। कोई तारक, कोई रावण उनके भी छक्के छुड़ा देता है ‎। मेरे जन्म से पहले दो बहनों और एक भाई की मृत्यु हो गई थी ‎। मेरी माँ  ने काफी तपस्या की थी मेरे लिए, मुझे किसी भी स्थिति में जीवित देखना चाहती थी ‎। शायद इसीलिए मेरी नाक छेदी गई, चमारिन के हाथों बेच कर उसकी अमानत की तरह पाला-पोसा गया लेकिन मेरा जीना वे कहाँ देख पाईं ‎। हाँ इससे मुझे यह सीख जरुर मिली कि  इसके मूल में सामाजिक सदभाव की पृष्ठभूमि  है ‎।  रुढ़िया विकृत होती हैं किन्तु जन्म के समय चमारिन और मृत्यु के बाद डोम की  उपस्थिति के मूल में वर्णाश्रम धर्म की हजारों वर्षों तक कायम और जिन्दा रखने वाले ज्ञानमूलक साम्यवाद का हाथ अवश्य  रहा है ‎ ।

जब मेरा जन्म हुआ तो संभव है कि स्वर्गलोक में दुदुंभी बजाई गई हो कि मिट्टी के माधो को मिट्टी पर भेज दिया गया ताकि वह वहीं मिट्टी में मिल जाए। यहां मेरे घर में पीतल की थाली बजाई गई और सूप पीटा गया, सब हँसे, खुश हुए लेकिन रोया केवल मै अकेला था वह भी कलेजा फाड़कर ‎। और अकेले-अकेले रोना का काम मैं तभी से कर रहा हूँं ‎। दुनिया को दुख दिखाने या बताने से क्या फायदा ? दुनिया में सबको तरह-तरह के दुख सहने पड़ते हैं मुझे भी सहने पड़े  यह अलग बात है कि नयन जल ने  मेरा आत्म-तेज निखारा ‎।  


कुछ आलोचक आपकेा छायावादी, कुछ उत्तर छायावादी और कुछ स्वच्छंदतावादी कवि मानते हैं ? आप स्वयं को किस वाद से जुड़ा हुआ मानते हैं ? 


वाद का विवाद मुझे कभी नहीं भाया ‎। मैं आदर्श और यथार्थ के चक्कर में भी कभी नहीं पड़ा ‎। हां मेरे जीवन के जो द्वन्द रहे, जीवन के जो यथार्थ रहे जिनका साक्षात्कार मैं करता रहा वे मेरी कविताओं में जरुर आए ‎। 


निराला के संपर्क में कैसे आए ?


मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या विभाग का छात्र था, उम्र थी 18 वर्ष की,  रुइया होस्टल में रहता था ‎। मेरी कुछ कविताएं प्रकाशित हो चुकी थीं । सुधा के सम्पादकीय में कालिदास की कला पर निराला की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई जिसकी भाषा में लालित्य था किंतु उक्तियों में तीखापन ‎। मैंने तिलमिलाकर उसका प्रतिवाद लिख भेजा निराला ने उसी में मेरा नाम पहली बार देखा और आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के साथ मेरे हास्टल में मिलने आ गए ‎। चार सीटों वाले उस कमरे में एक चौकी पर चटाई डालकर मैं अधलेटा-सा चने खा रहा था ‎। दोनों में से किसी को पहचानता नहीं था । किसी ने कहा - आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ‎। मैं चकित-चमत्कृत छायावाद के प्रथम समर्थक आलोचक को देखकर ‎। तभी दूसरे कोने में खड़े पहाड़ से व्यक्ति पर निगाह गई सिर छत से कुछ ही नीचे था उन्होंने अंग्रेजी में पूछा कि क्या मैं ही जानकी वल्लभ शास्त्री हूँ । मेरे हामी भरते ही उन्होंने दूसरा प्रश्न किया  अभी मैं क्या कर रहा था,  मैंने कहा जलपान ‎। चना खाते उन्होंने मुझे देखा तो था ही सनसनाते हुए कहा जलपान क्या सत्तू घोला होगा ‎ । मैंने फटी आंखेंा से पूछा -आप कहीं निराला तो नहीं ? वाजपेयीजी ने सकारात्मक सूचना दी मैंने कहा तभी और  उनके चरणों में झुक गया लेकिन उन्होंने अधबीच में ही मुझे अपनी  बाहों में भर लिया ‎। मैं परेशान - आधुनिक हिन्दी कविता का प्रतीक पुरुष जो दकियानूसों की आँखों की किरकिरी हैं जिनका काव्यामृत उनके आलोचकों को जहर से ज्यादा तीखा लगता है किन्तु नया जमाना जिसका कायल है वह खुद चलकर मुझसे मिलने क्यों आए ‎। उन्होंने कहा अभी हम डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल के घर जाएंगे कोई अड़चन न हो आप भी चलिए ‎। और मैंने बिना कुछ सोचे अपना एकमात्र कुरता गले में डाल लिया ‎। ऐसे  हुई हमारी पहली मुलाकात ‎ । 

बनारस में सन्त साहित्य के समीक्षक थे डा. बड़थ्वाल हिन्दी में पहली बार उन्होंने ही शोध किया था। निराला और निराला का साहित्य दोनों को वह बहुत स्नेह देते थे उन्हीं के बंगले पर उसदिन जलपान के बीच निराला ने  न केवल अपने गीत सुनाए बल्कि उसके शिल्प की जो व्याख्या की  उससे मुझे  एक नई दृष्टि मिली । 

काव्य-पाठ के समय मन्द्र धैवत और कभी निषाद तक उनका स्वर उतरता, आँखें  अर्द्धनिमीलित सी हो जाती। गीत ही नहीं मुक्तवृत पढ़ते समय भी उनका जो स्वर-समारोह और अंग-भंगिमा थी उसकी अनुकृति असंभव है। काव्य-पाठ करते समय उनके प्रदीप्त मुखमंडल पर परमहंसी भाव तैरता रहता था। आध्यात्मिक ज्ञान की अतिशयता में एक अवधूत, व्यवहार विचार में एक निर्विकार संन्यासी, परमहंसों की सी एक अनासक्त विचार-आचार संहिता, कवित्व और संगीत के रस-समुद्र की द्विधाभूत तरंगों  के बीच लहराता हुआ मन। निराला निराला हैं। 


आप उनके प्रिय कैेसे हुए ?


मेरी बालसुलभ चपलता और संस्कृत  के गहन अध्ययन ने मुझे उनके करीब कर दिया। निराला के दर्शन मात्र से मेरे मन में विद्युत प्रवाहित होने लगता था। उनका व्यक्तितव था ही ऐसा। पहली बार तो हुआ ऐसा कि उनका काव्य-पाठ समाप्त होने के बाद मैंने वापस जाने की अनुमति मांगी तो निराला ने पंडित नंददुलारे वाजपेयी को कहा कि  मेरे साथ चलेंगे। वहाँें से हम वाजपेयीजी के आवास पर गए और उसके बाद जब हम निकले तो निराला ने कुछ इधर-उधर की बातें  पूछने बाद पूछा कि मैंने उनका कितना और क्या पढ़ा है। मेरे यह बताने पर कि लगभग वह सबकुछ जो प्रकाश में आ चुका है उन्होंने सीधा प्रश्न पूछा कि क्या मैं उनकी  कविताएं समझ लेता हूँ ? मैंने सच-सच कहा कि पूरा तो नहीं लेकिन जिसे समझ पाता हूं उसे पी जाता हूं। इसके बाद कालिदास, तुलसीदास, कृतिवास, कम्बन, बिहारी, आदि के संबंध में अनेक चर्चाएं हुईं।  पूरी बातचीत में निराला ने साहित्य और वेदान्त के शास्त्रीय पक्ष पर ही बात की। 


आपका लेखन  निराला से कितना प्रभावित हुआ ? 


मैंने दूसरे के घर से दीपक लेकर  अपना दीप कभी नहीं जलाया है ‎ लेकिन निराला से मैंने सीखा बहुत है ‎। निराला से प्रसाद से, प्रेमचंद से ‎ । अज्ञेय, जैनेन्द, हजारीप्रसाद द्विवेदी सब से घनिष्ठ संबंध रहा है ‎। यह संभव है कि उनका कोई प्रयोग अच्छा लगा हो लेकिन प्रभावित किसी से नहीं हुआ ‎। 


आपने रायगढ़ के राजकवि का पद स्वीकार किया और फिर उसे छोड़ दिया ऐसा क्यों ?


जैसा होता था तब राजा-महाराजा अपने दरबार के कुछ कलाकारों को रखते थे, उन्हें  मान-सम्मान देते थे ‎। रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह को भी एक राजकवि की जरुरत थी ‎। वहाँ  मुझे  उड़िया कवि मुकुटधर पांडेय ले गए थे लेकिन फिर वे ही विद्वेष रखने लगे‎। दरबार की अपनी रीति-नीति होती है ‎। राजभवन में मोरहिरण उतने नहीं थे जितने चीते,तेंदुए थे‎। जलपाखियों से पहले मगरमच्छ दिखते थे ।

राजा चक्रधर सिंह अपूर्व प्रतिभाशाली थे वे अजीब अजीब विषयों पर संस्कृत में गीत और श्लोक लिखने को कहते थे ‎। मैं राजकवि था उन्हें नाराज कैसे कर सकता था ‎। रचता था मैं कहना पड़ता था महाराज की गहरी सूझबूझ को दाद दीजिए ‎। एक बार एक गीत की एक पंक्ति जब जरा गर्दन झुकाई देख ली को गुनगुनाते हुए कहा कविवर इसे संस्कृत में हूबहू उतारो मैंने कहा प्रतिग्रीवा भंगे नयनसुख संग जनयति ‎। एक बार एक संगीत-नृत्य के कार्यक्रम में एक ठुमरी बांके नैना रसीले ने जादू किया सुनते हुए कहा इसी लय में इस ठुमरी को संस्कृत में उतारिए - मैंने उसे बंक नयनेन मे मानसं मोहितम ‎। 

लेकिन मेरा मन बार-बार वहाँ से मुक्ति की माँग करता ‎। कहता -  यह आखिरी ठौर नहीं ‎। इसलिए उसे छोड़कर चला आया ‎।  मैं किसी की मर्जी पर जलने-बुझने वाला बिजली का बल्व नहीं  था कि उल्टा लटक कर रोशनी करता ‎।


अचानक पद त्याग देने से कठिनाई हुई होगी ? 


मेरा जीवन अभाव दुख और द्वन्दों से भरा था कठिन संघर्ष के दिन थे और उसी में कविता की साधना करता था लेकिन  भोगमय जीवन के प्रति कोई आकर्षण नहीं था ‎। मैंने अपने लिए श्रेय चुना ‎। प्रेय को प्रश्रय नहीं के बराबर दिया ‎। इसलिए प्रेय ने मेरे आगे अंधकार का अम्बार लगा दिया लेकिन जब मैंने आत्मदीप जलाया तो पीछे हट गया ‎। बेशक श्रेय ने भी इसमें मेरा हाथ बटाया ‎।  

कठिनाई तो हर निर्णय में होती है ‎। संसार की ऐसी कौन सी राह है जिसपर धूल नहीं उड़ती, अंधेरा नहीं फैलता, कंकड़-पत्थर नहीं होते इसलिए किसी पर चला जाए समस्या तो आएगी ही । 


उसके बाद ?


राजकवि का पद छोड़कर दैन्यता की जिन्दगी जीने का निर्णय पिताजी को पसंद नहीं आया ‎। क्रोधित हो गए, कहा  - वर्षों दुख सहने के बाद जरा-सा सुख मिला तो सिर फिर गया ‎। और भी बहुत कुछ ‎। तनाव बढ़ने पर एक बार फिर गृह त्यागना पड़ा ‎। उस समय मुजफ्फरपुर संस्कृत अध्ययन का केन्द्र था ‎। यहां आने के बाद  संस्कृत महाविद्यालय में वेदान्त के विद्यार्थी के दाखिल हो गया ‎। छात्रवृत्रि मिल गई ‎। एक तरफ से निश्चिंत हुआ ‎। लेकिन यहाँ  कोई जानने-पहचानने वाला  न था ‎। आने के कुछ दिनों के बाद अखिल भारतीय संस्कृत महाधिवेशन का आयोजन हुआ उसमें मैंने अपने विचार रखे जिससे यहाँ  के एक रईश बाबू उमाशंकर प्रसाद काफी प्रभावित हुए । उमाशंकर बाबू के के यहाँ तब  पुलस्कर, ओंकार नाथ ठाकुर, अच्युत पटवर्द्धन जैसे श्रेष्ठ गायक प्राय: आते थे दांडेकरजी तो स्थायी गायक थे ‎। साहित्य और कला के प्रति उनका अनुराग देखते ही बनता था ‎। कला और कलाकार को सम्मान और संरक्षण देना उनके जीवन का लक्ष्य था ‎। आौर दो मुलाकातों  के बाद उन्होंने मुझे अपने  घर पर रहने के लिए  बुला लिया ‎। आठ वर्षों तक उनके साथ रहा वहीं रहकर  श्यामासंगीत की रचना की । वेदान्त और वेदान्ताचार्य की परीक्षाओं को स्वर्णपदक के साथ उतीर्ण किया और संस्कृत महाविद्यालय में प्राध्यापक के रुप में नियुक्त हो गया । 

आठ वर्षों के बाद एक दिन अचानक कुछ ऐसी परिस्थिति हुई कि मुझे उनका घर छोड़ना पड़ा ‎  तो मैंने यह घर बनवाया  । निरालाजी की स्मृति में मैंने इसका नाम निराला निकेतन रखा है ‎‎। 

12 वर्षों तक संस्कृत महाविद्यालय में  अध्यापन कार्य करने के बाद रामदयालु सिंह कालेज में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रुप नियुक्ति हुई ‎। इस प्रकार यही मुजफ्फरपुर मेरा  कर्मक्षेत्र हो गया ‎।   


इस घर में आने के बाद बादल राग  मेरी पहली रचना है ‎।


छाया देवी - उस कोने वाले कमरे में तब हम रहते थे ‎। यह कविता लिखने के बाद ये उसे लेकर हमारे पास आए ‎। उस वक्त मैें बेटी के साथ किचेन में खाना बना रही थी ‎‎। कविता सुनाई तो हम हँसने लगे यह क्या कविता हुई ‎। 

लेकिन यही कविता सबसे ज्यादा पढ़ी और सुनी गई ‎ । 

छाया देवी - और सबसे ज्यादा पैसे भी इसी कविता से मिले ‎। तब हम क्या जानते थे ‎।


इसे कर्मक्षेत्र कहें या कार्यक्षेत्र ? 


कर्मक्षेत्र ‎। किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए रचनात्मक बुद्धि से किया जाने वाला प्रयास ही तो कर्म होता है ‎। कर्म और है क्या प्रयास  ‎। इसीलिए कहा जाता है कि सत्कर्म के लिए निरंतर सत्प्रयास करने चाहिए और सत्प्रयास  कुछ नियमों के दृढ़तापूर्वक पालन के बिना पूर्ण नहीं होते।


और यही नियम कई बार अंधविश्वास को जन्म दे देते हैं ?


नहीं वह तो नियमों की विकृति है ‎। असल में जब नियमों की व्याख्या सर्वसुलभ नहीं होती तब व्रत उपवास जैसे बाह्य प्रयत्न रहस्यमय प्रतीत होते हैं ‎। हिन्दू-धर्म में विविध देवी-देवताओं को मान्यता इसी के कारण मिली है ‎। किसको किस देवी-देवता का कौन-सा रुप पसंद आएगा यह उस व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करता है ‎। 


और वह उसकी साधना करने लगता है उसके प्रति श्रद्धा रखने लगता है ?


साधना व्यवस्थित और ठोस प्रयत्न होता है जबकि श्रद्धा अंधी होती है अगर श्रद्धा के साथ-साथ विवेक हो तो वह आंख में पड़े तिनके की तरह चुभेगा लेकिन यह तिनका जरुरी है इसी के कारण श्रद्धावान सजग रह पाता है  और पूरी चौकसी के साथ अपने लक्ष्य को साधता है ‎। विवेक न हो तो किसी भी काम का कोई मतलब नहीं है।


और विवेक आत्मचिंतन से आता है ? 


आत्म-चिंतन करने से विश्वास दृढ़ होता है और वही मनुष्य को मित्र और शत्रु से निर्भय बनाता है।

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