सूरदास की लालित्यमय काव्य दृष्टि

 सूरदास जी तो जन्म से अंधे थे पर भजन की महिमा तो देखो जब वो भजन करते थे तो बाल कृष्ण उनके सामने बैठकर उनका भजन सुनते थे । हम आखे से देखकर भी भगवान को देख नहीं पाते और सूरदास जी अंधे होकर भी देख लेते थे

एक बार वो भजन कर रहे थे तो वो भावराग में खो गए जिसमें कृष्णजी, राधा जी के साथ नृत्य कर रहे थे और तभी राधा जी की एक पायल गिर गई तो सूरदास जी ने वो पायल उठा ली तो भगवान कृष्ण ने कहा कि सूरदास जी जब राधा जी अपनी पायल मागने आए, तो आप उनके पै

र पकड लेना तो राधा जी जब पायल मागॅने आई, तो सूरदास जी ने पैर पकड लिए और कहा जब तक आप दोनों हमें दर्शन नहीं दोगें, मै पैर नहीं छोंडूगा, तो दोनो ने उन्हें दर्शन दिए और मन की आखें तो थी ही उनके पास उन्हें दृष्टि भी प्रदान की. और जब वो दर्शन देकर जाने लगी,

तो सूरदास जी ने कहा- कि ये आखें तो ले जाओ. तब राधा जी ने कहा - कि आप जन्म से अंधे हो अब आप को दुनिया नहीं देखनी, तो उन्हेाने कहा मैने आपको देख लिया अब मुझे कुछ नहीं देखना

हम आखो भी नहीं देख पा रहे और उन्होने अंधे होकर भी देख लिया जिसके भजन में जैसी ताकत होगी. बाके बिहारी वैसे ही प्रकट होगें, भजन की उम्र नहीं होती है तो जिसने बचपन में, जवानी मे भजन नहीं किया, वो कहे कि मै बुढापे में भजन करूगा.

तो भगवान भी कहते है कि जैसे तुम मुझे ये अपने जीवन का बचा हुआ समय दे रहे हो, वो भी अपने साथ वैसे ही करेगे. क्येांकि जो भक्त भगवान को जैसे भजता है भगवान भी उसको वैसा ही देते है और जब व्यक्ति का बुरा होता है तो भगवान को कोसता है । वो ये भूल जाता है, कि क्या हमनें भगवान का भजन किया था, पहले खुद से ही प्रश्न कर लो क्योकि जब तक वो व्यक्ति ये नहीं करेगा वेा बाके बिहारी कैसे आएगें । हरिदास जी थे जिन्होंने अपनी संगीत साधना से भगवान को प्रकट कर लिया था कैसे प्रकट कर लिया उनके भजन में शक्ति थी जैसे उन्होने वो राग गाया, और भगवान राधा जी के साथ प्रकट हो गए, तो हमें देखना है भजन में बहुत शक्ति है ।भजन को साधारण न समझें.

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