चंदी नाम विश्वासघात का कस एक अंश


 पेश है अखिलेश श्रीवास्तव  चमन के  नये उपन्यास ll चंदी  नाम विश्वासघात  का ll एक और अंश



  कुल जमा कक्षा नौ तक पढ़े चंदी गुप्ता येन-केन-प्रकारेण मंत्री तो बन गए, विभाग भी बढ़िया ले लिया लेकिन एहसासे कमतरी के कारण अंदर ही अंदर बहुत घबड़ाए हुए थे। उनको पता था कि विभाग के प्रमुख सचिव और विभागाध्यक्ष दोनों ही वरिष्ठ आइएएस अधिकारी हुआ करते हैं। इसके अलावे उनके विभाग के अन्य अधिकारी भी उच्च शिक्षित होते हैं। वे लोग प्रदेश लोकसेवा आयोग की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद चयनित होते हैं। चंदी गुप्ता यह सोच कर परेशान थे कि वे इतने अधिक पढ़े-लिखे अधिकारियों का सामना भला कैसे करेंगे। उन लोगों को अपने जाल में कैसे फाॅंसेंगे और उनसे वसूली कैसे करेंगे। वे चिंतित थे कि विभाग के अधिकारी कहीं उन पर ही भारी न पड़ जायें। या कहीं ऐसा न हो कि प्रमुख सचिव और विभागाध्यक्ष उनकी बातें मानने से इनकार कर दें। उनको कम पढ़ा-लिखा जान कर उन पर हावी न होने लगें। अगर ऐसा हुआ तब तो वे काठ का उल्लू बन कर रह जायेंगे। फिर तो सौदा घाटे का हो जाएगा। इतनी जोड़-तोड़ और मोटा पैसा खर्च कर के मंत्री बनने का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। उनको तो हर हाल में अपने पैसे की सूद-ब्याज सहित वसूली करनी थी। अगले चुनाव के लिए फण्ड एकत्र करना था।   

         लेकिन चंदी गुप्ता की सारी आशंकायें निर्मूल साबित हुयीं। उनको बहुत जल्दी ही पता चल गया कि उनके ज्यादातर विभागीय अधिकारी तो इतने टुच्चे, दब्बू और कमीने हैं कि अपने आप खुद भी कटने तथा साथ के दूसरे अधिकारियों को भी कटवाने के लिए तैयार बैठे हैं। विभागीय अधिकारियों में अगर पाॅंच-दस को छोड़ दें तो बाकी जिस किसी की भी पूॅंछ उठाओ सब मादा ही निकलते हैं। विभाग के प्रमुख सचिव एक दक्षिण भारतीय सीधे-सज्जन व्यक्ति थे। दाल में नमक या चाय में चीनी के बराबर वे खुद भी खा लिया करते थे। इसलिए ‘खाओ और खाने दो’ के सिद्धांत में विश्वास करते थे। अतः उनकी तरफ से किसी प्रकार की परेशानी या अड़ंगेबाजी की संभावना नहीं थी। और विभागाध्यक्ष हेमंत कुमार तो बिल्कुल ही रीढ़ विहीन और जनखा किस्म का व्यक्ति था। ना कहना तो उसने सीखा ही नहीं था। हर वक्त दुम हिलाता रहता था। सही, गलत हर बात में हाॅं में हाॅं मिलाता रहता था। भला अससे अधिक और क्या चाहिए था। ऐसी अनुकूल स्थिति देख कर चंदी गुप्ता की बाॅंछें खिल उठीं।  

      लब्बो-लुबाब यह कि मालदार माने जाने वाले उस विभाग में मंत्री महोदय चंदी गुप्ता के खुल कर खेलने, खाने तथा चैका, छक्का लगाने की भरपूर गुंजाइश थी। नीचे से ले कर ऊपर तक विभाग में कहीं भी किसी भी प्रकार का प्रतिरोध नहीं था। अपने अधीनस्थ अधिकारियों की असलियत जान लेने के साथ ही चंदी गुप्ता उनसे उगाही करने का तानाबाना बुनने में जुट गए। वे व्यवसायी आदमी थे। टिकट खरीदने और चुनाव लड़ने से ले कर मंत्री पद हथियाने तक उन्होंने जितना भी निवेश किया था उसे चक्रवृद्धि ब्याज सहित वसूलने की जुगत में लग गए। उनको पता था कि लोहे की कुल्हाड़ी चाहे कितनी भी तेज धार वाली क्यों न हो, जब तक उसमें लकड़ी का बेंट नहीं लगता वह लकड़ी को काट नहीं सकती। यानी लकड़ी को काटने के लिए लकड़ी की सहायता आवश्यक होती है। इसी धारणा के अनुरूप विभागीय अधिकारियों में उन्होंने ऐसे जयचंदों की तलाश शुरू कर दी जो अपने ही साथियों को कटवाने के लिए कुल्हाड़ी का बेंट बनने के लिए तैयार हों। बहुत प्रयास नहीं करना पड़ा चंदी गुप्ता को। प्रायः हर विभाग में, हर काडर में कुछ ऐसे लोग अवश्य होते हैं जो अपने ही साथियों को कटवाने के लिए बेंट के रूप में अपनी सेवायें प्रदान करने को उत्सुक रहते हैं। ऐसे लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों आदि के तलवे चाटने को तत्पर रहते हैं। शीघ्र ही विभाग के एक दर्जन से अधिक भ्रष्ट अधिकारी चंदी गुप्ता की सेवा में हाजिर हो गए। न सिर्फ हाजिर हो गए बल्कि बढ़-चढ़ कर जी-हजूरी करने लगे, उनको विभाग की कमियाॅं और धन उगाही के तरीके बताने लगे।

       चंदी गुप्ता का पहला-पहला अनुभव था इसलिए वे अपने अधीनस्थ विभाग के अधिकारियों की कुत्तागिरी देख कर चकित थे। उन्होंने तो सोचा था कि कोशिश कर के विभाग के एक-दो अधिकारियों को फोड़ेंगे, उनको अपने पक्ष में मिलायेंगे और उनके मार्फत दूसरों की पोल-पट्टी पता कर के धीरे-धीरे अपना शिकंजा कसेंगे। लेकिन यहाॅं तो बगैर किसी प्रयास के ही दर्जनों अधिकारी उनके आगे-पीछे दुम हिलाने लगे थे। बगैर पूछे ही एक-दूसरे की कमियों का बखान करने लगे थे। चंदी गुप्ता की निगाह में अपना नम्बर बढ़वाने के लिए उन जयचंदों में होड़ मची हुयी थी। हालत यह थी कि यदि चंदी गुप्ता खॅंखारते तो उनकी थूक लोकने के लिए एक साथ कई हथेलियाॅं उने सामने पसर जाया करती थीं। इससे अधिक भला और क्या चाहिए था चंदी गुप्ता को। ऐसे चाटुकारों की बजह से तो उनकी दसों अॅंगुलियाॅं घी में और सिर कड़ाही में था।  

      वैसे तो चंदी गुप्ता की जी-हजूरी करने वाले अधिकारियों की सूची काफी लम्बी थी लेकिन तीन लोग उनमें ऐसे थे जिन्होंने चापलूसी और कुत्तागिरी के मैराथन में बाकी सभी को पीछे छोड़ दिया था। इन तीनों अधिकारियों के नाम थे-----------

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