सोशल मीडिया और कामायनी / डॉ सकन्द शुक्ला

 जयशंकर प्रसाद की कामायनी का प्रथम पुरुष हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देख रहा है। वह नीचे कूद भी सकता है तैरने के लिए और गिर भी। गिरने और तैरने में किन्तु अन्तर बहुत बड़ा है। वैसे ही , जैसे अकेलेपन और एकान्त में। 


सोशल मीडिया ग्लोबलाइज़ेशन की पुत्री है। स्थानीयता की जगह वैश्विकता जाति-धर्म-लिंग-नस्ल के बन्धनों को नहीं मानती। वह सबसे जुड़ना चाहती है और जुड़ती जाती है। उसके पास सबके लिए खुली बाँहें हैं : आओ और साथ मिल-बैठो यार ! 


लेकिन स्थानीयता के पास एक गुण था , जिससे वैश्विकता महरूम है। स्थानीयता के पास क्वॉलिटी थी। वैश्विकता के पास क्वॉन्टिटी चाहे जितनी हो , क्वॉलिटी का उसके पास टोटा है। सोशल मीडिया पर मित्र हज़ारों हैं, किन्तु वे सब आभासी दुनिया की ही हैं। वास्तविक मित्रों का प्रतिशत उनमें से बहुत न्यून ही पाया जाता है। 


वह व्यक्ति जो दिनभर फ़ेसबुक पर रहता है , नितान्त अकेला है। वह एकान्तिक नहीं है , एकान्त में चुनाव का भाव जो होता है। एकान्त व्यक्ति स्वयं चुनता है , उसे किसी पर थोपा नहीं जाता। अकेलापन थोपा जाता है , वह एक प्रकार का अवांछित आरोपण ही है। एकान्त से जब चाहे समाज में लौटा जा सकता है , वह आपको जबरन बाँधता नहीं है। अकेलापन यातना-शिविर की तरह है , वह आपको अपने चंगुल से निकलने ही नहीं देता। एकान्त आपको सर्जक बना सकता है , वह आपको उठाता है। उसके प्रभाव से आप वैज्ञानिक , साहित्यकार , समाज-सुचिन्तक , राजनेता , दार्शनिक और धर्मगुरु बन सकते हैं। अकेलापन आपका ध्वंस करता है , वह आपको तोड़मरोड़कर आत्मविनष्टि के मार्ग पर ले जाता है। इन सब अन्तरों के बावजूद अनेक बार अकेलेपन और एकान्त में अन्तर सूक्ष्म और गड्डमड्ड भी होते रहते हैं। हम अनेक बार इस तरह पानी में जाते हैं कि कुछ हद तक गिर रहे होते हैं और कुछ हद तक यह हमारी छलांग होती है। 


फ़ेसबुक पर ढेरों प्रोफ़ाइलें ऐसी हैं , जो अकेली हैं। वे बन्द बुलबुलों में क़ैद हैं और सबसे जुड़ाव दिखा रही हैं। उनकी प्रोफ़ाइल-पिक्चर पर कोई-न-कोई फूल-पत्ती-जानवर-चिड़िया-अभिनेता या कोई एब्स्ट्रैक्ट चिह्न अंकित है। जान-पहचान के लिए वे अपना फ़ोटो प्रस्तुत नहीं करते , या फिर हो सकता है किसी कारण से नहीं करना चाहते। वजह जो भी हो , किन्तु वे स्वयं को बन्द किये आभासी प्लैटफ़ॉर्म पर हैं। 


अनेक ऐसे लोग सोशल मीडिया पर हैं , जिनका कोई वास्तविक जीवन नहीं। वास्तविक जीवन में कोई मित्र नहीं , न प्रेमी। वास्तविक जीवन में कोई परिवार नहीं , न कोई कर्म-कौशल। ऐसे लोग भी आभास के पूर्ण सम्मोही प्रभाव में हैं। उनकी दुनिया साइन-इन के क्लिक से शुरू होती है और साइन-आउट पर उसका लय हो जाता है। हर दिन वे ब्रह्मा की तरह अनेक बार अपनी सृष्टि करते हैं और उसका प्रलय भी। नीले फ़ेसबुक का स्क्रीनी समुद्र आगम-निगम की तरह उनकी इच्छानुसार घटा करता है। 


समस्या यह नहीं है कि हम फ़ेसबुक पर क्यों हैं। प्रश्न यह पूछा जाना चाहिए कि हम फ़ेसबुक के अलावा और कहाँ हैं वास्तविक संसार में। हमारे यथार्थी सम्बन्ध कितने हैं ? वास्तविक परिवार कितना बड़ा है ,  सच्चे हाड़-मांस के मिल सकने वाले मित्र कितने है ? सच्चा प्रेम करने वाला कोई है , जिसे हम बाँहों में भर सकते हैं , चूम सकते हैं ? वास्तविक काम कोई धरातली हम करते हैं ? कितना समय हमारा स्क्रीन पर जाता है और कितना समाज में ? और-तो-और , हमारे वास्तविक शत्रु कितने हैं , जिनपर हम आँखें तरेर सकते हैं और मुट्ठियाँ तान सकते हैं ! 


सवाल है कि आभास / वास्तविकता का अनुपात क्या है। आभास अधिक है और वास्तविकता कम, तो हम ग्लोबल खोखले हैं। हम से कुछ बड़ा तो दूर की बात है , छोटा परिवर्तन भी न हो पाएगा। हम स्वयं को ही नहीं सँभाल पा रहे हैं , अन्य से जुड़कर उन्हें क्या दे सकेंगे ! आभास कम है और वास्तविकता अधिक , तब हम स्वयं से कुछ उम्मीद कर सकते हैं। 


आभास और वास्तविकता का सम्बन्ध एक हद तक स्थानीयता और वैश्विकता का भी है। विश्व के लिए कर्त्तव्य किया जा सकता है : उससे प्रेम नहीं किया जा सकता। विश्व से जुड़ा जा सकता है : उसे बाँहों में भरकर चूमा नहीं जा सकता। विश्व स्पर्श से परे है और जिसकी छुअन सम्भव न हो , उसके लिए पार्थिव शरीर क्या पूरा दे देना चाहिए !


अपने-अपने फेसबुकेतर सत्य हमें खोजने हैं और उन्हें बचाना है। फेसबुकेतर सत्य ही हमें एकान्त देने में सक्षम हैं , वे ही हमें अकेलेपन से निकालेंगे। वे ही हमारा स्थानीय समाज बनाते हैं , जिसका महत्त्व उस वैश्विक समाज से पहले है जिससे हम शायद जीवन में कभी मिल न सकेंगे। 


इड़ा-श्रद्धा के बीच दुविधा में फँसा फेसबुकीय मनु सृष्टि कैसी करेगा , यह उसे ऊँचाई पर बैठकर सोचना है। उसके नयन अगर भीगे हैं , तो उम्मीद अभी बाक़ी है। जिनकी आँखें भीगी हैं , उनके जीवन में अभी वास्तविकता बची हुई है। वे ही खुलकर हँस और रो , दोनों सकते हैं। 


शेष के लिए तो चुनाव बस एक निर्जीव-निष्प्राण क्लिक है।  


●लेखक :- डॉक्टर स्कंद शुक्ल


◆पेंटिंग:- पॉवेल कुंजुस्की

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