शनिवार, 19 जून 2021

चंद्रकांता संतति और खत्रीजी / गिरीश पंकज जी

 कल बाबू देवकीनंदन खत्री का जन्मदिन था । नमन।  इनका तो नाम ही काफ़ी है। 18 जून 1861को उनका जन्म बिहार में हुआ था। 1 अगस्त, 1913  में मात्र बावन साल की आयु में वे महाप्रयाण कर गये लेकिन एक ऐसा इतिहास भी रच गये, जो कालजयी हो गया है। हम सब जानते हैं  कि उन्होंने  'चंद्रकांता',  'चंद्रकांता संतति ' जैसी असाधारण रूप से लोकप्रिय होने वाली कृतियाँ हिंदी साहित्य को दीं। इसके अतिरिक्त उन्होने  काजर की कोठरी, कुसुम कुमारी, नरेंद्र मोहिनी, गुप्त गोदना, वीरेंद्र वीर  और भूतनाथ जैसी कुछ कृतियाँ भी लिखीं। देवकीनंदन जी के प्रारंभिक शिक्षा बिहार में हुई, बाद में पर बनारस आ गए और यही उन्होंने लहरी बुक डिपो की स्थापना की। सन 1900 में उन्होंने हिन्दी मासिक 'सुदर्शन' का प्रकाशन भी आरम्भ किया, जिसकी साहित्य जगत में एक विशिष्ट पहचान बन गई थी।  हम सब जानते हैं कि चंद्रकांता सन्तति पर  बेहद लोकप्रिय धारावाहिक भी बना, जिसे बच्चे, बूढ़े और नौजवान सभी ने बड़े चाव से देखा। एक फिल्म भी बनी। हिंदी साहित्य के पारंपरिक लेखन के तिलस्म को एक तरह से देवकीनंदन जी ने तोड़ा था। तिलस्म और अय्यारी  से भरपूर  लेखन करके उन्होंने हिंदी जगत को चौंका दिया था । उनका लेखन इतना लोकप्रिय हुआ  कि उसे पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी। बाबू देवकीनंदन जी की अंतिम कृति 'भूतनाथ' थी, जो उनके अचानक चले जाने के बाद अधूरी रह गई थी, तो उसको उनके सुयोग्य पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री जी ने पूरा किया था। बाद में दुर्गाप्रसाद जी ने भी अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाया और  'खूनी पंजा' और 'सुफेद शैतान' (दो भागों में) जैसे जासूसी उपन्यास भी लिखे। चंद्रकांता संतति, खूनी पंजा और सुफेद शैतान मुझे दुर्गाप्रसाद खत्री जी के सुपुत्र हमारे चाचा केदारनाथ खत्री जी से ही मुझे प्राप्त हुई थी। यहाँ मैं गर्व के साथ  बताना चाहता हूँ कि मेरे पूज्य पिताजी श्री कृष्णप्रसाद उपाध्याय और चाचा केदारनाथ खत्री जी बड़े अंतरंग मित्र थे । एकदम सगे भाई की तरह। पिताजी का बाल्य और युवाकाल बनारस में बीता। वहीं वे आज़ादी की लड़ाई में भी सक्रिय थे। वे क्रांतिकारी थे और खादी भंडार में कार्य भी करते थे । तभी वे केदार चाचा के संपर्क में आये और उनके परम मित्र बन गये।  मित्र क्या,भाई जैसा ही दोनों आपस में व्यवहार करते थे। बाद में पिताजी मनेंद्रगढ़ चले आए,खादी भंडार खोलने । लेकिन बनारस से उनका जीवंत रिश्ता बना रहा । हर वर्ष गर्मी की छुट्टियों में पिताजी हम बच्चों को लेकर बनारस आते। वही मैंने गंगा माँ की गोद में तैरना सीखा। बनारस जाते तो पिताजी का केदार चाचा के रामकटोरा अवस्थित घर जाना जरूर होता  था। वे  हम सब को भी अपने साथ ले जाते । मेरा जन्म भी बनारस में हुआ इसलिए बनारस जाना मेरे लिए किसी बड़े उत्सव से कम न होता था । पढ़ने-लिखने में मेरी रुचि को देखते हुए केदार चाचा ने मुझे अपने दादा और पिताजी की पुस्तकें पढ़ने के लिए दी, जिसे पढ़कर बेहद रोमांच का अनुभव हुआ। हालांकि सबसे पहले मैंने 'खूनी पंजा' पढ़ी। मुझे अच्छे से याद है कि बनारस से मनेंद्रगढ़ लौटते वक्त ट्रेन में 'खूनी पंजा' पढ़ते हुए मैं काफी भयग्रस्त हो गया था । तब पिताजी ने मुस्करा कर कहा था, बाद में पढ़ना, इसलिए उस उपन्यास को अधूरा छोड़ दिया।  बहुत बाद में उसे पूरा किया । चंद्रकांता भी कुछ  बड़े होने के बाद पढ़ी। पिछले दिनों एक बार फिर मैंने खूनी पंजा और  सुफेद शैतान को पढ़कर अभिभूत हुआ । केदार चाचा के परिवार से आज तक मेरा आत्मीय परिचय आज तक बना हुआ है।  केदार चाचा के दो पुत्र राजेश खत्री (पप्पू) और राकेश खत्री (बबुआ) से निरंतर संवाद कायम रहता है।  उनकी दोनों बहनों का भी स्नेह मुझे मिला । पुराने लोग रिश्ते निभाते थे । धीरे-धीरे ये सब चीजें खत्म होती जा रही हैं।  फिर भी जितना हो सके, आत्मीयता की मिठास को बनाये रखना चाहिए। 


गिरीश पंकज

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