गुरुवार, 4 अगस्त 2022

शिवतत्व



प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


धर्मराज युधिष्ठिर ने जब भीष्म जी से शिवतत्त्व के सम्बन्ध में प्रश्न किया, तब उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट करके कहा कि "श्रीकृष्ण उनकी कृपा के पात्र हैं, उनकी महिमा को जानते हैं और वही कुछ वर्णन भी कर सकते हैं।" 

युधिष्ठिर के प्रश्न से श्रीकृष्ण ने शान्त, समाहित होकर यही कहा कि "भगवान की महिमा तो अनन्त है, तथापि उन्हीं की कृपा से उनकी महिमा को अति संक्षेप में कहता हूँ।" यह कह कर बड़ी ही श्रद्धा से उन्होंने शिव-महिमा का गायन किया। विष्णु भगवान ने तो अपने नेत्रकमल से भगवान की पूजा की है। उसी भक्त्त्युद्रेक से उन्हें सुदर्शन चक्र मिला है।


शिव-विष्णु को तो परस्पर में ऐसा उपास्योपासक सम्बन्ध है कि जो अन्यत्र हो ही नहीं सकता। तम काला होता है। और सत्त्व शुल्क, इस दृष्टि से सत्त्वोपाधिक विष्णु को शुक्लवर्ण होना था और तम उपाधिक रुद्र कृष्णवर्ण होना था और सम्भवतः हैं भी वे स्वरूपः वैसे ही, परन्तु परस्पर एक-दूसरे की ध्यानजनित तन्मयता से दोनो के ही स्वरूप में परिवर्तन हो गया। अर्थात् विष्णु कृष्णवर्ण और रुद्र शुक्लवर्ण हो गये। 


मुरलीरूप से कृष्ण के अधरामृतपान का अधिकार शिव को ही हुआ। श्रीकृष्ण अपने अमृतमय मुखचन्द्र पर, सुमधुर अधरपल्लव पर पधराकर अपनी कोमलांगुलियो से उनके पादसंवाहन करते, अधरामृत का भोग धरते, किरीट-मुकुट का छत्र धरते और कुण्डल से नीराजन करते हैं श्रीराधारूप से श्रीशिव का प्राकट्य होता है, तो कृष्णरूप से विष्णु का, कालीरूप विष्णु का तो शंकररूप से शिव का। "या उमा सा स्वयं विष्णुः" ( रुद्रहृदयोपनिषत् ५ ) इस तरह ये दोनों उभय-उभयात्मा, उभय उभयभावात्मा हैं। 


श्रीशिव का सगुण स्वरूप भी इतना अद्भत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उस पर सभी मोहित हैं। भगवान को तेजोमयी दिव्य, मधुर, मनोहर विशुद्धसत्त्वमयी, मंगलमयी मूर्ति को देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूरखण्ड, श्वेताद्रि, चन्द्रमा सभी लज्जित होते हैं। अनन्तकोटि चन्द्रसागर के मन्थन से समुद्रभूत, अद्भुत, अमृतमय, निष्कलंक पूर्णचन्द्रक भी उनके मनोहर मुखचन्द्र की आभा से लज्जित हो उठता है। मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र एवं जटामुकुट पर दुग्धधवल स्वच्छाकृति गंगा की धारा हठात मन को मोहती है।


हस्ति-शुण्ड से समान विशाल, भूतिभूषित, सुडोल, गोल, तेजोमय अंगद-कंकण-शोभित भुजा, मुक्ता मोतियों के हार, नागेन्द्रहार, व्याघ्रचर्म, मनोहर चरणारविन्द और उनमें सुशोभित नखमणिचन्द्रिकाएँ भावुको को अपार आनन्द प्रदान करती हैं। हिमाद्रि के समान धवलवर्ण स्वच्छ नन्दीगण पर विराजमान रुदाशक्तिरूपा श्रीउमा के संग श्रीशिव ठीक वैसे ही शोभित होते हैं, जैसे धर्मतत्त्व के ऊपर ब्रह्मविद्यासहित ब्रह्म विराजमान हों, किंवा माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति के साथ मूर्तिमान होकर परमानन्दरसामृतसिन्धु विराजमान हो।


भगवान की ऐसी सर्वमनोहारिता है कि सभी उनके उपासक हैं। कालकूट विष और शेषनाग को गले में धारण करने से भगवान की मृत्यंजयरूपता स्पष्ट है। जटामुकुट में श्रीगंगा को धारण कर विश्वमुक्ति मूल को स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्र के समीप में ही चन्द्रकला को धारण कर अपने संहारकत्व-पोषकत्वरूप विरुद्ध धर्माश्रयत्व को दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्म को ही अपना भूषण-वसन बनाकर संसार में वैराग्य को ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया।


आपका वाहन नन्दी, तो उमा का वाहन सिंह, गणपति का वाहन मूषक, तो स्वामी कार्तिकेय का वाहन मयूर है। मूर्तिमान त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवा में सदा संलग्न हैं। ब्रह्मा, विष्णु, राम, कृष्णादि भी उनकी उपासना करते हैं। नर, नाग, गन्धर्व, किन्नर, सुर, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति प्रभृति भी शिव की उपासना में तल्लीन हैं।


इधर तामस से तामस असुर, दैत्य, यज्ञ, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिहं सभी आपकी सेवा में तत्पर हैं। वस्तुतः परमेश्वर का लक्षण भी यही है कि उसे सभी पूजें। 


पार्वती के विवाह में जब भगवान शंकर प्रसन्न हुए, तब अपनी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी दिव्य मूर्ति का दर्शन दिया। बरात में पहले लोग इन्द्र का ऐश्वर्य, माधुर्य देखकर मुग्ध हो गये, समझा कि यही शंकर हैं और उन्हीं की आरती के लिये प्रवृत्त हुए।


जब इन्द्र ने कहा कि "हम तो श्रीशंकर के उपासकों के भी उपासकों में निम्नतम हैं", तब उन लोगों न प्रजापति ब्रह्मा आदि का अद्भुत ऐश्वर्य देखकर उन्हेंं परमेश्वर समझा। जब उन्होंने भी अपने को भगवान का निम्नतम उपासक कहा, तब वे लोग विष्णु की ओर प्रवृत्त हुए और उन्हें ही अद्भुत ऐश्वर्य-माधुर्य-सौन्दर्यसम्पन्न देखकर शंकर समझा। जब श्रीविष्णु ने भी अपने को शंकर का उपासक बतलाया, तब तो सब आश्चर्य-सिन्धु में डुबने लगे।


सचमुच भगवान कृष्ण के श्रीअंग का सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। और क्या कौन कहे, उस पर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगण में प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोंहर, मंगलमयी मूर्ति को देख, उसके ही संमिलन और परिरम्भण के लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं।


श्रीमूर्ति के प्रत्येक अंग-भूषणों को भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणों ने अनन्त आराधनाओं के अनन्तर अपनी शोभा बढाने के लिये उनके श्रीकण्ठ को प्राप्त किया है, किंबहुना अनन्त गुणगणों ने भी बढाने के लिये उनके श्रीकण्ठ को प्राप्त किया है, किंबहुना अनन्त गुणगणों ने भी अनन्त तपस्याओं के अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धि के लिये जिन, निर्गुण, निरपेक्ष का आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिस पर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमा का कहना ही क्या?


राधारूप से जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोम में रखें वंशीरूप से अधरपल्लव पर रखें, जिनके स्वरूप का निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमा को कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध के माधुर्य में प्राणियों का चित्त आसक्त होता है।


चित्त में अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्म का आरोहण कठिन होता है। इसलिये भगवान ऐसी मधुर, मनोहर मंगलमयी मूर्तिरूप में अपने आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादि के माधुर्य का पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध, सकुमार्य की तुलना कहीं है ही नहीं। मानों भगवान की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्ति से ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धु के एक बिन्दु से ही अनन्त ब्रह्माण्ड में सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वित हैं।


जब प्राणी का मन प्राकृत कान्ता के सौन्दर्य, माधुर्यादि में आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओं के उद्गम स्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान के मधुर स्वरूप में क्यों न आसक्त होगा? 


भगवान का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवी के परतन्त्र है। संसार में माँगने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परन्तु भगवान शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढाने वाले से ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देने को प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्मा जी पार्वती से अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं।


"बावरो रावरो नाह भवानी। जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नाहिं निशानी। तिन रंकन को नाक सँवारत हों आयों नकबानी।। 

शिव की दई सम्पदा देखत श्री शारदा सिहाहीं। दीनदयाल देहबोइ भावई यां जस जाहि सुहाहीं।।" ( विनय पत्रिका, शिव स्तुति )


उनका भक्त एक ही बार प्रणाम करने से अपने को मुक्त मानता है। भगवान भी 'महादेव' ऐसे नाम उच्चारण करने वाले के प्रति ऐसे दौड़ते हैं, जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े के प्रति - 


"महादेव महादेव महादेवेति वादिनम्। 

वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति।।" 


जो पुरुष तीन बार महादेव, महादेव, महादेव, इस तरह भगवान का नाम उच्चारण करता है, भगवान एक नाम से मुक्ति देकर शेष दो नाम से उसके ऋणी हो जाते है।


"महोदेव महादेव महादेवेति यो वदेत्। 

एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शंभू ऋणी भवेत्।।"

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