बुधवार, 30 मार्च 2022

मनोहर श्याम जोशी सा कोई नहीं / प्रभात रंजन

 मनोहर श्याम जोशी से जब कोई पूछता था कि आपको अपनी सबसे अच्छी रचना कौन सी लगती है तो उनका जवाब होता- अगली, जो मैं लिखने वाला हूँ! एक बार लिख लेने के बाद वे उस रचना से बाहर निकल जाते थे और अगली रचना की तैयारी में लग जाते थे। यह तैयारी अक्सर मानसिक होती थी।



 उनके पास ऐसे-ऐसे उपन्यासों के आइडिया होते थे जिनको वे पूरा का पूरा सुना देते थे। मुझे उन्होंने कई उपन्यास सुनाए जिनमें एक उन्होंने लिखा भी और जो उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ, 'वधस्थल' नाम से। इस उपन्यास का वर्किंग टाइटिल उन्होंने 'killing field' रखा था। तब वे कम्बोडिया की यात्रा से लौटकर आए थे और वहाँ उन्होंने वहाँ के नेता पोल पॉट द्वारा किए गए नरसंहार के बारे में जाना, नरसंहार से जुड़े स्थलों को देखा तो इतने विचलित हुए कि लौटकर कम्बोडिया पर रिसर्च करने लगे और यह उपन्यास लिखते रहे। लिखते जाते थे, काटते जाते थे। अपने जीवन काल में वे लगातार अपने लिखे में संशोधन करते रहे।


बहरहाल, एक उपन्यास उन्होंने मुझे सुनाया था जिसका वर्किंग टाइटल उन्होंने 'सम्यक् श्रद्धांजलियाँ' रखा था। उपन्यास का मूल कथानक यह था किसी छोटे से क़स्बे में एक लेखक की मृत्यु हो जाती है। ऐसे लेखक की जो जीवन भर इस आशा में लिखता रहा कि एक दिन हिंदी के सत्ता केंद्रों की नज़र उनके लिखे पर जाएगी और वे उनके लिखे के महत्व को समझेंगे। लेखक के जीते जी ऐसा नहीं हो पाया। लेकिन उस लेखक के निधन के बाद चमत्कार हो गया।


 हिंदी के सभी बड़े आलोचकों ने उस लेखक के लिए लम्बी लम्बी श्रद्धांजलि लिखी। पूरा उपन्यास यही होता। अगर वे लिखते तो उत्तर-आधुनिक विधा पैरोडी का संभवतः वह पहला और सशक्त उपन्यास होता। उस उपन्यास में हिंदी के सभी प्रख्यात आलोचकों के नाम से उनकी ही शैली में श्रद्धांजलि दी जानी थी। सबसे पहली श्रद्धांजलि नामवर सिंह की ओर से होती, सुधीश पचौरी, पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि सभी प्रमुख आलोचकों की ओर से उस उपन्यास में उनके नाम से श्रद्धांजलियाँ लिखी जानी थीं।


 मैंने ऊपर ही लिखा है कि वे महज आइडिया ही नहीं सुनाते थे बहुत विस्तार से सुनाते थे। नामवर जी, सुधीश जी की श्रद्धांजलियाँ सुनकर मैं हँसते हँसते लोटपोट हुआ जा रहा था। बीच बीच में उनको अपनी ओर से आलोचकों के नाम भी सुझाता जाता था। कुल मिलाकर, तेरह आलोचकों की श्रद्धांजलियाँ किताब में होनी थी। तेरह इसलिए क्योंकि जब उस लेखक का निधन हुआ था तो वह अपना तेरहवाँ उपन्यास लिख रहे थे। तेरह की संख्या से मृत्यु के बाद मनाई जाने वाली तेरहवीं की ध्वनि भी आती है। यह चुभता हुआ व्यंग्य होता हिंदी की परम्परा पर जिसमें अनेक लेखकों का सम्यक् मूल्यांकन उनके निधन के बाद ही हुआ। प्रसंगवश, मेरे द्वारा सुझाए गये कई आलोचकों के नाम उन्होंने इस उपन्यास में शामिल किए लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी का नहीं किया। क्यों नहीं किया यह नहीं बताऊँगा! 

मनोहर श्याम जोशी के निधन के बाद मैंने कई बार सोचा कि इस उपन्यास को मैं ही लिख डालूँ। पूरा उपन्यास तो मेरा सुना हुआ ही था। लेकिन भाषा की वह प्रतिभा कहाँ से लाता। 

सादर नमन ऐसे जोशी जी को।


– प्रभात रंजन


साभार -हिंदी विभाग

 मगध विवि गया 

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