बुधवार, 30 मार्च 2022

मैथिली लेखन की नयी संभावनाविभा रानी / हरीश पाठक

 कुछ रिश्ते होते ही कभी न भूल पाने के लिए हैं।उनकी खनक और धमक वक्त की रेत में न उड़ती है,न मिटती है।


       वे मेरे जीवन के कठोर दिन थे।1986 में बड़े बड़े सपने ले कर वाया दिल्ली 'धर्मयुग' में आया था,साल 1996 के सितम्बर महीने में टाइम्स ऑफ इंडिया ने उस 'धर्मयुग' को किसी नामालूम से प्रकाशक को बेच दिया।14 महीने की कानूनी लड़ाई के बाद हम लोग सुप्रीम कोर्ट से जीते पर जीत के बाद इस्तीफा दे कर मैं जिस 'कुबेर टाइम्स' का संपादक बना वह 'कुबेर टाइम्स' दो साल बाद बन्द हो गया।मैं सड़क पर।पत्नी कमलेश पाठक का मुम्बई आकाशवाणी से नासिक तबादला हो गया।बच्चे मुम्बई में।इसी बीच दैनिक 'हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण में(जो शुरू हो रहा था) मेरी समन्वय संपादक के पद पर नियुक्ति हो गयी।विकल्पहीनता के उस दौर में उस अनजान प्रदेश के अराजक माहौल में मुझे वहां जाना ही था, मैं गया भी।

       यह साल था 2001।ऐसे मौसम में भागलपुर के कचहरी चौक स्थित उस होटल 'निहार' में दोपहर 12 के पहले फोन देने और मिलनेवालों पर मैंने ही रोक लगवा दी थी, क्योंकि मैं लौटता ही रात 3 बजे था।एक दिन,एक फोन ने होटलवालों को खूब परेशान किया।फोन पर कहा जा रहा था,'मैं हरीश पाठक की भाभी हूँ और मुझे हर हाल में उनसे बात करना है।'

       अबकी मालिक नाटो बाबू खुद कमरे में आये और मैं फोन पर आया।उधर से आवाज आयी 'विभा बोल रही हूं, Vibha Rani।होटलवाले आपकी बड़ी दहशत में रहते है।कह रहे थे 12 के बाद फोन कीजिये।यहाँ एक विवाह में आयी थी आपके हाल जानने को बेताब।कैसा लग रहा है मेरा प्रदेश?खाने की या अन्य कोई दिक्कत?यहां मेरे बहुत रिश्तेदार हैं।कुछ भी दिक्कत हो तो बता दीजिए। बुरा तो लग रहा होगा पर यह वक्त भी कट ही जायेगा।'

      मैं एक क्षण रुआंसा हो गया।कोई था उस अजनबी प्रदेश में जो मेरा अपना था।मेरे दुख के,अकेलेपन के,कष्ट के उन कातर क्षणों में रिश्तों के आर पार --दिलासा के ताबीज लिए।

     मेरे लिए यह हैं और रहेंगी विभा रानी।हिंदी और मैथिली की लोकप्रिय कवयित्री।तीन साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता पुस्तकों की अनुवादक,'चल खुसरो घर आपने' और  'बन्द कमरे का कोरस' जैसे कथा संग्रहों, 'प्रेग्नेंट फादर' जैसे पुरस्कृत नाटक की लेखिका, अभिनेत्री और अवितोको जैसी संस्था की मुखिया।

     आज उन विभा रानी का जन्मदिन है।यह मेरे पारिवारिक उत्सव का भी दिन है।कभी न टूटे हमारे साढ़े तीन दशक पुराने रिश्तों की डोर।कभी न फीकी पड़े आपके यश की चमक।

    आपको खूब खूब मुबारक हो आज का यह मुबारक दिन।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...