गुरुवार, 16 जुलाई 2020

मुनिया उर्फ़ राधा / सीमा मधुरिमा



एक व्यंग्य ------

मुनिया उर्फ़ राधा

वो जब गांव से चौदह वर्ष की उम्र. में भागी थीं  तब कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वो सभी प्रेम करने वालों के लिए उपहार स्वरुप् हो जायेगीं  ! उस समय तो बस   उनको  एक ही धुन सवार थी किसी तरह से रामदुलारे का साथ न छूटने पाए !   सोते जागते उठते बैठते ये राम दुलारा न् जाने क्यूँ उनके जेहन में घूमता ही रहता था और माँ बापू इतने निर्दयी की न् कभी उससे मिलने देते और न् ही बात करने देते ! माँ बापू का कहना था शहर से आने वाले लड़कों से दूर ही रहना चाहिए वो अपने छैल् छिबिले रौबिले रूप रंग दिखाकर गांव की भली लड़कियों को फंसा लेते है ......पर मुनिया का मन तो मानता ही न् था !  उनको तो हर समय राम दुलारे की ही जिद लगी रहती कहते है प्रेम की आगे सभी कुछ बेकार होता है .....जाने कितने राजे रजवाड़े धूल में मिल गए तो भोली भाली मुनिया का कहॉ वश चलना था आखिर एक दिन दो जोडी कपडा बांधकर निकल पड़ीं अपने सपनो के राजकुमार के साथ गुनगुनाते ....." हमरा के भावे ला बलम    टुकुर टुकुर ताके काहें रे बहेलिया "
और अगला गीत निकला ," दिल विल प्यार व्वार  मैं क्या जानूं रे ....जानू तो जानू कि बस तोहे अपना जानूं रे ,"

आखिर उसकी उथल पुथल शांत हुई और राम दुलारा लेकर उसे दूर शहर में एक बड़ी कोठी में पहुंचा ! जब तक वो कुछ समझ पाती तब तक उसके कई कस्टमर की बुकिंग हो गई थी ! उफ्फ्फ्फ़ प्रेम की ये गति इस बारे में तो उसने कभी सोचा ही नहीं था ....उसे माँ बापू याद आते उनकी एक एक बातें याद आती ये भी याद आता कि कैसे वो लोग राम दुलारे से दूर रहने की सलाह देते ....पर अब तो कुछ हो नहीं सकता था वो बुरी तरह फंस चुकी थी उस जगह पर उसकी जैसी ही किस्मत की मारी कई लड़कियाँ थी ....किसी को किसी का पिता ही छोड़ गया था किसी को किसी का पति उफ्फफ्फ्फ़ कैसे लोग और कैसा समाज .....
उसके खरीददार् में कभी कोइ नेता होता तो कभी कोई अफसर भी कभी कभी कोई बाबा नुमा भी अब वो ये सब अपनी नियति समझने लगी थी तभी एक बाबा जी की उसपर विशेष कृपा हुई जो अब अक्सर उसके पास आने लगे एक दिन वो बोले , " मुनिया इस नर्क से निकलना चाहोगी ,"
मुनिया ," बिल्क़ुल .....क्या ये सम्भव है इसके बद्ले में आपको महीनों .....और मुनिया चुप हो गई बाबा का मुँह देखने लगी ,"
बाबा बोले ,"मेरी कुछ शर्ते हैं , तुम्हारी पढ़ाई कहाँ तक हुई है , "
मुनिया , " आठ कक्षा तक पढ़ी हूंँ ...उसी समय वो कल्मुहा रामदुलरा कुत्ता आया हमारे गांव में और हम् ओकरे मोह में अपने घर से निकल आए  .....अब मिल जाए न् तो उका हम् खुदे अग्नि मैया को सौप देवे ,"
बाबा बोले , " अपने घर जाना चहोगि ,"
मुनिया , " नहीं नहीं घर नहीं जाना अब क्या मुँह लेकर जाउंगी उनके मुँह पर तो सभी समाज के आगे कालिख् पोत् आती हूंँ , घर नहीं जाना भले जान दे दूँ , "
बाबा बोले , " ठीक है कुछ किताबें दे रहा हूंँ , इसे पढ़ डालो ....कुछ बोलने का अभ्यास करो सब ठीक हो जाएगा !!"
और सुनो तुम्हारा जनम किसी बड़े मकसद के लिए हुआ है यूँ मन् छोटा मत करो ....ये जगह तुम्हारे लिए नहीं ...."'"
वो पढ़ने में व्यस्त हो गई ....एक् किताब में पढ़ा कार्ल मार्क्स ने 1843 - 44 में कहा था एक लेख में " धर्म अफीम के समान है "
मुनिया पढ़े जा रही थी और सोचती जा रही थी .....आगे लिखा था मनुष्य ने धर्म का निर्माण किया है धर्म ने मनुष्य का नहीं ....और उसने ये भी पढ़ा और समझा की धर्म मनुष्य को एक प्रकार की भ्रामिक् ख़ुशी देता है ये लाइन पढ़ने के बाद उसने तुरंत बाबा को फोन लगाया .....उफ्फ्फ्फ़ जल्दी फोन उठाओ बुदबुदा रही थी तभी फोन उठा और आवाज आयी , " हेलो बोलो क्या हुआ , "
मुनिया चिल्लायी , " मुझे मेरा उद्देश्य मिल गया ....सुना तुमने मुझे मेरा उद्देश्य मिल गया मुझे सत्य का ज्ञान हो गया ,"
बाबा बोले , " साफ साफ कहो क्या बोलना चाहती हो , "
मुनिया बोली , "  हम् धर्म बेचेङे "
बाबा , " धर्म बेचोगी कैसे , "  और ये बताओ तुमसे धर्म ख़रीदेगा कौन ???""
मुनिया बोली , " तुमको तो पता है मेरे पास आने वालों में अफसर नेता डॉन गुंडा सभी हैं .....सबके कुछ न् कुछ राज हैं मेरे पास अब यही लोग मेरे प्रचारक बनेंगे , "
बाबा बोले , " यानी तुम अब धर्म  प्रकाश बिखेरोगी ",
मुनिया ," नहीं नहीं ....प्रकाश नहीं बाटेंगे ....प्रकाश बाटने से तो सभी प्रकाशवान् हो जाएंगे , ....फिर हमारे पास आएगा कौन ....हम् केवल प्रकाश फैलाने का भ्रम पैदा करेंगे ,"
तुम करो तैयारी हम् किसी दूसरे शहर से इसे शुरू करेंगे ....
ये दुनिया अँधेरे में है ....धर्म ऐसा क्षेत्र हैं जिसमें आपको कुछ भी झूठ बोलने की छूट है ....सभी झूठ को मान्यता मिल जाती है .....अब अगर आप पाँच और पाँच बारह बताएंगे तो कोइ भी भीड़ से जूता चला देगा ....पर धर्म के विषय  में ऐसा नहीं इसमें जूता नहीं चपलता चलता है ....उन्हें वो विषय बताओ जो उन्हें नहीं पता ....और ऐसे अपनी दुकान चलाओ ....
बाबा , " दुकान ???"
मुनिया , " हाँ दुकान ....ऐसी दुकान जहाँ लोग सोना चॉंदी हीरा रुपया पैसा ... संवेदना क्रोध सभी कुछ लेकर आते है और बदले में आभासी ख़ुशी लेकर जाते हैं ,"
बाबा , " और लोग नहीं आये तो , '" ???
मुनिया , " ऐसा हो ही नहीं सकता दुनिया भरी पड़ी है ऐसे लोगों से किसी का पति उसके पास नहीं आता है अपना पैसा दूसरे पर उडाता है किसी की सास उसे मारती है किसी का प्रेमी बिछ्द् गया है ....किसी को बच्चे की पढ़ाई की चिंता है किसी को लड़की का दूल्हा नहीं मिल रहा है ....बहुत लम्बी लिस्ट है ऐसे लोगों की......कहने का मतलब है कि ऐसे लोगों की दुकान कभी बंद नहीं होती ...चाहे मजार् हो या दरबार लोग जाते ही हैं ""
बाबा , " अच्छा फिर आगे क्या योजना है  ",
मुनिया बोली , " बस आप हमें देवी का अवतार घोषित करने की तैयारियाँ करिये ,'"
आज मुनिया और बाबा को अन्यत्र् अपना धंधा जमाये दस बारह बरस हो गये हैं ...मुनिया की भाषा वेशभूषा सभी कुछ परिवर्तित हो चुके हैं....राम दुलारे को ढूंढकर इस आश्रम के लिए आत्म बलिदान देकर आश्रम को प्रसिद्धि मिल चुकी है ...दूर दूर से लोग यहाँ माथा टेकने आते है मुनिया अब प्रेम की देवी है माँ राधा के नाम से जानी जाती है मग्न हो भक्तों के साथ नृत्य करती हैं क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी उनके दीवाने हैं ... एक दिन इन्हीं भक्तों में उसके साथ की तीन औरतें आयीं अपना दुःख लेकर ...पर वो सभी उसे पहचान गयीं और बोलीं , " अरे तू तू ही है माँ राधा ....क्या कमाल किया कुछ टिप्स हमें भी बता , "
अगले ही दिन सभी अख़बारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खि थी माँ राधे को अपने शरीर के सभी अंगों को समर्पित कर तीन भक्ति विभोर स्त्रीयो ने ईश्वर की शरण में अपना जीवन दान किया !
और अगले ही दिन से माँ राधा के दरबार में कई हजार नए भक्तों का आगमन हुआ और सभी जगह उनका बोलबाला एव्म् जयकारा रहा !!
  आज् वो दुनिया भर के प्रेमी प्रेमिकाओ को आशीर्वाद देती है शरण देती है और सभी उन्हें प्रेम का देवी मान शीश नवाते हैं !!!
   सच है धर्म बड़ी सुविधा देता है धर्म से ज्यादा सुविधजनक् कुछ भी नहीं धर्म का कोई प्रमाण नहीं हो सकता है ....कोई तर्क नहीं हो सकता ...यही करते करते आज मुनिया अर्थात राधा देवी कहाँ से कहाँ पहुँच गई ....उसे खुद नहीं पता उसके राहों में आने वाले कितने काँटो ( विरोधियों ) को वो कुचल् चुकी है ...आजकल सुना है उसकी दस्तक सियासत तक भी पहुँच गए है....आजकल उसके दरबार में सियासत वालों का आना जाना भी लगा रहता है ...जिन्हें वो नृत्य करते करते अक्सर अकाशिय् चुम्बन् देती रहती है और मन् ही मन् अपनी इस विराट अस्तित्व् और उसकी विशालता पर मुदित रहता है !!!

सीमा"मधुरिमा"
लखनऊ !!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 17 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. धर्म का व्यपार तो कर रहे हे लोग
    बढ़िया कहानी

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  3. थोड़े से फिर बदल के साथ अपनी राधे माँ की कथा लगती है। मार्मिक कथा, जो मन छू गयी। सीमा जी , हार्दिक शुभकामनायें🌹🌹🙏🌹🌹

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