मंगलवार, 7 जुलाई 2020

थाने में बयान / सुभाष चंदर





जनसंदेश टाईम्स में शनिवार के व्यंग्य स्तम्भ में मेरी पसंदीदा व्यंग्य रचना ' थाने में बयान '

थाने में बयान
-सुभाष चंदर

हलक में शराब, जिस्‍म में ताकत और सामने मिमियाती-सी बीवी हो तो कौन मर्द होगा जो दो-चार झापड़ ना रसीदे। सौ-पचास गालियों का खजाना ना लुटाए। दो-चार पैग पी के आराम से सो जाना, मरगिल्‍ले शहरी मर्दों को भाता होगा पर, अपने गांव-कस्‍बे में ऐसा कोई करे तो थू ससुरे की औकात पर। भला काहे की मर्दानगी ठहरी कि पन्‍द्रह रुपल्‍ली दारू में उड़ाओ, मुंह कड़वा करो, और गिरते-पड़ते आ जाओ चुपचाप घर l धत्त ,फिर दारू का फायदा क्‍या है। बंदा जब तक मौहल्‍ले-टोले के लोगों की मां-बहन एक ना करे, अपने दुश्‍मनों को युद्ध के लिये न ललकारे, घर में आकर बीवी-बच्‍चों को पांच-सात मर्तबा कूट-काट न ले तब तक मज़ा ही क्‍या। इन सब कार्यक्रमों से निबटकर खाना-वाना खाए। बाल-बच्‍चों के रुदन संगीत की ल‍हरियों में अपने खर्राटे मिलाए, तब तो हुआ पीना शराब का।
       अपने कस्‍बे में मर्द लोगों के दारू पीने का स्‍टाइल यही है। रामू की गिनती तो अच्‍छे-भले मर्दों में होती है। आज शाम भी वह अपने कुछ गमों को गलत करता, मुहल्‍ले-टोले को प्रसाद बांटता घर पहुंचा तो सामने पड़ गई मूरती। बस फिर क्‍या था। दनादन हाथ चले। लात चले। गालियां चलीं। यानी जितनी भी चीजें मर्दानगी के लिये ज़रूरी थीं, वे सभी चलीं। उसी अनुपात में मूरती की सिसकियां चलीं। बढ़ते-बढ़ते वे चीख-पुकार में बदल गईं। जब मूरती की चीखों की आवाज़ों के आगे रामूकी गालियों की आवाज़ दबने लगी तो मर्दों का माथा जो था, वह ठनक गया। थोड़ी देर ठनका। फिर खास हिन्‍दुस्‍तानी स्‍टाइल में उन्‍होंने ‘हमें क्‍या मतलब’ का नारा लगाया और बैठ गए। पर मूरती की चीखों का बाढ़ का पानी उन्‍हें कुछ ज्‍यादा ही भिगोने लगा। सो कुछ तो इस पानी से खुद को गीला हो जाने की मज़बूरी के कारण और कुछ बाढ़ के स्रोत को जानने की इच्‍छा से और कुछ बैठे-ठाले के तमाशे के लिये रामू के घर में प्रवेश कर गए। मर्द लोग घर में समा गए। महिलाओं ने खिड़की-दरवाजे खोल लिये। इक मंजि़ले मकान वाली महिलाओं की विवशता थी, सो उन्‍होंने आंखों देखे हाल की जगह कानों सुने हाल पर सब्र किया। अलबत्‍ता कानों का मैल जरूर साफ कर लिया गया ताकि आवाज़ के आवागमन में कोई रुकावट न पड़े।
भीड़ का रेला घर में घुसा। सब थे, नन्‍नू काका, बिलेसुर चाचा, विनोद भैया सब के सब। भीड़ के मुंह से ‘क्‍या हुआ-क्‍या हुआ’ का समवेत स्‍वर वातावरण में गूंजा तो रामू के हाथों को ब्रेक लग गए। मगर गालियों का साभिनय प्रसारण चलता रहा। गालियों के बीच से ही जो बात निकली उसका आशय यह था कि वह यानी रामू सुबह का थका-हारा शाम को जरा सा कड़वा पानी क्‍या पी आया कि मूरती उइलने लगी। साली औरत जात की यह मजाल कि मर्द के मुंह लगे। सो दो-चार हाथ धर दिए। बस यही जरा सा लफड़ा है।
मर्द इस बात पर कतई समहत थे। वाकई औरतों को मर्दों के मुंह नहीं लगना चाहिए। कुछ ने मन ही मन रामू की बहादूरी की प्रशंसा भी की। कुछ ने घर जाने के बाद यह प्रतिक्रिया अपनी पत्नियों को दिखाने की भावी रण‍नीति पर भी विचार किया। बाकी सब कुछ तो ठीक था। ऐसा तो मुहल्‍ले-टोले में चलता ही रहता है। पर ये मूरती इतना काहे चीख-चिल्‍ला रही है। कुछ बुजुर्गों का ध्‍यान इस ओर गया कि मूरती की आंखों से आंसू और होठों से सिसकियों के अलावा सिर से भी खून जैसा कुछ बह रहा है। सो अब वे कुछ गंभीर हुए। अब तो वाकई कुछ करना था। सो किया गया, बाकायदा किया गया। जैसा कि ऐसे मौके पर अपेक्षित था। यानी रामू को खूब डांटा गया। भविष्‍य में हाथ-पैर चलाते समय सिर बचाने की हिदायत दी गई। अभी इधर वह डांट फटकार कार्यक्रम चल ही रहा था कि किसी भली मानुषी ने पड़ोस के मोहल्‍ले में रहने वाली मूरती की मां को खबर दे दी। बुढि़या घर में अकेली थी। सो अकेली ही दौड़ती चली आई। पीछे-पीछे उसकी पड़ोसनें भी लग लीं।
अब कहानी में थोड़ा रोमांच पैदा हो गया। मर्द थोड़ा कम हो चले। डिपार्टमेंट औरतों का था सो मर्दों की खाली जगह औरतों ने भरनी शुरू कर दी। बुढ़िया ने आते ही रामू को धर लिया। गालियों के समुन्दर में ज्वार आ गया। रामू पूरा भीग गया। बुढ़िया गालियां देती रही। रामू सिर झुकाकर सुनता रहा। मूरती का खून भh बदस्तूर बहता रहा। वो तो भला हो पड़ोसन का कि उसने देख लिया। उसने पड़ोसी धर्म का निर्वाह करते हुए बुढ़िया के इशारा कर दिया। बस बुढ़िया मार्थ पर हाथ मारकर धम्म से बैठ गयी और कुछ यूं बुदबुदाई-”हाय! राक्षस ने मेरी फूल सी बेटी को मार डाला। अब तो मैं पुलिस में जाऊंगी । इसे थाना-जेहल  कराऊंगी। अब ना छोडूंगी इसे।”पुलिस का नाम सुनते ही बचे-खुचे मर्द भी पीछे हो गए। औरतों ने इंदिरा गांधी का राज देखा था। वे डटी रहीं। आगे के दृश्य में सिर्फ इतना जुड़ा। मूरती को लेकर खिचड़ती सी बुढ़िया आगे-आगे और पीछे औरतों की भीड़। सबके पास कुछ न कुछ था। बुढ़िया के मुंह में गालियां थीं,मूरती के मुंह में कराहट के साथ-साथ सिर से बहता खून था और औरतों के पास थीं कानाफूसियां और ‘अब क्या होगा’कैसे कुछ शाश्वत किस्म के सवाल। थाने के दरवाजे तक आते-आते भले भर की महिलाएं तो पतली गली से खिसक लीं। अब बस कुछेक दमदार महिलाएं और पुल्लिंग के नाम पर महज मूरती का खिजलाया मरियल कुत्ता भर बचा।
बुढ़िया थाने के गेट पर आकर थोड़ा ठिठकी। मूरती ने रोने के कार्यक्रम की जगह सिसकने के अभियान पर जोर देना शुरू किया और साथ ही साथ उसने अपने पैरों में रिवर्स गियर लगाना शुरू कर दिया। पर बुढ़िया को उसका युद्ध क्षेत्र से पलायन क प्रयास पसंद नहीं आया। सो बुढ़िया के पीछे लगभग घिसटती हुई मूरती को भी आना पड़ा। इन दोनों के पीछे थे-”हाय राम,अब क्या होगा”का उवाच करते हुए दस-बारह नारी शरीर।
बुढ़िया ने गेट के बाहर खड़े होकर अन्दर के दृश्य का जायजा लिया। थाने का दृश्य काफी मनोहारी था। रात्रि का समय था। बल्ब की रोशनी में मेज के पीछे बैठें थानेदार की मूंछे दूर से नजर आ रही थीं और मूंछों के ऐन सामने पड़ी सोमरस की बोतल भी। थानेदार की आंखें लाल थीं। मुंह से धुआं निकल रहा था। लगता था कि जड़ से मिटाने के लिये क्राइम की सारी आग वह पी बैठा था,अब सिर्फ धुआं निकाल रहा था। उंगलियों में दबी सिगरेट तो महज एक बहाना थी। थाने के कोने की एक बेंच पर जहां थोड़ी रोशनी कम थी,वहां पहले बोतल दिखाई दी,उसके साथ ही चार गिलास,चार जोड़ी हल्की मूंछे और उनके नीचे कुछ बीड़ियां। यहां अपराध निवारण का जोर थोड़ा कम था। वैसे भी सिगरेट-बीड़ी का अंतर प्रोटोकोल का सवाल था।
इस दृश्य को देखकर बुढ़िया बहुत प्रभावित हुई। सो उसने गेट पर खड़े संतरी को दीवानजी राम-राम कीे भेंट प्रदान की। संतरी ने पहले बुढ़िया देखी। बुढ़िया के कपड़े देखे। पीछे की भीड़ देखी। इस निरीक्षण से निपटने के बाद उसने पहला काम सवाल दागने का किया-”ऐ बुढ़िया! कहां घुसी जा रही है?अपने बाप का घर समझ रखा है क्या?पता नहीं है ये थाना है और शोर क्यों मचा रही है।’साब का मूड पहले ही खराब है। चल पीछे हट।”
संतरी के गुड़ से मीठे वचन सुनकर बुढ़िया ने बाकायदा और जोर से रोना चिल्लाना शुरू कर दिया। जल्दी ही बुढ़िया का मकसद पूरा हो गया। अंदर आवाज पहुंच भी गई और बदले में आवाज़ बाहर भी आ गई-”अबे ओ रामकिशन! देख हरामजादे,कैसा शोर मच रहा है। साले आराम से काम भी नहीं करने देते। इसी के साथ ही कुछ भारी-भरकम आवाज़ें और आईं जिनका मूल उद्देश्य भीड़ की मां-बहनों से जुड़कर जातिगत सद्भाव कायम करने का था। संतरी बुढ़िया की चीख-पुकार के बीच सुने मतलब के शब्दों को जाकर थानेदारजी को बता आया।थानेदारजी  ने बचा-खुचा काम भी पूरा कर लिया और खाली बोतल को मेज के नीचे रख कर उसे आंख के इशारे से  उन लोगों को अन्दर भेजने के लिये कहा।
फिर क्या था,अब तो बुढ़िया में हिम्मत आ गईं। सो वह मूरती को घसीटते हुए सीधी थानेदारजी जी के दरबार में हाजिर हुई। अन्दर जाकर उसने थानेदारजी को बता दिया कि उसे अपने दामाद के खिलाफ रपट लिखानी है,जो उसकी बेटी को रोज मारता है। दो-चार थप्पड़ होते तो कोई बात नहीं थी मगर आज तो उसने उसका सिर ही खिला दिया है।
थानेदारजी जी ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी। उसके बाद पहले बुढ़िया का परीक्षण किया,फिर मूरती का। मूरती में उन्हें काफी संभावनाएं नजर आईं। साथ ही माथे पर लगी चोट और उससे बहता खून भी दिख गया। बहते खून को देखकर उनकी संवेदना भी बहने का अभ्यास करने लगी। उनका फर्ज गर्म होकर चिल्लाया-”स्‍साली बुढ़िया,इसकी पट्टी क्या तेरा बाप करायेगा। ले आते हैं हाथ-पैर तोड़कर,जैसे सरकार ने इनकी मरहम-पट्टी कराने का ठेका ले रखा है। ऐ दीवान जी,पकड़ो इस बुढ़िया को। इसके पास पैसे होंगे।”
बुढ़िया को शायद पुलिस से ऐसे ऊंचे किस्म के स्वागत-सत्कार की आशा नहीं थी। सो वह पीछे हटी। मगर दीवान जी को तो अपनी ड्यूटी पूरी करनी थी। उन्होंने बुढ़िया के हाथ से पैसों का रूमाल छीनने की कोशिश की। बुढ़िया ने काफी शोर-शराबा किया। पिलपिले स्वर में बार-बार रिकाॅर्ड बजाया कि रूमाल में चार सौ रुपये हैं। पट्टी तो पचास रुपये में हो जाएगी। वगैरह-वगैरह। लेकिन दीवान जी पुलिस की पुरानी नौकरी में थे। ऐसे मसले देखना उनकी रोज की आदत में शुमार था। सो वे दोनों हाथ प्रयोग में लाए। एक हाथ से बुढ़िया का रूमाल छीना,दूसरे हाथ से रुपयों की रसीद उसके मुंह पर लगा दी। इसके बाद उनके शरीर के बाकी अंग विशेष रूप से पैर सक्रिय हो गए और ऐन थानेदारजी की सीट के पास जाकर रुके।
थानेदारजी के मुंह से बोल फूटे-”कितने हैं?”
-”हजूर! तीन सौ।”(शायद दीवान जी की जुबान लड़खड़ा गयी थी क्योंकि उन्होंने कुछ देर पहले पूरे चार सौ गिने थे।)
-”ठीक है एक हाॅफ ले आ अरिस्टोक्रेट का और थोड़ा नमकीन भी। इन सालों के चक्कर में सारी उतर गई”थानेदारजी  उवाचे।
इसके बाद दीवान जी फिर गेट की ओर जाते दिखाई दिए। बुढ़िया अब फिर चीखने-चिल्लाने लगी-"हजूर! पैसे तो ले लिये अब तो इसकी पट्टी कराइये फिर उस रामू के बच्चे को तो जेल में बन्द कराइये।"
थानेदारजी को कानून के काम में दखल देने वाले लोग कभी पसंद नहीं रहे। सो उनकी आवाज़ में कानून चीख पड़ा-”हरामजादी,इत्ते से रुपयों में दामाद को जेल कराएगी।”फिर थोड़ा सांस लेने को रुके। इसी अन्तराल में उन्हें मूरती के प्रति उन्हें अपना कर्तव्य याद आया। सो इस बार उनके मुख से सीधा कर्तव्य निकला,-”इस लड़की की यहीं छोड़ जा। इसकी मरहम-पट्टी करायेंगे। इसकी जांच होगी। इसका बयान लिया जायेगा। तभी इसका घरवाला गिरफ्तार होगा?जा अब और सुबह से पहले यहां दिखाई मत देना,वरना टांग तोड़ दूंगा।
बुढ़िया को सांप सूंघने की कहावत चरितार्थ करने का मौका मिल गया। कहावत के चरितार्थ होने के बाद ही वह चीखी-”नहीं हुजूर! माई-बाप,हम पट्टी अपने आप करा लेंगे। हमें अब जाने दीजिए।”ऐसा भला कौन-सा थानेदार होगा जो अपने कर्तव्य की राह में रोड़े अटकने दे। सो वह कड़ककर बोले-”क्यूं,अब नहीं लिखानी रपट ? अब नहीं कराना अपने दामाद को अन्दर ? खेल समझ रखा है कानून को ? तेरे कहने पर जिसे चाहें अन्दर कर दूं,जिसे चाहे बाहर। अब ये औरत तो सुबह जांच पूरी होने के बाद ही वापस जाएगी,समझी। चल भाग यहां से। कानून को अपना काम करने दे।”थानेदारजी के कर्तव्य से भीगे वचन सुनकर बुढ़िया रोने लगी।  सिर का खून मूरती की आंखों में भी उतर आया। बुढ़िया के साथ की औरतें भी खुसुर-पुसुर करने लगीं।
एक दमदार सी औरत इस पर थानेदारजी से चिरौरी करने लगी-”हुजुर! हमसे गलती हो गई। हम अब कभी थाने नहीं आयेंगे। अब इस बुढ़िया को माफ कर दीजिए और मूरती को छोड़ दीजिए।”एक और की जुबान खुली-”ऐसा किस कानून में लिखा है कि जो रपट लिखाने आए,उसे ही रोक लें। हुजूर ये औरत है?अगर रात भर ये थाने में रही तो इसकी इज्जत क्या रहेगी?”
थानेदार ने उस औरत को कानून की पैनी नज़रों से देखा। फिर अपने फर्ज की कैंची से उसकी बात बीच में ही काट दी। बोला-”सरपंचनी की बच्ची। हमें कानून सिखाती है। अबे ओए रामदीन। पकड़ ले,इस साली कानून वाली को भी। वैसे भी इस केस में गवाही की ज़रूरत पड़ेगी। इसका भी बयान साथ ही ले लेंगे।”रामदीन के आगे बढ़ते ही औरत के कानून को पंख लग गए। बाद के दृश्य में वह आगे-आगे और पीछे-पीछे भागता सन्तरी दिखाई दिया। सन्तरी के पीछे बाकी औरतें भी कानून के पंजे से निकल गई। अब बुढ़िया अकेली रह गई।
आगे के दृश्य में बुढ़िया ने थानेदार के पैर पकड़ लिये। थानेदार को पैंट की क्रीज बिगड़ने का खतरा लगा। सो उसने बुढ़िया को दो लात जमाकर पैंट के खाकीपन की लाज रख ली। थानेदार जी को अकेले कर्तव्य पालन करते देख सन्तरी को अपने हिस्से का फर्ज याद आ गया सो वह बुढ़िया को धकियो हुए गेट के बाहर तक छोड़ आया।
थानेदारजी का बचा काम अब शुरू होने वाला था। उसकी मेज पर एरिस्ट्रोक्रेट का अद्धा लग चुका था। सो उन्होंने हाफ और चार अण्डे की भुजियां निबटाई। उसकी पावती के रूप में डकार देने के बाद वह अन्दर कमरे की ओर बढ़ गयें वहां कमरे में दो सिपाही मिलकर मूरती को बयान देने को तैयार कर रहे थे। मगर मूरती थी कि बयान देने के नाम पर चीख-चिल्ला रही थी। सो उसके मुंह में उसकी साड़ी का पल्लू ठूंस दिया गया।
थानेदार को अफसोस था कि लोग कानून को सहयोग नहीं करते। पर उसे तो इस असहयोग के बाद भी कानून का काम करना था। सो वरिष्ठता क्रम में पहले उसने मूरती का बयान लिया। उसके बाद दीवान जी और सबसे बाद में सिपाहियों का बयान लेने का नम्बर आया। बरात भर मूरती का बयान चलता रहा। बयान चलता रहा,मूरती के सिर से खून बहता रहा। मूरती के सिर की मरहम-पट्टी कानूनन हो भी नहीं सकती थी। आखिर सबूत को नष्ट कैसे किया जा सकता था ?
बयान देते-देते सुबह तक मूरती नहीं रही,सिर्फ सबूत रहे। उन्हीं सबूतों के आधार पर पुलिस ने मूरती के पति को गिरफ्तार कर लिया। दोपहर के अखबारों में एक खबर छपी कि शराब के नशे में रामू नाम के एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी मूरती का खून कर दिया। पति घटनास्थल से ही गिरफ्तार। बाकी खबर में पुलिस की कार्य कुशलता की तारीफ छपी थी। आखिर पुलिस ने इतने कम समय में, इतनी मेहनत से कातिल को पकड़  जो लिया था।
इस बार कानून के घर में न देर थी,न अन्धेर।


मोब -09311660057


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