मंगलवार, 14 जुलाई 2020

बांसगांव की मुनमुन / दयानंद पाण्डेय




गिरधारी राय के बच्चे हालां कि अभी छोटे थे पर छोटा भाई अब बड़ा हो गया था। इंटरमीडिएट का इम्तहान भले ही नहीं पास कर पाया वह पर पिता के रसूख़ के बल पर उस की शादी एक अच्छे परिवार में तय हो गई।

तब के दिनों की शादी में बारात तीन दिन की हुआ करती थी। रामबली राय के छोटे बेटे गंगा राय की शादी भी तीन दिन वाली थी। मरजाद के दिन की बारात का दृश्य गांव के पुराने लागों की आंख और मन में आज भी जस का तस बसा हुआ है। लोग जब-तब आज भी उस का ज़िक्र चला बैठते हैं। बारात का तंबू काफ़ी बड़ा था। आम का बड़ा और घना बाग़ीचा था।

तंबू के पश्चिम की ओर बीचो-बीच कालीन पर मसनद लगाए रामबली राय बैठे थे। सामने संदूक़ बग़ैरह सजे थे जैसा कि उन दिनों बारात में चलन था। रामबली राय दुल्हे के साथ ऐसे अकड़ कर बैठे थे जैसे अकबर अपना दरबार लगाए बैठे हों। और जब घर के मुखिया किसी शहंशाह की तरह पेश आ रहे थे तो राजकुमार लोग भला कैसे पीछे रहते?

गिरधारी राय ने तंबू का दक्षिणी सिरा पकड़ा और मुनक्का राय ने उत्तरी सिरा। दोनों नहा धो कर मूंगा सिल्क का कुरता पहन कर अपने-अपने तख़त पर मसनद लगा-लगा कर विराजमान हो गए। दोनों के साथ आस-पास चारपाइयां बिछा कर उन के दरबारी भी बैठ गए। अब बारात से कोई रिश्तेदार विदा मांगने जाता था या फिर आता तो रामबली राय का पैर छू कर बारी-बारी इन दोनों के पास भी अभिवादन के लिए जाता।

अगर कोई पहले गिरधारी राय के पास आता तो वह बैठे-बैठे लेकिन सिर झुका कर हाथ जोड़ कर पूछते, 'अच्छा तो जा रहे हैं? प्रणाम!' और जो जाने वाला रामबली राय के बाद पहले मुनक्का राय के पास पहले चला जाता फिर गिरधारी राय के पास आता तो उन के पास आता तो उन की भौंहें तन जातीं। बोलने का सुर बदल जाता। बल्कि तीखा हो जाता। बड़ी लापरवाही से कहते, 'जा रहे हैं? प्रणाम!' और यह प्रणाम वह ऐसे बोलते जैसे जाने वाले को उन्हों ने प्रणाम नहीं किया हो जूता मारा हो। ठीक यही दृश्य मुनक्का राय की तरफ भी घटता।
उन की तरफ जो कोई पहले आता तो वह प्रणाम ऐसे विनम्र हो कर करते जैसे प्रणाम नहीं फूलों की बरसात कर रहे हों। और जो कोई गिरधारी राय की तरफ से हो कर आता तो प्रणाम ऐसे करते जैसे भाला मार रहे हों। लेकिन यह दृश्य ज़्यादा देर नहीं चला।

कुछ मुंहलगे लोग मुनक्का राय के पास इकट्ठे हो गए। और उन से मुग़ले आज़म के डायलाग्स सुनाने का अनुरोध करने लगे। थोड़े ना नुकुर के साथ उन्हों ने डायलाग्स सुनाने शुरू कर दिए। कभी वह सलीम बन जाते तो कभी अकबर तो कभी अनारकली के हिस्से के ब्यौरे बताने लगते। और फिर 'सलीम तुझे मरने नहीं देगा और अनारकली हम तुम्हें जीने नहीं देंगे।' सुनाने लगते पर जल्दी ही उन्हों ने डायलागबाज़ी बंद कर दी। फिर तरह-तरह की चर्चाएं और क़यास शुरू हो गए मुनक्का राय को ले कर।

मुनक्का राय की कई बातें जो कभी उन के हिस्से का अवगुण थीं, अब उन के गुण बन उस शेर को फलितार्थ कर रही थीं कि, 'जिन के आंगन में अमीरी का शजर लगता है/उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है।' मुनक्का राय अब यहां मुनक्का बाबू हो चले थे। लोग बतिया रहे थे कि अइसे ही थोड़े, मुनक्का बाबू जब छोटे थे, मिडिल में पढ़ते थे तबै से रात-रात भर घर से भागे रहते थे, नौटंकी देखने ख़ातिर। और जब शहर में पढ़ते थे तो भले एक क्लास में दू साल-तीन साल लग जाता था लेकिन पिक्चर तो वह फर्स्ट डे-फर्स्ट शो ही देखते थे। और ई मुग़ले आज़म तो लगातार तीन महीने बिना नागा रोज देखे थे। रिकार्ड था भइया। वइसे थोड़े आज भी उन को एक-एक डायलाग याद हैं। एक बार तो भइया इन का साला शहर गया अपनी बीवी का इलाज करवाने। डाक्टर-वाक्टर को दिखाया। दवा लाने की बात हुई तो मुनक्का बाबू को पैसा दिया यह सोच कर कि पढ़े लिखे हैं, दुकानदार घपला नहीं करेगा। भेजा मुनक्का बाबू को दवा लेने। पर मुनक्का बाबू तो पैसा लिए और चले गए मुग़ले आज़म देखने। अइसा नशा था मुनक्का बाबू को मुग़ले आज़म का। साला इंतज़ार ही करता रह गया। बीवी की दवा का। खैनी ठोंक कर।

मुनक्का बाबू की मुग़ले आज़म गाथा की तंद्रा तब टूटी जब एक टीन एजर लड़के ने टोका। और मुनक्का बाबू से पूछा कि, 'ऐसा क्या था मुग़ले आज़म में जो तीन महीने लगातार देखने जाते रहे?' पहले तो उन्हों ने उस टीन एज लड़के की बात पर ध्यान नहीं दिया। पर उसने जब दो से तीन बार यही सवाल दुहराया तो वह खिन्न हो गए। पर बोले धीरे से, 'अरे मूर्ख सिर्फ़ देखने नहीं, समझने जाता था उस के डायलाग्स! हिंदी में तो थे नहीं। उर्दू और फ़ारसी में डायलाग्स थे।' उन्हों ने बैठे-बैठे बैठने की दिशा बदली, हवा ख़ारिज किया और ताली पीटते हुए बोले, 'तो डायलाग्स समझने जाता था। और फिर जब डायलाग्स समझ में आने लगे तो उस की मुहब्बत का जो जादू था, जो नशा था और जो मुहब्बत का इंक़लाब था उस में, वह मज़ा देने लगा।' कहते हुए वह ऊपर आम के पेड़ को निहारने लगे। फिर मुग़ले आज़म का ही एक गाना धीरे से बुदबुदाए, 'पायल के ग़मों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं।'

इधर मुनक्का बाबू के कैंप में मुग़ले आज़म और मुहब्बत की दास्तान ख़त्म भी नहीं हुई थी कि गिरधारी राय के कैंप में तू-तड़ाक शुरू हो गया। लगा कि मारपीट हो जाएगी। गिरधारी राय फुल वैल्यूम में आग बबूला थे, 'बताइए इस दो कौड़ी के आदमी की औक़ात है कि हम को झूठा कहे!'

'झूठ?' वह आदमी चिल्लाया, 'सरासर झूठ बोल रहे हैं आप। जिस को सफ़ेद झूठ कहते हैं।'

'देखिए फिर-फिर... फिर हम को झूठा कह रहा है।' गिरधारी राय अब लगभग उस व्यक्ति को पीट देना चाहते थे। वह व्यक्ति किसी डिग्री कालेज में लेक्चरर था। और कन्या पक्ष की ओर से था। बरात में बस यों ही औपचारिक रूप से पूछताछ करने आया था कि, 'बारातियों को कोई दिक्क़त-विक्क़त तो नहीं है?' फिर बैठ गया गपियाने के लिए। मिल गए गिरधारी राय। पहले तो सब कुछ औपचारिक रहा। पर जब गिरधारी राय ने देखा कि यह डिग्री कालेज का मास्टर उन के ऊपर कुछ ज़्यादा ही रौब गांठ रहा है। तो उन्हों ने बड़ी विनम्रता से उसे बताया कि वह भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पढ़े हुए हैं। बात की रौ में पहले उन्हों ने झोंका कि, 'वह भी एल.एल.बी हैं।'

'तो वकालत कहां करते हैं?' उस ने पूछा।

'वकालत?' गिरधारी राय ने बताया कि, 'समय कहां है वकालत के लिए?'

'क्यों तब और क्या करते हैं?' लेक्चरर की उत्सुकुता बढ़ी।

'घर की ज़िम्मेदारियां हैं। राजनीति की व्यस्तता है।' फिर इसी रौ में उन्हों ने झोंक दिया कि, 'पी.सी.सी. के भी मेंबर हैं वह।'

'पी.सी.सी.?'

'प्रदेश कांग्रेस कमेटी।' गिरधारी राय ने उसे रौब में लिया, 'इतना भी नहीं जानते मास्टर साहब!'

'मैं मास्टर नहीं हूं किसी प्राइमरी स्कूल का, डिग्री कालेज का लेक्चरर हूं।' हर्ट होते हुए वह बोला।

'हां-हां, वही-वही। जो भी हो।' गिरधारी राय ने उसे बातचीत के निचले पायदान पर ही रखा।

'पर बैठे ठाले पी.सी.सी. का मेंबर होना तो इतना आसान नहीं है राय साहब!' उस ने अपनी राजनीतिक समझ और सूचना की तफ़सील में जाते हुए कहा।

'क्यों नहीं आसान है?' गिरधारी राय बोले, 'आप को पता है हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता मेरे क्लासफे़लो रहे हैं?'

'अब राय साहब आप ज़रा ज़्यादा बोल रहे हैं।'

'क्या?' गिरधारी राय बमके।

'आप सरासर झूठ बोल रहे हैं।' वह लेक्चरर भी भड़क गया।

'तुम्हारी यह हिम्मत कि मुझे झूठा बता रहे हो?'

'मैं बता नहीं रहा हूं।' वह और भड़का, 'आप सरासर झूठ बोल रहे हैं और बदतमीज़ी भी कर रहे हैं।'

'अब तुम चुप रहो और जाओ यहां से।' गिरधारी राय चीख़े। भीड़ इकट्ठी हो गई इस चीख़ से। सारे बाराती इकट्ठे हो गए। कुछ कन्या पक्ष के लोग आ बटुरे। मामला बढ़ता देख बारात में आए एक वकील खरे साहब ने बीच बचाव किया। गिरधारी राय और उस लेक्चरर के बीच की दूरी बढ़ाई और धीरे से पूछा उस लेक्चरर से कि, 'आखि़र बात क्या है?'

'बात यह है कि यह दो कौड़ी का मास्टर मुझे झूठा बता रहा है।' गिरधारी राय बीच में ही कूद पड़े।

'अब आप बताइए कि क्यों इन को झूठा कह रहे हैं?' हाथ जोड़ कर खरे साहब ने उन लेक्चरर साहब से पूछा।

'बताइए यह कह रहे हैं कि हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी दोनों इन के क्लासफे़लो रहे हैं।'

'ठीक कह रहा हूं।' गिरधारी राय किचकिचाए।

'क्या इन सब की तरह आप हम को भी जाहिल समझ रहे हैं?' लेक्चरर डपटा, 'यह संभव ही नहीं है। दोनों की उम्र का फ़ासला आप को मालूम भी है? कम से कम दस साल का गैप है। और यह कह रहे हैं कि दोनों इन के क्लसाफ़ेलो रहे हैं, यह भला कैसे संभव है?'

'मैं समझ गया, मैं समझ गया।' खरे साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर उस लेक्चरर से कहा, 'देखिए आप की दुविधा भी सही है, और इन का कहना भी सही है।'

'मतलब?' लेक्चरर अचकचाया, 'दोनों ही कैसे सही हो सकते हैं?'

'हैं न?' खरे साहब ने हाथ जोड़े हुए कहा, 'देखिए गिरधारी राय जी जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गए तो बहुगुणा जी इन के क्लासफे़लो थे। बहुगुणा जी पढ़ कर चले गए। पर गिरधारी राय जी पढ़ते रहे। पढ़ते रहे। पढ़ते ही रहे कि नारायण दत्त तिवारी जी पढ़ने आ गए। तब नारायण दत्त तिवारी भी इन के क्लासफे़लो हो गए!'

'फिर नारायण दत्त तिवारी पढ़ कर चले गए। और यह पढ़ते रहे।' लेक्चरर ने बात पूरी करते हुए मुंह गोल कर मुसकुराते हुए कहा, 'तो यह बात है!'

'तब?' खरे साहब ने जैसे समाधान का क़िला जीतते हुए कहा, 'मतलब यह कि गिरधारी राय जी झूठ नहीं बोल रहे हैं।' फिर वह ज़रा रुके और अंगरेज़ी में उस से पूछा, 'इज़ इट क्लीयर?'

'एब्सल्यूटली क्लीयर!' लेक्चरर मुसकुराते हुए बोला, 'इन के सच पर तो कोई चाहे रिसर्च पेपर तैयार कर सकता है।'

'मतलब गिरधारी चाचा फ़ुल फ़ेलियर हैं!' एक टीन एजर लड़का छुट से बोला।

'भाग सारे यहां से!' खरे साहब ने लड़के को झिड़का।

बाद में मुनक्का बाबू ने इस पूरे प्रसंग का फुल मज़ा लिया। और गिरधारी राय ने बहुत सूंघा कि कहीं इस सब के पीछे मुनक्का की साज़िश तो नहीं थी? क्यों कि उन को लग रहा था कि इस पूरे प्रसंग में उन का अपमान हो गया है। बाद के दिनों में उन्हों ने मुनक्का बाबू और उन के परिवार को कई पारिवारिक खु़राफ़ातों से तंग किया। फिर तो उन की खु़राफ़ातें गांव के स्तर पर भी शुरू हो गईं। गांव हर बार बाढ़ में डूब जाता था। बांध बनाने की योजना बनी, बजट आया। पर बांध नहीं बना। जिस-जिस के खेत बांध में पड़ते थे उन्हों ने उन में से कुछ लोगों को ऐसे कनविंस किया कि तुम्हारा खेत तो बांध में जाएगा ही, गांव में भी विनाश आ जाएगा। तीन चार मुक़दमे हो गए। बहुत बाद में गांव वालों को गिरधारी राय की खु़राफ़ात और साज़िश दिखी तो उन को समझाया-बुझाया। सब कुछ सुन समझ कर गिरधारी राय बोले, 'दो शर्तों पर बांध बन सकता है। एक तो हमें प्रधान बनवाओ निर्विरोध, दूसरे बांध का पेटी ठेकेदार मैं ही होऊंगा कोई और नहीं।'

गांव वालों ने उन की दोनों शर्तें नामंज़ूर कर दीं। उलटे कुछ लड़कों ने उन्हें एक रात रास्ते में घेर लिया। उन के साथ बदतमीज़ी से पेश आए और धमकाया कि, 'अपना शैतानी दिमाग़ अपने पास रखिए, नहीं ले चल कर नदी में मार कर गाड़ देंगे। पंचनामे के लिए भी लाश नहीं मिलेगी।'

गिरधारी राय डर गए। गांव छोड़ बांसगांव रहने लगे। बांसगांव में उन का परिवार भी था और मुनक्का राय भी। अब वह मुनक्का राय से खटर-पटर करने लगे। पिता ने समझाया भी गिरधारी राय को कि, 'मुनक्का को परेशान मत करो।'

पर गिरधारी राय कहां मानने वाले थे। मुनक्का परेशान हो गए। रामबली राय के पास गए फ़रियाद ले कर और कहा कि, 'मैं अब अपने रहने का अलग इंतज़ाम करना चाहता हूं। आप की इजाज़त चाहता हूं।'

'देखो मुनक्का तख़ता तो तुम्हारा मैं ने पहले ही अलग कर दिया था यह सोच कर कि अब तुम लायक़ वकील हो गए। कब तक मेरे जूनियर बन कर मुझे ढोओगे?' वह बोले, 'पर अभी इतने लायक़ नहीं हो गए हो कि घर से भी अलग कर दूं। कम से कम जब तक हम दोनों भाई ज़िंदा हैं तब तक तो अलग होने की कभी सोचना नहीं। सोचो कि लोग क्या कहेंगे? हां, रही बात गिरधारी से तुम्हारी मतभिन्नता की तो उस का भी मैं कुछ सोचता हूं। और फिर तुम जानते ही हो कि ख़ाली दिमाग शैतान का घर है।'

मुनक्का मन मसोस कर रह गए। लेकिन बीच का रास्ता उन्हों ने यह निकाला कि शाम को कचहरी के बाद ज़्यादातर दिनों में गांव जाने लगे। फिर तो धीरे-धीरे वह गांव से ही आने-जाने लगे। आने-जाने की दिक्क़त अलग थी, मुवक्किलों की अलग। प्रैक्टिस गड़बड़ाने लगी। इसी बीच एक नई तहसील बन गई गोला। रामबली राय ने मुनक्का को बुलवाया और कहा कि, 'देख रहा हूं तुम्हारी दिक्क़त यहां बढ़ती जा रही है। तुम गोला क्यों नहीं चले जाते?'

मुनक्का बांसगांव नहीं छोड़ना चाहते थे। पर अब चूंकि रामबली राय का संकेतों भरा आदेश था तो वे बेमन से गोला चले गए। लेकिन गोला में उन की प्रैक्टिस ठीक से नहीं चली। बच्चे बड़े हो रहे थे और ख़र्च भी। दो ढाई साल में ही वह फिर से बांसगांव लौट आए। रामबली राय भी अब वृद्ध हो रहे थे। पर मुनक्का की प्रैक्टिस शुरू हो गई। उन्हीं दिनों मुनमुन पैदा हुई।

[ बांसगांव की मुनमुन उपन्यास से । पूरा उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए लिंक पर क्लिक करें । ]




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