रविवार, 12 जुलाई 2020

किताब गली




किताब गली
नाटक, कहानियां, लघुकथाएं, उपन्यास - साहित्य की तकरीबन हर विधा पर हाथ मांज चुके असगर वजाहत ने यात्रा वृ्त्तांतों के कदरन एकरेखीय संसार में 'स्वर्ग के पांच दिन' के जरिए नया और दिलचस्प अध्याय जोड़ दिया है...

हंगरी में एक हिंदुस्तानी
स्वर्ग में पांच दिन
यायावर : असगर वजाहत
प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली
मूल्य : 395 रुपए

चर्चित रचनाकार असगर वजाहत सिर्फ कलम नहीं चलाते, बल्कि यायावरी भी करते हैं और खुद को 'सोशल टूरिस्ट' बताते हैं। कुदरत के नज़ारों से बावस्ता होते हुए वे जगहों पर तो गौर करते ही हैं, साथ में वाह्य-स्थूल सौंदर्य के अंदर छुपे अर्थ भी तलाश करते हैं। दीगर बात है कि उनके इस अर्थान्वेशी स्वरूप से कई बार कुछ पाठकों की मान्यताएं और वैचारिक स्थापनाएं विचलित हो सकती हैं। मसलन- वे हंगरी को कश्मीर के समतुल्य बताते हुए कह देते हैं कि मुगल सम्राट शाहजहां अगर वहां गया होता तो उसे ही ‘धरती का स्वर्ग’ कहता। इसी क्रम में वजाहत 'हूर' शब्द की व्याख्या भी करते हैं। चूंकि किताब असगर वजाहत के निजी अनुभवों का सार है, ऐसे में इसकी तथ्यात्मक विश्वसनीयता स्थापित हो जाती है।
'स्वर्ग में पांच दिन' उनके हंगरी प्रवास और भ्रमण के संस्मरणों का संग्रह है, जो वजाहत की सुंदर और अर्थवान भाषा से संपन्न है। वे साफ करते हैं कि किताब में हंगरी के इतिहास, समाज या राजनीति का अध्ययन नहीं है, फिर भी असगर की खासियत है - समय, समाज, संबंधों की ऐतिहासिक और बदलती छवियों की किस्सागोई शैली में विवेचना - तो यहां भी उनकी सिग्नेजर स्टाइल मौजूद है। जैसे- रोचक तथ्य है कि हंगेरियन खुद को एशियाई मानते हैं, जबकि ये देश यूरोप में स्थित है।
खास बात- वजाहत अपनी विद्वत्ता से आतंकित नहीं करते, ना ही कभी दैवीय भाव से हंगरी की इतनी तारीफ कर देते हैं कि पाठक उस देश की महानता के आगे भू-लुंठित हो जाए। असगर ने हंगरी में कुल पांच साल बिताए (यूं, प्रवास के साथ-साथ वे लगभग दो दशकों तक हंगरी आते-जाते रहे।) और उन्हें लगता है कि ये वक्फा महज पांच दिनों जैसा है, यानी इतना जल्द बीत गया। उनकी किताब को हंगरी में एक हिंदुस्तानी की तथ्यात्मक डायरी कहा जाए तो ग़लत ना होगा।
- चण्डीदत्त शुक्ल

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