सोमवार, 6 जुलाई 2020

एक थी इंदिरा / उपमा ऋचा




हर कहानी में कुछ मोड़ कविता की तरह आते हैं...


यही वो क्षण था, जब उसकी ज़िंदगी की कहानी में एक कविता ने आकार लेना शुरू किया। शायद यह कोई गूढ़ार्थ था, जिसे नियति ने केवल इंदिरा के लिए गढ़ा था, पर इंदिरा की समझ में तब आया जब अचानक दो नीली आंखों की मौजूदगी हर पल अपने आसपास महसूस होनी शुरू हुई। घने ताप से भरी इन आंखों की मौजूदगी उसे ऐसी मालूम होती जैसे सोलहवाँ साल साल खुद को दोहरा रहा है। जैसे नसों में बर्फ पिघलती जा रही है। रेज़ा-रेज़ा काटती बर्फ...
इस सबकी शुरूआत फ्रेंच क्लास के दौरान हुई। फ्रेंच टीचर फ्रेंक ओबरडोर्फ खासी जहीन तबियत के मालिक थे। उनकी आवाज में एक अजीब-सा ठहराव था और विषय पर अच्छी पकड़... इंदिरा को फ्रेंक पांडित्य का बेजा भार ढोने वाले नहीं लगे, न ही उसने उन्हें 'मिस नेहरू' के टैग से विचलित होते देखा। इसीलिए जरूरत पड़ने पर वह  बेझिझक उनके पास चली जाती और मन का कितना बोझ, कितनी निराशाएं, कितना अकेलापन, कितनी तकलीफ़ें और कितने डर अपने टीचर के कंधों पर मित्रवत उड़ेल देती। फिर भी किसी अपरिचित तान पर कसी मिस्टर फ्रेंक की बातें कई बार उसे असहज करके गहरी सोच में डुबो देतीं और मोतियों का भरम पैदा करते स्वेद कण उसके चेहरे पर झिलमिला आते। ऐसे में अक्सर इंदिरा की आंखों का रंग धानी हो जाता था और चेहरा हज़ारों गुलों के रंग से रंगकर गुलाबी...
 बिला शक ऐसा कचनार चेहरा दूरियों के उन तमाम कपाटों को खोलने के लिए पर्याप्त होता है, जिन्हें मन खोलना नहीं चाहता। शायद इसीलिए एक दिन मिस्टर फ्रेंक ने मुखर होकर इंदिरा के प्रति अपना प्रेम प्रकट कर दिया। मौसम के ख़ासे उदार होने के बावजूद इंदिरा के माथे  पर पसीने की बूदें छलछला उठीं। वह समझ नहीं पाई कि क्या सोचकर उन्होंने यह प्रस्ताव उसके सामने रखा? आयु, परवरिश, पृष्ठभूमि, परिवार या जीवन की प्राथमिकताएं कुछ भी तो समान नहीं था उनके बीच!
'इंदु समझ नही आता कि क्यों मनुष्य मुक्ति के लिए लंबी-लंबी राहें नापता है। जबकि अंतत: वह अपने लिए सुरक्षा और सुख इन्हीं सीखचों में खोजता है। परंपरा, परिवार और प्रतिष्ठा... एक दिन वह जीवन की इन्हीं सीखचों के बीच मुक्त हो जाता है। ऐसे जैसे पका हुआ फल... सारी गाथाएं, सारी तृष्णाएं, सारे राग-विराग और संकल्प सब छूट जाते हैं।'
कान फ्रेंक की दलीलें सुन रहे थे, मगर मन जैसे वहां होकर भी वहां नहीं था। इंदिरा बिना बोले उठकर चली गई और मिस्टर फ्रेंक अवाक देखते रह गए, 'ऐसा क्या अकथन कह दिया मैंने?'
जीवन का मुकम्मल आदि, मध्य और अंत तलाश रहे मिस्टर फ्रेंक शायद ऐसे जवाब की उम्मीद न थी। मगर हर कहानी को एक मुकम्मल अंत मिले यह क़तई ज़रूरी नहीं... फिर यह तो कविता थी, समय द्वारा लिखी जा रही एक लंबी अतुकांत कविता...

(संवाद पुस्तक अंश)

पुस्तक-#एक_थी_इन्दिरा
लेखक-#उपमा_ऋचा
पृष्ठ- 288
मूल्य- 250 रुपये

#संवादप्रकाशन
#संवाद_प्रकाशन_जीवनी_ सीरीज़ की_पुस्तकें




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विश्व में हिंदी : संजय जायसवाल

  परिचर्चा ,  बहस  |  2 comments कवि ,  समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर  विश्वविद्यालय ,  मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर। आज  दुनिया के ल...