गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

ख़ुशबू की तरह तू मुझे महसूस किया कर/ असद अजमेरी

 (अपने अनुज निशिकांत दीक्षित के पास बम्बई जाना हुआ... तो वहाँ के एक मोहतरम शायर भाई "असद अजमेरी" जी से मुलाकात हुई... उनकी एक यादगार ग़ज़ल जो उन्होंने हमें सुनाई...)


है काम तो मुशकिल मगर फिर भी किया कर

दुनिया से मिले वक़्त तो ख़ुद से भी मिला कर


तू अपनी ज़रूरत को न दुनिया से कहा कर

देता  है   ख़ुदा  मांग   ज़रा  हाथ  उठा  कर


वो  कहता है  नफ़रत है  उसेे  शक्ल से मेरी

तस्वीर  भी   रखता है किताबों  में  छुपाकर


सूरज  भी  कोई.  शै   है  उन्हें  इल्म  नहीं है

कुछ लोग बहुत  ख़ुश हैं चराग़ों को बुझाकर


मै  कैसे  कहूं  ख़ुश  हूं या  नाराज़  हूं  तुझसे

चेहरे  पे  लिखा  है   मेरे  चेहरे को  पढ़ा कर


ख़ुशियों का भरोसा नही कब आयें चली जायें.

दो   चार  ग़मो़  को  रखो  सीने से  लगा  कर


मै  तेरी   निगाहों  से  बहुत  दूर   हूं  लेकिन. 

ख़ुशबू  की  तरह तू  मुझे महसूस  किया कर


उलझी  हुई  बातों से न कर  उलझने  पैदा.

जो दिल  मे तेरे है  तू उसे  साफ़ कहा कर


वो लोग जो बरसों से अंधेरों  मे 'असद' थे.

आये हैं  उजालों मे मेरे  घर  को जला कर

©असद अजमेरी...

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