सोमवार, 4 अप्रैल 2022

रवि अरोड़ा की नजर से......

 कहां लिखा है / रवि अरोड़ा



हालांकि धर्म कर्म में अपना हाथ जरा हल्का है मगर फिर भी धार्मिक स्थलों पर आना जाना लगा ही रहता है । हाल ही में मित्रों के साथ वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर भी गया था । वैसे तो पहले भी कई बार वहां गया हूं मगर इस बार का अनुभव ऐसा रहा कि फिर वहां जाने की तौबा ही कर ली है । वृंदावन में बंदर चश्मे , मोबाइल फोन और पर्स आदि लूट लेते हैं और फिरौती वसूलने के बाद ही वापिस करते हैं , यह तो पता था मगर कभी झेला नहीं था । इस बार झेला तो उन तीर्थयात्रियों का दर्द महसूस हुआ जो इस लूट का शिकार रोज़ होते हैं । वृंदावन ही क्यों अन्य धार्मिक स्थलों और दिल्ली समेत तमाम बड़े शहरों की भी तो यही गाथा है । बंदरों का आतंक पूरे मुल्क में है । बंदरों की लूटपाट और अपने घर में गमलों और कपड़ों को तहस नहस करने का गवाह तो मैं खुद आए दिन बनता हूं । 


वृंदावन भ्रमण के दौरान बंदरों से बचाने की गर्ज से इस बार भी मैंने अपना चश्मा, मोबाइल फोन और पर्स भीतरी कपड़ों में छुपा लिए थे । कुल मिला कर लगभग एक घंटा इस धार्मिक नगरी में रहा मगर भरपूर असुविधा के बावजूद चश्मा जेब से नहीं निकाला । मगर वापसी में कार में बैठते समय तो चश्मा निकालना ही था । बस इसी पल एक बंदर आया और चश्मा झपट कर ले गया । आसपास खड़े एक दो लोगों ने फ्रूटी लाने की सलाह दी और हम लोग दौड़ कर लाए भी मगर तब तक बंदर नाराज़ हो चुका था और उसने मेरा महंगा चश्मा अपने पैने दांतों से चूर चूर कर दिया । दुखी मन वृंदावन से लौटने पर मैंने अपने परिचित वहां के एक गोस्वामी जी को फोन किया और जानना चाहा कि यह सारा माजरा क्या है ? उनके द्वारा बताई गई बातें बेहद चौंकाने वाली थीं । गोस्वामी जी ने बताया कि सवा लाख की आबादी वाले वृंदावन में साठ हजार से अधिक बंदर हैं । उन बंदरों में से कुछ बंदर ही झपटमार हैं और वे भी कुछ दुकानों के नियमित कर्मचारी की तरह काम करते हैं । सामान झपटने वाली सभी जगह वही हैं जहां कोई दुकानदार फ्रूटी बेच रहा होता है ।

 बंदर से सामान वापिस दिलवाने वाला कोई स्थानीय व्यक्ति भी वहीं खड़ा आपको मिल जायेगा जो बंदर को फ्रूटी देकर आपका सामान वापिस दिलवाएगा । महंगा सामान वापिस मिलने पर आप उस व्यक्ति को स्वेच्छा से जो नज़राना देंगे , उसमें भी दुकानदार का हिस्सा होता है । बेशक शुरू शुरू में स्थानीय लोग इसे खेल तमाशा समझ कर कुछ नहीं कहते थे मगर अब सभी तंग आए हुए हैं । बंदरों के खौफ से सभी को अपने घरों में लोहे के बड़े बड़े जाल लगवाने पड़ रहे हैं । बंदरों के खौफ से छत से गिर कर अथवा उनके द्वारा काटे जाने से हर साल कई लोग मर भी रहे हैं । इलाके के हर चुनाव में बंदरों का आतंक बड़ा मुद्दा रहता है मगर धार्मिक संगठनों , दुकानदारों और कुछ धर्मभीरू लोगों के कारण अभी तक कोई समाधान नहीं हो पाया है । 


वैसे तो इस मुल्क में इतनी समस्याएं हैं कि उसने समक्ष बंदर जैसे मुद्दे पर बात करना अजीब लगता है मगर फिर भी हमें यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बेशक छोटी सही मगर ये बंदर भी हमारे शहरों की एक समस्या हैं । यह समस्या नहीं होते तो संसद में इस पर कई बार चर्चा नहीं हुई होती । स्वयं उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने संसद में इनके बाबत अपना दुखड़ा न रोया होता । सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजों को इस बंदरों से बचाने के लिए टेंडर न निकाला होता । राष्ट्रपति भवन और संसद समेत पूरे लुटियंस जोन को बंदरों से बचाने को लंगूरों की तैनाती न करनी पड़ती । कमाल है हमारे बड़े बड़े लोग इन बंदरों से त्रस्त हैं मगर इनके खिलाफ कुछ ठोस करने का साहस नहीं करते । माना हमारे धर्म ग्रंथों में बंदरों का जिक्र है मगर ये बंदर हमारा जीना दूभर कर दें , यह तो कहीं नहीं लिखा ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विश्व में हिंदी : संजय जायसवाल

  परिचर्चा ,  बहस  |  2 comments कवि ,  समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर  विश्वविद्यालय ,  मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर। आज  दुनिया के ल...