शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

प्रदीप सौरभ का ब्लाइंड स्ट्रीट / धीरेंद्र अस्थाना

 प्रदीप सौरभ अपने मित्र हैं। पत्रकार, फोटोग्राफर, पेंटर, यायावर, उपन्यासकार, एक्टिविस्ट रहे हैं। ब्लाइंड स्ट्रीट उनका नया उपन्यास है जिसे उपन्यास मानना कम से कम मेरे लिए कठिन है। यह उपन्यास की प्रचलित परिभाषा में नहीं अंटता। इसे एक प्रयोगधर्मी,औपन्यासिक रिपोर्ताज कहा जा सकता है।जो भी है,इसका महत्व इस तथ्य से वाबस्ता है कि यह नेत्रहीन लोगों की दुनिया में आंख खोलता है।

 नेत्रहीन लोगों के सुखों दुखों पर हिंदी फिल्में तो आयी हैं लेकिन हिंदी साहित्य के लिए यह वर्जित प्रदेश ही रहा आया है। प्रदीप ने इस अंधेरी दुनिया में कुछ रचने, खोजने, समझने की कोशिश की,यह बड़ी बात है। इसमें कोई एक केंद्रीय कथा नहीं है।अनेक कथाओं को एक जिल्द में संकलित कर दिया गया है। लिखने की यह भी एक तकनीक है लेकिन समस्या तब आती है जब हम देखते हैं कि कथाओं को बहुत तटस्थ भाव से लिख दिया गया है। इनमें लेखक का बरताव अपने पात्रों से सर्जक और सृजन जैसा नहीं बल्कि एक पत्रकार जैसा निर्वैयक्तिक और असंपृक्त कैमरामैन जैसा है। भाषा भी एकसार और लयात्मक नहीं बल्कि बेहद रुक्ष और सपाट है।

 लेकिन इस किताब को इसलिए जरूर पढ़ा जाना चाहिए कि यह एक ऐसी दुनिया के जीवन संघर्षों से हमारी मुठभेड़ कराती है जिसके बारे में हम बहुत बहुत कम जानते हैं। अंधेरी दुनिया को रौशन करते इस कोलाज का स्वागत है।

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