शनिवार, 24 सितंबर 2022

मोक्ष की धरती गया / मुकेश प्रत्यूष

 मोक्ष की धरती गया  / मुकेश प्रत्यूष 


सीता कुंड, विष्णुपद, अक्षयवट   में पिंडदान करने के बाद  शाम को दक्षिण बिहार विश्विद्यालय के अध्यापक, कवि,  अनुजवत कर्मानंद आर्य से बात करते समय अपने संस्मरणों की किताब - मोक्ष की धरती पर जन्म लिया है मैंने  - के इस अंश की याद  आई। 


पौराणिक काल से गया हिन्‍दुओं के मोक्ष की धरती रही है। हिन्‍दू  जन्‍म कहीं ले,  उसकी मृत्‍यु  कहीं हों   क्‍योंकि इन दोंनों पर उसका अधिकार नहीं है लेकिन जानता  है इस जीवनचक्र, यदि वास्‍तव में होता है, तो उससे मुक्ति उसे  गया में ही मिलेगी । कभी-न-कभी उसका कोई-न-कोई   वंशज यहां आयेगा और उसका नाम लेकर यहीं कहीं उसका तर्पण करेगा और तब उसकी जीवन-यात्रा पूरी होगी ।  जीवन-चक्र समाप्‍त होगा। 


इसका मतलब यह नहीं कि गया केवल एक धार्मिक या कर्मकांडी शहर है । दरअसल गया दो भागों में बंटा हुआ है अंदर गया यानी पुराना गया और नया गया। कहें तो  धार्मिक गया और लौकिक गया।  धार्मिक भाग गया के दक्षिण में है जहां बहुत से मंदिर, तीर्थ स्‍थान, पुराने बाजार, संकरी गलियां, गयावाल पंडों, पुजारियों और कर्मकांडियों के घर-बार हैं।  हम इसे अंदर गया के नाम से जानते हैं  और हिन्‍दू धर्मावलंबी इसे  आदर से गयाजी कहते हैं। 


लौकिक गया क्षेत्र का विकास मुस्लिम तथा ब्रिटिश शासनकाल में हुआ । मुसलमान शासकों ने इसका नाम अल्‍लाहाबाद रखा था । इस  नाम का एक मुहल्‍ला आज भी है तो ला नाम के एक कलक्‍टर ने साहेबगंज नामका मुहल्‍ला बसाया।  दोनों गया के  बीच में रमना नाम का एक मैदान हुआ करता था जो आज एक व्‍यस्‍त बाजार है और तिलकुट-लाई के लिए प्रसिद्ध है। इससे सटा ला रोड आज भी मौजूद है विकास क्रम में अंदर गया और गया मिलकर एक हो गए हैं।  एक तीसरा गया भी है जो बुद्धगया या बोधगया के नाम से प्रसिद्ध है।  बौद्धधर्म की जन्‍मसथली होने के कारण यह ईसा की पांचवी शदी से ही मशहूर है तथा देश-विदेश  के  बौद्ध धर्मालंबियों की आस्‍था और आराधना का केन्‍द्र है।  ।  गया आकर  जहां हिन्दु तीर्थ यात्री मुक्ति की कामना करते हैं वहीं  बौद्ध - धर्म के अनुयायी शांति की तलाश। मुक्ति और शांति क्‍या इन दोनों में कोई भेद है। इस प्रकार कहें तो गया हिन्दुओं और बौद्धों की आस्थाओं का मिलन स्थल है। 


गया जिले के उत्‍तर में आर्य तथा दक्षिण में जनजातीय संस्‍कृति थी। जनजाति बहुल राज्‍य झारखंड, जो पहले  बिहार का अविभाज्‍य अंग था,  गया के दक्षिण में है। 


फल्‍गु नदी गया शहर और गया मुफ्फसिल को बांटती है। मोहाना और निरंजना नदियों की धाराएं फल्गु में आकर मिलती हैं। इस नदी में  शायद ही कभी पानी मिलता है और इसमें शायद ही कभी  पानी नही मिलता है दोनों ही बातें सत्‍य हैं। दरअसल फल्‍गू अंत:सलिला है जल का प्रवाह तो है लेकिन नदी की सतह पर नहीं। पानी की जरूरत है तो ऊपर से थोड़ा बालू हटाइये पानी मिल जाएगा। छठ के दौरान हम प्राय: यह काम करते थे बालू हटा कर काम के लायक पानी से भरा हुआ एक गढा बना लेते थे शायद लोग अब भी यही करते हों।  कपड़ा धोने  के लिए कपड़ा धोने वाले भी यही किया करते हैं। गया शहर को खतरा हो जाए फल्‍गू में ऐसी बाढ़ की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती। 


वैज्ञानिक तथ्‍य जो भी हों, हिन्दू मानस फल्गु के अंत:सलिला होने का कारण इसी पिंडदान की प्रक्रिया से जोड़कर देखता है।  लोकश्रुति है कि दशरथ के निधन के बाद जब राम, सीता और लक्ष्‍मण के साथ श्राद्ध करने गया आए तो राम-लक्ष्मण व्यवस्था करने  चले गए।  सीता फल्गु के किनारे बैठ कर प्रतीक्षा कर रही थी तभी दशरथ की आत्मा ने उनसे पानी देने को कहा क्योंकि उन्हें जोरों की प्यास लगी थी। सीता ने उनकी इच्छा को आज्ञा मानकर नदी, गाय तथा पास में श्राद्ध करवाने के लिए बैठे घाट के एक पुरोहित को साक्षी बनाकर उन्हें जल अर्पित कर दिया। जब राम-लक्ष्मण लौटे तो उनके साथ दान की सामग्री को देखकर तीनों साक्षियों के मन डोल गया और उन्होंने इस प्रकार की किसी घटना से इंकार कर दिया तो सीता ने फल्गु को अंत:सलिला होने का, गाय को गंदगी भी खाने का तथा उस पुरोहित  को दरिद्र होने का श्राप दे दिया। इसमें कितनी सचाई है नहीं कहा जा सकता। 


समय-समय पर वैष्णव धर्माचार्यों का गया आगमन के कारण गया के प्रति हिन्दुओं का ध्यान आकृष्ट हुआ। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु की यात्राओं का ही यह परिणाम था कि चीनी यात्री फाहियान ने अपनी यात्रा के दौरान सन् 409 ई. में जिस क्षेत्र को मुर्दा और उजाड़ कहा था या ह्वेनसांग ने सन् 607 ई. में जिसे केवल एक हजार ब्राह्मणों की बस्ती घोषित किया था वह एक घनी आबादी वाले शहर में परिवर्तित हो गया।  जैन तथा बौद्ध  धर्म के विभिन्न प्रचारकों, अरबी विद्वान अलबेरुनी, ईरानी यात्री गुरदेजी, मैथिल कवि  विद्यापति के गया प्रवास का असर भी इस शहर के विकास पर पड़ा है । 


अन्‍य धार्मिक शहरों की तरह गया में भी मुख्‍य रूप से  देवी-देवताओं के प्रतीकों की पूजा की जाती है। जैसे विष्‍णुपद में काले पत्‍थर पर अंकित विष्‍णु के चरण की, मंगला गौरी में काले पत्‍थर के दो गोल पिंड की,  जिन्‍हें पुजारी भगवान शिव की प्रथम पत्‍नी सती के दोनों स्‍तनों का प्रतीक बताते हैं।  माना जाता है कि जब भगवान विष्‍णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभाजित किया था तो उनके दोनों स्‍तन यहीं पर आकर गिरे थे।  गया शहर में ब्रह्मयोनी, रामशिला, प्रेतशिला जैसे तीन पहाड़ तथा मुरली तथा रामवेदी जैसी पहाड़ियां असंख्य मंदिर जैसे - विष्पुपद, गयाश्री, मंगलागौरी, परपितामह, पितामहेश्वर, शीतलास्थान, बंगलास्थान, दु:खहरणी, बागेश्वरी, कृष्ण द्वारका, मार्कण्डेय महादेव तालाब जैसे सूर्य कुंड, रामसागर, वैतरणी, ब्रह्मसरोवर, रामकुंड, सीताकुंड, गोदावरी, उत्तरमानस (जिनमें अधिकांश पाल वंश के पांचवे शासक नारायण पाल के समय बने थे और आज अपनी अंतिम घड़ियां गिन रहे) हैं। गया,  गयावाल पंडों की यादाश्त, तंग मुड़ती-जुड़ती गलियों, पसरी गंदगी और जानलेवा गर्मी के लिए भी जाना जाता है ।  


कहते हैं गया गय के नाम पर बसा है । गय नाम के कई व्यक्तियों का जिक्र वेदों, पुराणों, महाभारत, रामायण, जैन तथा बौद्ध साहित्य और मथिकों  में मिलता है । कुछ पढ़ी-सुनी बातों की चर्चा करता हूं -


भागवत पुराण (9.1.41) तथा मत्स्य पुराण (12.17) के अनुसार गय इला तथा सुद्युम्न का एक पुत्र था, जो पूर्वी राज्य का राजा और दक्षिणापथ का अधिपति था उसकी  राजधानी गया थी । उसके यज्ञ तथा दान से प्रभावित होकर देवताओं ने गयपुरी की स्थापना की थी । 


भागवत पुराण (4.13.17)  में एक और गय की चर्चा है जो उल्मुक तथा पुष्पकरिणी का   पुत्र था।


भागवत पुराण (5.15.6-14, 10.16.41), वायु पुराण (33.57) तथा विष्णु पुराण (2.1.38) के अनुसार गया नक्त तथा द्रुति का एक राजर्षि पुत्र था जिसकी पत्‍नी का नाम गयन्ती तथा पुत्र का नाम  चित्ररथ था। गया इसकी राजधानी थी । 


गौतम बुद्ध के भी गय नामक एक ऋषि के आश्रम में जाने की बात कही जाती है । 


पहले गया नामक एक नदी था और वायु पुराण (3.16) के  अनुसार वह  गंगा से ज्यादा पवित्र था ।  संभव है फल्गु नदी ही पहले गया के नाम से जाना जाता हो और उसके किनारे बसे होने के कारण इस शहर को गया नाम दिया गया हो । 


वायु पुराण (105.5.13) के अनुसार गय नामक असुर त्रिपुरासुर का पुत्र था । यह 125 योजन लम्बा तथा 60 योजन चौड़ा था । यह विष्णुभक्त तथा वैष्णव था तथा इसने वायुपुराण (106.5) के अनुसार कोलाहल पर्वत पर एक हजार वर्षों तक तप करके   विष्णु से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसके दर्शन मात्र से लोगों को स्वर्ग में स्थान मिल जाए ।  वरदान प्राप्ति के बाद उसने घूम-घूम कर लोगों को दर्शन देना आरंभ कर दिया । इससे घबराकर देवताओं ने ब्रह्मा तथा यम की सहायता से इसे मारने की योजना बनाई और यज्ञ के लिए उससे उसी का  शरीर  मांगा । इसे  उसने स्वीकार कर लिया । उसके शरीर को अचल करने के लिए देवताओं ने उसे एक शिला से दबा दिया और स्वयं उस शिला  पर बैठ गए किन्तु उसके शरीर को फिर भी हिलते देख  स्वयं विष्णु भी उस शिला पर आकर  बैठ गये  तब अपनी मृत्यु निश्चित जानकर गयासुर ने यह वरदान मांगा कि आप सभी देवता इसी शिला पर बैठे रहें तथा जो भी इस स्थान पर आकर श्राद्ध या पिण्डदान करे उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति हो । वायुपुराण (105.4.46; 106; 108.8; 109.13) के अनुसार इसी  स्थान को गयातीर्थ कहा गया ।  गयासुर को स्थिर करने के लिए उसके शिर पर जो पर्वत रखा गया था वह एक कोस का था उसे वायुपुराण (105.29) के अनुसार गयाशिर कहा गया तथा इसी पुराण (105.31) के अनुसार यहां श्राद्ध करने से 100 पीढियों को मुक्ति मिलती है। 


वायु पुराण (112.60) के अनुसार  गयागय, गयादित्य, गायत्री, गदाधर, गया और गयासुर छह मोक्षदायक हैं. माघ, चैत्र तथा महालया के दिनों में यहां हिन्दू विशेष रुप से श्राद्ध  कर्म करने आते हैं. हालांकि उत्तर वैदिक काल में 365 जगहों पर होने वाला पिंडदान अब महज 45 जगहों पर होता है वह भी मुख्य रुप से गया शहर में ही.


भागवत पुराण (10.79.11) के अनुसार बलराम ने यहां पितरों का पिंडदान किया था तो वायु पुराण (85.19) तथा मत्स्य पुराण (12.17) के अनुसार यहां परशुराम ने श्राद्ध  किया था. राम, लक्ष्मण तथा सीता द्वारा भी यहां आकर अपने पूर्वजों का पिंडदान करने की बात कही जाती है. 


महाभारत वनपर्व (95.18-29) के अनुसार अमूर्तरथ के  एक पुत्र का नाम भी गया था जो प्रतिदिन एक लाख साठ हजार गाय, दस हजार घोड़े और एक लाख मुद्राएं दान करता था । उसने एक विशाल यज्ञ भी किया था तथा सौ वर्षों तक केवल उस यज्ञ से बचे हुए अन्न का भोजन किया था ।


ऋगवेद की दो ऋचाओं (10.63.17 तथा 10.64.17) तथा ऐतरेय ब्राह्मण के एक मंत्र (5.2.12) में भी गया नाम के व्यक्ति का उल्लेख है ।


अथर्ववेद (1.14.1) में गया नाम के एक राक्षस की बात कही गई है । 


जैन लेखकों ने समुद्रविजय तथा उसके पुत्र गया की चर्चा अपनी किताबों  में की है ।


हिन्दुओं के बीच ऐसी मान्यता है कि गया में  तीन पखवारे तक रहने से सात पीढ़ी को मोक्ष मिल जाती है. 


सच क्‍या है कोई नहीं जानता सिवा इसके कि समकालीन दुनिया के साथ गया कदमताल कर रहा है।

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