मंगलवार, 6 सितंबर 2022

धीरेन्द्र अस्थाना की कहानियों पर योगेंद्र आहुजा

 हिंदी के मशहूर और  विरल कथाकार योगेन्द्र आहूजा अपनी विलक्षण कहानियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं।हाल ही में उन्होंने अपनी यह बेशकीमती टिप्प्णी लिखी है,जिसे यहां बड़े लेखक पाठक समूह के लिए शेयर करना जरूरी लग रहा है---


धीरेन्द्र की कहानियां कुल मिलाकर जिस कालखंड को समेटती हैं, वह हमारे देश के सामाजिक राजनीतिक जीवन में कुछ अप्रत्याशित, मूलगामी परिवर्तनों का दौर रहा है । देश और समाज की जो शक्ल उनकी पहली कहानी ‘लोग हाशिये पर’ के समय थी, आज उसे पहचान सकना मुश्किल है । इस बीच जैसे एक नाखूनदार पंजे ने वक्त का कंधा भम्भोड़ दिया है । वक्त दस्ताने की तरह पलट चुका है । इन कहानियों को इतने बरसों के बाद, एक बदले हुए वक्त में, दुबारा पढने पर सबसे पहले जो शिद्दत से एहसास होता है वह यह कि, गोकि इनके बहुत से ब्यौरे और सन्दर्भ आज पुराने पड़ चुके हैं, ये कहानियां पुरानी नहीं हुईं । इन्हें अतीत के या पुरातन के खाने में  खिसकाना मुमकिन नहीं, कम से कम अभी तक । दशकों के बाद भी इनकी ताजगी अक्षुण्ण है और यह केवल कहन या रूप के स्तर पर नहीं, कथन के,  मायनों के, अर्थगर्भत्व के स्तर पर भी । अर्थ के स्तर पर ये कहानियां जैसे चिर-नवीन हैं या निरंतर नवीकृत होती हुई । अगर हमें चारों ओर से घेरे वास्तविकता लगातार बदलती रही है तो कहानियां या उनके मायने भी कहीं ठहरे नहीं रहे । उदाहरण के लिए उनकी ‘जो मारे जायेंगे’ कहानी देखें । कहानी, ज़ाहिर है कि, जब लिखी गयी थी यानी बीसवीं सदी के आखिरी दशक में, उसी समय के दृश्य-अदृश्य संकेतों और आगत के अनुमानों से बुनी गयी होगी । लेकिन इसे इतने वर्षों के बाद आज पढ़ते हुए महसूस होता है कि जैसे वह अभी लिखी गयी है, अभी के बारे में है । इतना ही फर्क है कि, कहानी के सभी पूर्वानुमानों को सही साबित करते हुए, जो मारे जाने थे, मारे जा चुके हैं ।


धीरेन्द्र की अधिकतर कहानियां इसी तरह खुद को नवीकृत कर अद्यतन और समकालीन बनी हुई हैं । बेशक इसमें एक ‘बशर्ते’ जुड़ा है और वह कि उन्हें एक अतिरिक्त सजगता के साथ और दो अलग समयों की संयोजित चेतना से पढ़ा जाए । उनकी कहानियों की दीर्घजीविता और पाठकों का लगातार बढ़ता दायरा इसी की तस्दीक करते हैं । शायद हिंदी की कम ही कहानियां हैं जो इस तरह ‘सतत समकालीनता’ का दावा कर सकती हैं ।


धीरेन्द्र की कहानियों की दुनिया इतनी विस्तृत और विविधवर्णी है कि किसी एक उन्वान तले उसे समेटना नामुमकिन है । किसी एक चाबी की तलाश जो सब कहानियों को खोल सके, इन कहानियों के सन्दर्भ में बेमानी है । एक छोटी भूमिका में केवल उस ‘दिल की दुकान’ का कुछ अता पता मालूम करने की कोशिश की जा सकती है जहाँ से ये सारी कहानियां आई हैं । कुछ अन्तःसूत्र जो इन्हें आपस में बांधते हैं । धीरेन्द्र अस्थाना को हमेशा से अपना पक्ष पता था और वह सृजन पथ भी जिस पर जीवन भर चलना था । उनकी शुरु की रचनाएँ देखें तो वहां एक बेपनाह विक्षुब्धि है, और स्वर कुछ ऐसा युयुत्सु, जैसे वे कहानियां नहीं, दुखों और अंतर्विरोधों और क्रूरताओं कुरूपताओं से एक फैसलाकुन जंग हैं । उस समय लेखक के पास अन्वेषण, प्रतीक, प्रयोग, सांकेतिकता या शिल्प के चमत्कार में उलझने का न वक्त रहा होगा न मन । वहां हम कुछ विलुप्त होने की कसक देखते हैं, कुछ बचाने की कोशिश । देश समाज और जीवन में जो कुछ सुन्दर और सार्थक और सारवान है, उसके क्रमिक विलोप की कसक - और कोशिश कहानियों में उसे ही न्यूनाधिक रचने और पाने की । जो नकारात्मक और वर्चस्वशाली शक्तियां जीवन को कसती गयी हैं, उनकी एक साफ़, निर्भ्रांत पहचान उनकी कहानियों में हमेशा मौजूद थी । शुरू की कहानियों में जीवन की जटिलता का अंकन था और आलोचना पक्ष पर जोर । बाद में उन्होंने ऐसी कहानियां लिखीं जो व्यक्ति मन के कष्टों और कातरता और कशाकश से, गहरे एहसासों, भावावेगों से वाबस्तगी रखती थीं, जीवन के संवेदनशील पहलुओं के ग्रहण का आग्रह करती थीं । वे मनुष्य मन के भीतर उतरती, मुड़ कर अतीत देखती, दर्द कुरेदती थीं । व्यक्तिपरक थीं वे, बेशक, लेकिन व्यक्तिवादी नहीं और सामाजिक विवेक को कुचल कर नहीं लिखी गयी थीं । एक कलात्मक संयम और धीरज से बुनी गयी इन कहानियों में जो ‘भीतर’ या ‘अंतस’ था वह ‘बाहर’ – यानी समाज, जीवन, राजनीति, रोजगार की जद्दोजहद, बसों के पीछे दौड़ना – से अलग या कटा हुआ कोई स्वायत्त अंतर्लोक नहीं था । वह उस ‘बाहर’ का ही आंतरिक आयाम था और ये कहानियां, पहले की कहानियों से जुड़कर, व्यक्ति के अंतर्बाह्य जीवन का, या कहें, वृहत्तर मानवीय संवेदना का दायरा पूरा करती थीं ।


कहानियों के बारे में विषयवस्तु के हवाले से बताना चाहें तो ‘महानगरीय जीवन की बेगानगी’, ‘विघटित होते मानव संबंध’, ‘आगत के भयावह संकेत’, ‘नयी क्रूरतायें और हिंसाएँ’ जैसे पद मन में कौंधते हैं लेकिन तत्काल नाकाफी लगने लगते हैं  । शिल्प या गठन, भाषा की भंगिमा या कहन के अंदाज़ की चर्चा भी इन कहानियों के सन्दर्भ में अधूरी जान पड़ती है । वैसे कोई भी अच्छी कहानी महज अपने उपादानों का योग भर नहीं होती । विषयवस्तु, विन्यास, शिल्प आदि की चर्चा से केवल कहानियों की हद बताई जा सकती है, लेकिन उनके भीतर की ‘बे-हद’ कहानी नहीं । दरअसल आलोचना में रूप और विषयवस्तु के जिस ‘अभेद’ की, ‘एकान्विति’ की चर्चा होती है, धीरेन्द्र की ये कहानियां उसका अनुपम उदाहरण हैं । इनके अवयव - कथानक, शिल्प, पात्र, माहौल, या कहानी का ‘वक्तव्य’ -  इस तरह अविछेद्य हैं कि उन्हें एक दूसरे से जुदा कर कहानियों का विश्लेषण मुमकिन नहीं । इस कोशिश में एक आधा अधूरा विश्लेषण शायद हाथ आये लेकिन कहानी गुम हो जाएगी । जीवन, समाज और संबंधों के बारे में लेखक के भावबोध, जो कहानियों में व्यक्त हुआ है, तक पहुँचने के लिए इनके समग्र पठन का – एक एक शब्द पर टिकते हुए - कोई विकल्प नहीं ।


धीरेन्द्र की कथायात्रा न थमी है, न मंद हुई है । नींद और चैन तज कर ही लिखी जा सकती हैं ऐसी कहानियां जिनमें जीवन की एक मर्मी आलोचना हो, जो पाठकों में बेचैनी जगाएं, नींदें उड़ा दें ।

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