गुरुवार, 22 सितंबर 2022

मिटत न हिय कौ शूल!/ ऋषभ देव शर्मा

 

#(डेलीहिंदीमिलाप)

आज #14सितंबर है। अर्थात, #हिंदी_दिवस। यह दिन भारत की भाषिक आज़ादी की घोषणा का दिन है। विडंबना यह है कि इसके बावजूद हम आज भी 'अंग्रेज़ी का भाषिक उपनिवेश' बने हुए हैं!


भारत जैसे विशाल देश का बहुभाषिक होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि स्थान बदलने के साथ बानी (भाषा) का बदलना यहाँ लोक में उतना ही सहज माना जाता है, जितना कि पानी का बदलना। युगों से यह विविधता और बहुलता भारत की पहचान रही है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, लेकिन उनमें कोई नैसर्गिक विरोध नहीं है। वे परस्पर अविरोधी तो हैं ही, सहयोगी भी हैं। एकता का एक सर्वनिष्ठ सूत्र उन्हें परस्पर जोड़ता है और भारतीय संस्कृति का संयुक्त वाहक बनाता है। जैसे क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद यह देश एक सामासिक संस्कृति को व्यंजित करता है, वैसे ही बहुभाषी होते हुए भी अपनी राष्ट्रीय पहचान को एक सार्वदेशिक भाषा के माध्यम से भी प्रकट करता है। लंबी सांस्कृतिक परंपरा के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन की आग में तप कर इस सार्वदेशिक भाषा के रूप में हिंदी ने अपनी पात्रता सिद्ध की है। यही कारण है कि हिंदी आज उसी प्रकार इस महादेश की संपर्क भाषा है, जिस प्रकार कभी अतीत में संस्कृत थी। इसे ध्यान में रख कर ही आधुनिक भारत के संविधान निर्माताओं ने हिंदी को 'भारत संघ की राजभाषा' घोषित किया। इससे जुड़े अंशों की स्वीकृति के दिन यानी 14 सितंबर को इसीलिए '#हिंदीदिवस' के रूप में मनाया जाता है। 


याद रहे कि उपनिवेश काल में ब्रिटिश-भारत की राजभाषा अंग्रेज़ी थी और उसका पोषण करने के लिए सुनियोजित ढंग से हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को अपोषित तथा उपेक्षित रखा गया था, ताकि इनसे पुष्ट हो सकने वाली भारतीयता और भारतीय संस्कृति को क्षीण किया जा सके। इस कारण लंबी गुलामी ने इन भाषाओं का विकास अवरुद्ध कर दिया था। इसलिए आज़ादी मिलने के समय यह महसूस किया गया कि केंद्र में हिंदी और राज्यों में विविध भारतीय भाषाओं को राजकाज में अंग्रेज़ी का स्थान लेने में कुछ समय लग सकता है।   इसके लिए 15 साल की अवधि तय की गई। राजनैतिक कारणों से 15 वर्ष बाद भी यह बदलाव संपन्न न किया जा सका और संघ की सहराजभाषा के रूप में तब तक के लिए अंग्रेज़ी को छूट दे दी गई, जब तक कोई एक भी राज्य संघ का सारा कामकाज हिंदी में किए जाने के लिए असहमत रहे! इस प्रकार संवैधानिक रूप से हिंदी भारत संघ की राजभाषा होते हुए भी व्यावहारिक रूप से सहराजभाषा अर्थात अंग्रेज़ी की मोहताज है। इसलिए हिंदी को राजभाषा का अपना संवैधानिक स्थान दिलाने के अनुकूल वातावरण और मानसिकता के निर्माण और विकास के लिए हिंदी दिवस मनाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है। 


यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि संविधान का जो खंड हिंदी को भारत संघ की राजभाषा बनाता है, वही राज्यों को अपना अपना राजकाज अपनी अपनी भाषाओं में चलाने की आज़ादी भी देता है। इसी कारण हर राज्य की अपनी अपनी राजभाषाएँ हैं। इसका अर्थ है कि 14 सितंबर केवल हिंदी नहीं, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं की संवैधानिक स्वीकृति की तिथि है। इसलिए इसे 'हिंदी दिवस' के साथ ही 'भारतीय भाषा दिवस' के रूप में एक राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाना चाहिए। इस तरह यह दिन भारतीय भाषाओं के सद्भाव पूर्ण सह अस्तित्व का प्रतीक है। स्वतंत्रता आंदोलन के एक अंग के रूप में चले स्वभाषा आंदोलन का उद्देश्य भी यही तो था कि - 'एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एकहृदय हो भारत जननी!'


अंततः यही कि जब तक हम संसद से लेकर सड़क तक, यानी न्याय, शिक्षा, रोजगार, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य व्यवसाय, अर्थ व्यवस्था, सृजन, अनुवाद, विचार विमर्श, संचार, मनोरंजन, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक तमान व्यवहार क्षेत्रों में अपनी भाषाओं का सशक्तीकरण सिद्ध नहीं करते, तब तक यह महादेश उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो सकता। इस 'शूल' को तो 'निज भाषा' से ही मिटाया जा सकता है, क्योंकि-


"बिन निज भाषा ज्ञान के, 

मिटत न हिय कौ शूल!"  (भारतेंदु)। 000

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्रेम जनमेजय होने का मतलब /

  मैं अगस्त 1978 की एक सुबह पांच बजे दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर उतरा था, किसी परम अज्ञानी की तरह, राजधानी में पहली बार,वह भी एकदम अक...