शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 अब पिंक टैक्स की मार भी  / रवि अरोड़ा 



 घर में एक प्यारी सी लेब्राडोर कुतिया है लाइका। नियमित जांच के लिए लाइका को डाक्टर के पास ले जाने की जिम्मेदारी बेटे की है मगर उसके देश से बाहर होने के कारण कल बेटी लाइका को डाक्टर के यहां ले गई। जांच आदि के डाक्टर ने इस बार पंद्रह सौ रूपए ले लिए जबकि इससे पूर्व वह केवल पांच सौ रूपए लेता था । बेटी ने लौट कर भाई को इस बाबत फोन पर बताया तो उसने तुरंत ही कहा दस बीस फीसदी का तो आम रिवाज़ है मगर इस डॉक्टर ने तो पिंक टैक्स पूरे दो सौ फीसदी लगा दिया । अब यह पिंक टैक्स शब्द मैने पहली बार सुना था सो मुझे बड़ी जिज्ञासा हुई । इस पर बच्चों ने बताया पूरी दुनिया का यही चलन है और एक जैसी सेवा अथवा उत्पाद के भी महिलाओं से अधिक पैसे वसूले जाना आम बात है । इस अतिरिक्त पैसे को ही महिलाओं के रंग गुलाबी से जोड़ कर पिंक टैक्स कहा जाता है। बेशक यह शब्द मेरे लिए नया था मगर इसके वजूद से तो मैं कभी भी अनजान नहीं था। मुझे याद आए वह तमाम अवसर जब मेरी घर की महिलाएं बाजार में यूं ही ठगी गईं। 


खोजबीन करने बैठा तो पता चला कि पहली बार साल 2010 में सीमित क्षेत्र के एक सर्वे में पता चला कि बहुराष्ट्रीय ही नहीं देशी कंपनियां भी एक ही जैसे माल की पुरुषों के मुक़ाबिल महिलाओं से अधिक कीमत वसूलती हैं। साल 2015 में अमेरिका के उपभोक्ता मामलों के विभाग ने अपने सर्वे में भी पाया कि बिना किसी कारण के महिलाओं से सात फीसदी अधिक कीमत वसूली जा रही है। खिलौने,कपड़े, जूते, कॉस्मेटिक, स्वास्थ्य संबंधी सामान और चश्मे जैसे 91 उत्पाद की सूची भी उसने जारी की जिनमें महिलाओं को ठगा जा रहा है। बाद में जर्मनी, फांस, ऑस्ट्रेलिया, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों मे भी ऐसे सर्वे हुए और पता चला कि किसी किसी प्रॉडक्ट में तो महिलाओं को पचास फीसदी तक अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। सर्वे में पाया गया कि पुरुषों और महिलाओं के सामान में केवल रंग और कहीं कहीं केवल पैकिंग का ही अंतर होता है मगर उसी के नाम पर उनसे अधिक पैसे वसूले जाते हैं। माना गया कि चूंकि महिलाएं किसी भी कम्पनी की विश्वसनीय ग्राहक होती हैं और नियमित खरीदारी उनका स्वाभाविक गुण है अतः इसी का फायदा कंपनियां उठाती हैं। 


अपने मुल्क में हालांकि इस गुलाबी कर के बाबत कोई सर्वे आजतक नहीं हुआ है मगर साफ दिख रहा है कि भारत में स्थिति अधिक ही खराब होगी। क्या विडंबना है कि ये बहुराष्ट्रीय और देशी कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों को तो पुरुषों के मुकाबले कम वेतन देती हैं मगर अपना माल उन्हें महंगे दामों पर बेचती हैं। उन्हें इस बात से भी कोई मतलब नहीं है कि उन्हीं के द्वारा रचित सौंदर्य के मानकों पर खरा उतरने को महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक खर्च भी करना पड़ता है। सोच कर हैरानी होती है हजारों साल से दुनिया भर में महिलाओं पर हुए अत्याचारों के लिए हम सामंती व्यवस्था को ही दोष देते हैं मगर यह आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था भी महिलाओं को लूटने में कहां पीछे है ?

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